{"_id":"57eaa8284f1c1b653b574dce","slug":"ut-joint-secretary-notice-in-terms-of-personnel-housing-scheme","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"यूटी कर्मियों की हाउसिंग स्कीम मामले में संयुक्त सचिव को नोटिस","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
यूटी कर्मियों की हाउसिंग स्कीम मामले में संयुक्त सचिव को नोटिस
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Wed, 28 Sep 2016 01:49 AM IST
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चंडीगढ़ प्रशासन के करीब 4000 कर्मचारियों के लिए आवास के मुद्दे पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में लंबे समय से जारी केस में केंद्र सरकार ने पिछली सुनवाई पर राहत भरी सूचना दी थी कि चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा भेजा गया प्रस्ताव केंद्रीय गृह मामले के मंत्रालय ने स्वीकार कर लिया है और अब प्रस्ताव को आवश्यक सहमति के लिए वित्त विभाग के पास भेज दिया गया है।
लेकिन मंगलवार को इस मामले पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सीनियर एडवोकेट चेतन मित्तल ने हाईकोर्ट को बताया कि वित्त विभाग की आईएफडी ब्रांच ने अब तक प्रस्ताव पर कोई निर्णय नहीं लिया है और इस बारे में 4 अक्तूबर को बैठक बुलाई गई है। इसके साथ ही केंद्र सरकार की ओर से इस मामले में और समय दिए जाने की अपील हाईकोर्ट से की गई।
इस पर जस्टिस अजय कुमार मित्तल और जस्टिस रामेंद्र जैन की खंडपीठ ने केंद्र सरकार के रवैये पर कड़ा एतराज जताते हुए मामले की अगली सुनवाई 18 अक्तूबर तय कर दी लेकिन इसके साथ ही यह भी साफ कर दिया कि अगर 4 अक्तूबर की बैठक में कोई फैसला नहीं लिया जा सका तो गृह विभाग के संयुक्त सचिव स्वयं हाईकोर्ट में पेश हो जाएं।
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उल्लेखनीय है कि इस मामले में पिछली सुनवाई पर केंद्र सरकार ने अपना जवाब दाखिल करते हुए कहा था कि चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा गत 10 मार्च को भेजे गए प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है। केंद्र सरकार की ओर से सीनियर एडवोकेट चेतन मित्तल ने बताया था कि चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा भेजा गया प्रस्ताव केंद्रीय गृह मामले के मंत्रालय ने स्वीकार कर लिया है और अब प्रस्ताव को आवश्यक सहमति के लिए वित्त विभाग के पास भेजा गया है। याचिकाकर्ता के एडवोकेट विनोद एस. भारद्वाज ने बताया कि मंगलवार को सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि वित्त विभाग के पास पहुंचे प्रस्ताव पर क्या फैसला लिया गया है।
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लेकिन मंगलवार को इस मामले पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सीनियर एडवोकेट चेतन मित्तल ने हाईकोर्ट को बताया कि वित्त विभाग की आईएफडी ब्रांच ने अब तक प्रस्ताव पर कोई निर्णय नहीं लिया है और इस बारे में 4 अक्तूबर को बैठक बुलाई गई है। इसके साथ ही केंद्र सरकार की ओर से इस मामले में और समय दिए जाने की अपील हाईकोर्ट से की गई।
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इस पर जस्टिस अजय कुमार मित्तल और जस्टिस रामेंद्र जैन की खंडपीठ ने केंद्र सरकार के रवैये पर कड़ा एतराज जताते हुए मामले की अगली सुनवाई 18 अक्तूबर तय कर दी लेकिन इसके साथ ही यह भी साफ कर दिया कि अगर 4 अक्तूबर की बैठक में कोई फैसला नहीं लिया जा सका तो गृह विभाग के संयुक्त सचिव स्वयं हाईकोर्ट में पेश हो जाएं।
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उल्लेखनीय है कि इस मामले में पिछली सुनवाई पर केंद्र सरकार ने अपना जवाब दाखिल करते हुए कहा था कि चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा गत 10 मार्च को भेजे गए प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है। केंद्र सरकार की ओर से सीनियर एडवोकेट चेतन मित्तल ने बताया था कि चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा भेजा गया प्रस्ताव केंद्रीय गृह मामले के मंत्रालय ने स्वीकार कर लिया है और अब प्रस्ताव को आवश्यक सहमति के लिए वित्त विभाग के पास भेजा गया है। याचिकाकर्ता के एडवोकेट विनोद एस. भारद्वाज ने बताया कि मंगलवार को सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि वित्त विभाग के पास पहुंचे प्रस्ताव पर क्या फैसला लिया गया है।
यह है मामला
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करीब छह वर्ष पहले चंडीगढ़ प्रशासन ने अपने कर्मचारियों को आवास देने के लिए योजना के तहत एक नीति बनाई थी। इसके मुताबिक सभी से अर्नेस्ट मनी भी जमा करवा ली गई, लेकिन बाद में सभी को मकान देने का निर्णय बदलते हुए ड्रा के जरिए कुछ कर्मचारियों को मकान देने की नीति तैयार कर ली गई।
हालांकि ड्रा में सफल होने वाले कर्मचारियों को भी प्रशासन ने आज तक मकान उपलब्ध नहीं कराया। मामले में यूटी प्रशासन का तर्क था कि प्रशासन के पास शहर में जगह की कमी है। बाद में मामले को लेकर हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की गई थी। कानूनी चुनौती का सामना करते हुए आखिरकार कर्मचारियों को हाउसिंग वेलफेयर स्कीम के तहत चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड के मकान उपलब्ध करवाने के लिए प्रशासन ने केंद्रीय गृह विभाग के जरिए केंद्रीय वित्त मंत्रालय से अनुमति मांगी।
दरअसल हाउसिंग बोर्ड के समक्ष सबसे बड़ी समस्या जमीन की बढ़ी कीमत थी। प्रशासन चाहता है कि जमीन की कीमत वित्त मंत्रालय तय करे। चंडीगढ़ प्रशासन ने इस स्कीम के लिए दक्षिणी सेक्टरों में जमीन रिजर्व रखी हुई है। जमीन की बढ़ी कीमत के चलते यह स्कीम चंडीगढ़ प्रशासन और चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड के बीच ही उलझकर रह गई थी। हाईकोर्ट में मामले पर पिछली कई सुनवाइयों के दौरान चंडीगढ़ प्रशासन जहां हाउसिंग बोर्ड पर देरी का ठीकरा फोड़ता रहा है, वहीं हाउसिंग बोर्ड यूटी प्रशासन को जिम्मेदार ठहराता रहा है। सुनवाई के दौरान चंडीगढ़ प्रशासन ने जवाब दायर कर कहा था कि चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड ने इस स्कीम के तहत जमीन लेने के लिए प्रशासन के पास पैसे जमा नही करवाए, इसलिए प्रशासन ने जमीन जारी नहीं की।
दूसरी तरफ चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड की तरफ से हाईकोर्ट को बताया गया कि जब बोर्ड ने वर्षों पहले यह स्कीम जारी की थी, उस समय जमीन का रेट 7920 रुपये गज था। जबकि आज चंडीगढ़ में जमीन के दाम 60 हजार रुपये प्रति गज के हिसाब से पड़ रहा है। बोर्ड ने हाईकोर्ट को यह भी बताया कि वह इस स्कीम को रद्द कर रहा है। बोर्ड के इस जवाब पर हाईकोर्ट ने प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि प्रशासन वोट बैक को ध्यान में रखकर करोड़ों रुपये खर्च कर झुग्गी वालों को तो मकान दे सकता है, लेकिन सारी उम्र प्रशासन की सेवा करने वाले कर्मचारियों को मकान देने के लिए उसके पास जमीन नहीं है। हाईकोर्ट ने यहां तक कह दिया था कि मामले में शामिल अधिकारियों के खिलाफ वह मामला दर्ज करने का आदेश तक दे सकते हैं। बाद में मामले में केंद्रीय गृह मंत्रालय को भी पक्षकार बनाया गया था।
हालांकि ड्रा में सफल होने वाले कर्मचारियों को भी प्रशासन ने आज तक मकान उपलब्ध नहीं कराया। मामले में यूटी प्रशासन का तर्क था कि प्रशासन के पास शहर में जगह की कमी है। बाद में मामले को लेकर हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की गई थी। कानूनी चुनौती का सामना करते हुए आखिरकार कर्मचारियों को हाउसिंग वेलफेयर स्कीम के तहत चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड के मकान उपलब्ध करवाने के लिए प्रशासन ने केंद्रीय गृह विभाग के जरिए केंद्रीय वित्त मंत्रालय से अनुमति मांगी।
दरअसल हाउसिंग बोर्ड के समक्ष सबसे बड़ी समस्या जमीन की बढ़ी कीमत थी। प्रशासन चाहता है कि जमीन की कीमत वित्त मंत्रालय तय करे। चंडीगढ़ प्रशासन ने इस स्कीम के लिए दक्षिणी सेक्टरों में जमीन रिजर्व रखी हुई है। जमीन की बढ़ी कीमत के चलते यह स्कीम चंडीगढ़ प्रशासन और चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड के बीच ही उलझकर रह गई थी। हाईकोर्ट में मामले पर पिछली कई सुनवाइयों के दौरान चंडीगढ़ प्रशासन जहां हाउसिंग बोर्ड पर देरी का ठीकरा फोड़ता रहा है, वहीं हाउसिंग बोर्ड यूटी प्रशासन को जिम्मेदार ठहराता रहा है। सुनवाई के दौरान चंडीगढ़ प्रशासन ने जवाब दायर कर कहा था कि चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड ने इस स्कीम के तहत जमीन लेने के लिए प्रशासन के पास पैसे जमा नही करवाए, इसलिए प्रशासन ने जमीन जारी नहीं की।
दूसरी तरफ चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड की तरफ से हाईकोर्ट को बताया गया कि जब बोर्ड ने वर्षों पहले यह स्कीम जारी की थी, उस समय जमीन का रेट 7920 रुपये गज था। जबकि आज चंडीगढ़ में जमीन के दाम 60 हजार रुपये प्रति गज के हिसाब से पड़ रहा है। बोर्ड ने हाईकोर्ट को यह भी बताया कि वह इस स्कीम को रद्द कर रहा है। बोर्ड के इस जवाब पर हाईकोर्ट ने प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि प्रशासन वोट बैक को ध्यान में रखकर करोड़ों रुपये खर्च कर झुग्गी वालों को तो मकान दे सकता है, लेकिन सारी उम्र प्रशासन की सेवा करने वाले कर्मचारियों को मकान देने के लिए उसके पास जमीन नहीं है। हाईकोर्ट ने यहां तक कह दिया था कि मामले में शामिल अधिकारियों के खिलाफ वह मामला दर्ज करने का आदेश तक दे सकते हैं। बाद में मामले में केंद्रीय गृह मंत्रालय को भी पक्षकार बनाया गया था।