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आज की सच्चाई को दिखाती पंजाबी नाटक ‘हुमस’ का मंचन, खूब तालियां बजीं
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sun, 13 Nov 2016 01:00 AM IST
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पंजाबी नाटक ‘हुमस’ का मंचन
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‘आज इंसान इतना स्वार्थी हो चुका है कि हर जगह पर अपना लाभ देखता है। 21वीं शताब्दी में पहुंचने के बाद भी इंसान धर्म, जाति की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। रिश्तों में प्यार की जगह दरार व स्वार्थ आ चुका है।’
यह कहना है पटियाला के सार्थक रंगमंच के डायरेक्टर लखा लहरी का, जो टैगोर थिएटर में सुचेतक रंगमंच मोहाली द्वारा आयोजित ‘गुरशरन सिंह नाट उत्सव’ में शामिल होने के लिए टैगोर थिएटर पहुंचे थे। वहां शनिवार को उनके थिएटर ग्रुप सार्थक रंगमंच की ओर से पंजाबी नाटक ‘हुमस’ का मंचन हुआ।
किरपाल कजाक द्वारा लिखे इस नाटक में इंसान की चारों अवस्थाओं बचपन, जवानी, गृहस्थ और बुढ़ापे का जिक्र किया गया। नाटक की शुरुआत एक स्कूल के सीन से होती है जहां पर एक बच्चे को धर्म पर सवाल पूछने पर टीचर की डांट सुननी पड़ती है। साथ ही में यह भी दिखाया गया कि मां बाप अपनी इच्छा अपने सपने अपने बच्चों पर लाद देते हैं और उनसे उनके अरमानों के बारे में पूछा ही नहीं जाता। जीवन की दूसरी स्टेज पर जाकर युवाओं में नौकरियों को लेकर हुमस रहती है।
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सरकारें उनके सामने सपने तो परोस देती है जो कि हकीकत से कोसो दूर होते हैं। वहीं गृहस्थ जीवन को दिखाते हुए पति पत्नी के बीच की तकरार को दिखाया जाता है। अंत में एक बुजुर्ग पति पत्नी की कहानी को दिखाया गया जो अपने बच्चों के कारण एक दूसरे से अलग रहते हैं। वह अपने बच्चों से इतना तंग आ जाते है कि अंत में उन्हें यह कहकर छोड़कर चले जाते हैं - ‘हुण समा आ गया है इस हुमस भरी दुनिया तो दूर ताजी हवा विच्च साह लईए। ’
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यह कहना है पटियाला के सार्थक रंगमंच के डायरेक्टर लखा लहरी का, जो टैगोर थिएटर में सुचेतक रंगमंच मोहाली द्वारा आयोजित ‘गुरशरन सिंह नाट उत्सव’ में शामिल होने के लिए टैगोर थिएटर पहुंचे थे। वहां शनिवार को उनके थिएटर ग्रुप सार्थक रंगमंच की ओर से पंजाबी नाटक ‘हुमस’ का मंचन हुआ।
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किरपाल कजाक द्वारा लिखे इस नाटक में इंसान की चारों अवस्थाओं बचपन, जवानी, गृहस्थ और बुढ़ापे का जिक्र किया गया। नाटक की शुरुआत एक स्कूल के सीन से होती है जहां पर एक बच्चे को धर्म पर सवाल पूछने पर टीचर की डांट सुननी पड़ती है। साथ ही में यह भी दिखाया गया कि मां बाप अपनी इच्छा अपने सपने अपने बच्चों पर लाद देते हैं और उनसे उनके अरमानों के बारे में पूछा ही नहीं जाता। जीवन की दूसरी स्टेज पर जाकर युवाओं में नौकरियों को लेकर हुमस रहती है।
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सरकारें उनके सामने सपने तो परोस देती है जो कि हकीकत से कोसो दूर होते हैं। वहीं गृहस्थ जीवन को दिखाते हुए पति पत्नी के बीच की तकरार को दिखाया जाता है। अंत में एक बुजुर्ग पति पत्नी की कहानी को दिखाया गया जो अपने बच्चों के कारण एक दूसरे से अलग रहते हैं। वह अपने बच्चों से इतना तंग आ जाते है कि अंत में उन्हें यह कहकर छोड़कर चले जाते हैं - ‘हुण समा आ गया है इस हुमस भरी दुनिया तो दूर ताजी हवा विच्च साह लईए। ’