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ये हैं वो माएं और पत्नियां, जिन्होंने इराक में खो दिए अपने...अब कभी पूरे नहीं होंगे सपने

Mon, 02 Apr 2018 11:49 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Mon, 02 Apr 2018 11:49 AM IST
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Sushma Swaraj Statement in Rajyasabha, 39 Indians Killed by ISIS in Iraq
इराक में मारे गए भारतीय
माओं से बेटे छिन गए, पत्नियों के सुहाग उजड़ गए, बहनों से भाई छूट गए, बच्चों से पिता बिछड़ गए...देखिए ये हैं वो लोग, जिन्होंने इराक में अपने खो दिए।
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मोसुल में अगवा 39 भारतीयों की आईएस ने कर दी हत्या: सुषमा
इराक के मोसुल शहर में चार साल पहले आतंकी संगठन आईएसआईएस द्वारा अपहृत 39 भारतीय मजदूरों को मार डाला गया। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने मंगलवार को राज्यसभा में यह जानकारी देते हुए बताया कि उनके शव बरामद कर लिए गए हैं। इनमें से 27 पंजाब के रहने वाले थे, जबकि चार हिमाचल प्रदेश के निवासी थे। छह लोग बिहार और दो पश्चिम बंगाल के रहने वाले थे। हालांकि यह मालूम नहीं चल पाया है कि भारतीयों की हत्या कब की गई लेकिन मोसुल के उत्तर-पश्चिम में स्थित बदूश नामक गांव में एक सामूहिक कब्र से उनके शव मिले हैं।

इराक में मारे गए 39 भारतीयों के नाम
मारे गए भारतीयों में से 27 पंजाब, छह बिहार, चार हिमाचल प्रदेश और दो पश्चिम बंगाल के हैं। इनमें से धमेंदर कुमार, हरीश कुमार, हरसिमरनजीत सिंह, कंवलजीत सिंह, मलकीत सिंह, रणजीत सिंह, सोनू, संदीप कुमार, मनजिंदर सिंह, गुरचरण सिंह, बलवंत राय, रूप लाल, देविंदर सिंह, कुलविंदर सिंह, जतिंदर सिंह, निशान सिंह, गुरदीप सिंह, कमलजीत सिंह, गोबिंदर सिंह, प्रितपाल शर्मा, सुखविंदर सिंह, जसवीर सिंह, परविंदर कुमार, बलवीर चंद, सुरजीत मेनका, नंद लाल, राकेश कुमार पंजाब के थे। अमन कुमार, संदीप सिंह राणा, इंदरजीत, हेमराज हिमाचल और समर टिकादार, खोखन सिकदेर पश्चिम बंगाल के रहने वाले थे। बिहार के छह लोगों में संतोष कुमार सिंह, बिद्या भूषण तिवारी, अदालत सिंह, सुनील कुमार कुशवाहा, धर्मेंद्र कुमार और राजू कुमार यादव थे।
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सामूहिक कब्र में मिले लंबे बाल और कड़े
सुषमा ने बताया कि डीप पेनीट्रेशन रडार की मदद से चलाए गए खोज अभियान में बदूश में एक टीले के नीचे दबे मानव अवशेषों का पता चला। उसकी खुदाई करवाई गई तो कई मानव अवशेषों में लंबे बाल और कड़े मिले। कई अवशेषों के साथ पहचान पत्र भी थे।
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क्या था मामला
खूंखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) ने जून, 2014 में मोसुल पर कब्जा करने के बाद तारिक नूर अलहुदा कंस्ट्रक्शन कंपनी से 40 भारतीयों का अपहरण कर लिया था। उनमें से पंजाब के गुरदासपुर का रहने वाला हरजीत मसीह उनके कब्जे से भागने में कामयाब रहा था।

‘उम्मीद थी लौट आएंगे, क्या पता था अकेला छोड़ जाएंगे’

Sushma Swaraj Statement in Rajyasabha, 39 Indians Killed by ISIS in Iraq
इराक में मारे गए भारतीय
सात साल पहले रोजी रोटी कमाने इराक गए संगरूर के धुरी निवासी प्रीतपाल शर्मा की मौत की खबर जैसे ही उनके घर वालों तक पहुंचीं, मानो परिवार पर दुखों का पहाड़ ही गिर गया हो। परिवार वालों का रो-रोकर बुरा हाल था, इस दुख की घड़ी में उनके रिश्तेदारों सहित आस पड़ोस के लोग दुख बंटाने उनके घर पहुंचे हुए थे। धुरी निवासी प्रीतपाल शर्मा साल 2011 में इराक गए थे। इराक के मोसुल में 39 भारतीयों को आईएसआई ने अगवा कर लिया था, उसी समय से परिवार चितिंत था।

मंगलवार को परिवार वालों को सूचना मिली की 39 भारतीयों को वहां एक पहाड़ी पर दफना दिया गया है, जिसे सुनते ही घर में मातम छा गया। प्रीतपाल शर्मा की पत्नी राजरानी ने कहा कि उम्मीद थी कि एक न एक दिन प्रीतपाल शर्मा घर लौट आएंगे। लेकिन क्या पता था कि वह इस तरह दुनिया में उन्हें अकेला छोड़ा जाएंगे। उन्होंने विदेश मंत्रालय पर रोष जाहिर करते हुए कहा कि उन्हें पिछले समय से बार-बार विदेश मंत्रालय यही भरोसा दिया जा रहा था कि वहां सभी भारतीय सुरक्षित हैं और उनके साथ संपर्क बना है।

उन्होंने कहा कि विदेश मंत्रालय कह रहा था कि प्रीतपाल शर्मा को 2015 में भी वहां काम करते देखा गया। 2016 में भी उन्हें यही भरोसा दिया था। प्रीतपाल शर्मा के पुत्र नीरज शर्मा ने रोते हुए कहा कि वह पिछले लंबे समय से अपने पिता के सुरक्षित घर वापसी की कामना कर रहे थे। लेकिन अब वह पूरी तरह से टूट गए हैं। क्योंकि विदेश मंत्रालय की ओर से दिए जा रहे भरोसे से लगता था कि उनके पिता घर लौट आएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

बुझ गई चार साल से जल रही दो लाडलों के लौटने की उम्मीद

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इराक में मारे गए भारतीय
इराक के मोसुल से जून 2014 से अगवा चल रहे 39 भारतीयों में शामिल जिले के दो युवकों के परिजनों के दिलों में पौने चार साल से टिमटिमाती उनके जिंदा लौटने की उम्मीद की लौ मंगलवार दोपहर केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की घोषणा के बाद सदा के लिए बुझ गई। होशियारपुर के गांव छावनीकलां में संतोष कुमारी ने रोते हुए कहा कि मंलगवार की भरी दोपहरी में उनके परिवार के लिए ऐसा अंधेरा लाई है, जिससे निकलने के लिए उम्मीद की कोई किरण नहीं बची है।

उन्हें अपने युवा बेटे कमलजीत सिंह के बिछड़ने का गम है। वहीं अपने भाई की बेटी की मांग उजड़ने का दुख भी सता रहा है। बेटे कमलजीत के साथ ही मोसुल में उसी की कंपनी में काम करने वाले अपने भाई के जैतपुर निवासी दामाद गुरदीप सिंह की मौत के दोहरे झटके ने संतोष को तोड़ कर रख दिया है। रुंधे गले और डबडबाई आंखों से पिता प्रेम सिंह ने कहा कि अब तक बेटे से मिलने की तमन्ना में जी रहे थे। लेकिन इस मनहूस खबर से मेरा तो दिल बैठा जा रहा है।

अब तक एक पल के लिए चैन की नींद नहीं सोए
छावनीकलां गांव में अपने घर पर बेटे के गम में विलाप करते मृतक कमलजीत सिंह की मां संतोष कुमारी व पिता प्रेम सिंह ने बताया कि 5 साल पहले जब कमलजीत इराक गया तो हम सभी बहुत खुश थे। जून 2014 में जैसे ही पता चला कि मोसुल में आइएसआइएस आतंकियों ने उनके बेटे और दामाद के साथ-साथ गुरदीप (कमलजीत के मामा का दामाद) को भी अगवा कर लिया है। वह तब से लेकर अबतक चैन की नींद नहीं सोए हैं। हर पल ऐसा लगता था कि अब कमलजीत गांव लौटेगा लेकिन अब तो सारी उम्मीदों टूट गई हैं। अब तो उसका मृत शरीर सरकार लाकर दिखा दे। ताकि बेटे का अंतिम संस्कार तो यहां कर सकूं।

सदमे में बेहोश हुई गुरदीप की मां, अस्पताल में भर्ती

Sushma Swaraj Statement in Rajyasabha, 39 Indians Killed by ISIS in Iraq
इराक में मारे गए भारतीय
होशियारपुर में ब्लाक माहिलपुर के गांव जैतपुर में हालत उस समय गमगीन हो गए जब पौने चार साल पहले इराक में अगवा हुए गुरदीप सिंह के इराक में मारे जाने का समाचार वहां पहुंचा। उसके परिवार जन इस बात से बेखबर थे और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज द्वारा काफी लंबे समय से दिए जा रहे आश्वासन से चिंता मुक्त होकर अपने कामकाज में व्यस्त थे। इस दौरान उनके घर पहुंचे एक निजी टीवी चैनल के पत्रकार ने बलजीत की मां से बातचीत करनी चाही तो गुरदीप के न रहने की बात सुनकर वह वह बेहोश हो गई। उसे तुरंत उपचार के लिए सिविल अस्पताल माहिलपुर में भर्ती कराया गया।

कई बार भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से भी मिले
गुरदीप के भाई मनजिंदर सिंह तथा चाचा जरनैल सिंह ने बताया कि गुरदीप सिंह (35) पुत्र मुखत्यार सिंह तीन भाइयों में सबसे बड़ा था। उसके दो भाइयों में से एक भाई बहादर सिंह दुबई में रोटी रोजी के चक्कर में गया है। एक भाई मनजिंदर यहां पर ही डेंटल क्लीनिक खोल कर अपना काम करता है। पिता मुखत्यार सिंह पूर्व सैनिक है। गुरदीप सिंह भी घर के हालात को सुधारने के चक्कर में करीब 4 वर्ष पहले इराक की एक कंपनी में काम करने गया था।

उनका परिवार पीड़ित सभी परिवारों के साथ कई बार भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से भी मिल चुका है। लेकिन भारत सरकार हर बार सभी लोगों के परिवारों को 39 भारतीयों को सकुशल भारत लाने की बात करती रहीं। करीब दो माह पहले ही सभी पीड़ितों के परिवारों के ब्लड सैंपल लेकर भारत से इराक भेजे गए। लेकिन कभी किसी ने नहीं सोचा था कि रोजी रोटी कमाने गए हमारे लाडले कभी भारत नहीं आ पाएंगे। मृतक दो छोटे छोटे बच्चों का पिता था। जब गया था तो एक लड़की अंकिता करीब एक साल की थी और उसका एक बेटा आरुष का जन्म उसके जाने के करीब दो माह बाद हुआ। उसने तो अपने बाप को सिर्फ तस्वीरों में ही देखा है।

‘जदों वी फोन दी घंटी वजदी तां लगदा मेरे भाई दा फोन आ गया’

Sushma Swaraj Statement in Rajyasabha, 39 Indians Killed by ISIS in Iraq
इराक में मारे गए भारतीय
‘हाय ओ रब्बा, एह की भाणा वरतेया, साडी तां दुनिया ही लुट्टी गई।’ ये रुदन जिले के गांव मुरार को सुनने को मिले, जहां पर इराक के मोसुल शहर में पांच साल पहले काम करने गए कपूरथला के गोबिंदर सिंह की मौत की खबर पहुंची। विदेश मंत्रालय से जैसे ही मंगलवार सुबह गोबिंदर के भाई दविंदर सिंह को फोन पर आया तो घर में चीखो पुकार मच गई। पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई। बेटे की सलामती की उम्मीद पर टिके गोबिंदर के बूढ़े पिता बचित्र सिंह पर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। गोबिंदर की पत्नी अमरजीत कौर का तो हाल बेहाल हो गया।

रोते हुए अमरजीत कौर ने बताया कि अब तक जितनी बार भी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मुलाकात हुई तो वह उनके पति के कभी चर्च तो कभी फैक्टरी में काम करने की बात कहती रहती थीं। उनकी आखिरी बार 2014 में अपने पति से बात हुई थी, उस समय उन्होंने जल्द सभी साथियों के साथ वापस आने की बात कही थी। अमरजीत ने सवाल उठाया कि अगर सरकार को चार माह पहले जब डीएनए के लिए सैंपल लिए गए थे, तब मरने की बात पता चल गई थी तो उस समय क्यों नहीं बताया। इस बात का जवाब वह विदेश मंत्री से चाहती हैं। अब तक उन्हें गुमराह क्यों किया गया।

बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने के लिए 2013 में मोसुल गए थे गोबिंदर
गांव मुरार के गोबिंदर सिंह (45) मई 2013 में घर के खर्च और बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने के मकसद से डेढ़ लाख रुपये कर्ज लेकर एक ट्रेवल एजेंट के मार्फत इराक के मोसुल में वेल्डर के काम के लिए गए थे। वहां पर 11 महीने तक तो सब ठीक चलता रहा। जैसे ही हालात बिगड़े तो गोबिंदर ने घर वापसी का मन बनाया, लेकिन जून 2014 में उनकी घर से बातचीत बंद हो गई। कुछ समय के बाद परिवार को पता लगा कि गोबिंदर समेत 39 भारतीयों को आईएसआईएस ने बंधक बना लिया गया है।

फिर बीच में वहां से वापस लौटे एक व्यक्ति हरजीत मसीह की ओर से बंधक 39 भारतीयों के मारे जाने की भी बात की, जिसके चलते एक बार तो परिवार का विश्वास डगमगाया, लेकिन भारत सरकार और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के भरोसे ने परिवार के विश्वास को टूटने नहीं दिया। इसके बाद परिवार लगातार सरकार और विदेश मंत्री से मिलते रहे, लेकिन अब जब वहां पर बंधक बनाए गए 39 भारतीयों के मारे जाने की खबर भी आ गई है तो गोबिंदर की पत्नी, उनके बेटे, पिता और भाई सदमे में हैं।

‘पति की खबर नहीं मिली तो ससुरालियों ने भी घर से निकाला’

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इराक में मारे गए भारतीय
आदमपुर के पास गांव गाजीपुर की रहने वाली हरविंदर कौर के पति कमलजीत सिंह इराक में लापता क्या हुए, ससुराल वालों ने भी उनका हाथ छोड़ दिया। हरविंदर कौर की शादी 2010 में होशियारपुर के छावनी कला के रहने वाले कमलजीत से हुई थी। शादी के बाद दो बच्चे मनप्रीत सिंह और सिमनरीजत कौर हुए। 2013 में कमलजीत इराक चले गए और 2014 के बाद उनका कोई पता नहीं लगा। एक साल तक तो ससुराल वाले ठीकठाक रहे, लेकिन बाद में हरविंदर कौर को मायके भेज दिया। होशियारपुर सेे वापस हरविंदर अपने मायके गाजीपुर आ गई। वहां पर पिता भजन सिंह और मां कुलविंदर कौर के पास रहने लगी। मंगलवार को कुलविंदर कौर गुमसुम थी। उनकी माता कुलविंदर कौर कहने लगी कि इसके तो आंसू ही सूख गए, चार साल से दिन रात रोती रही।

‘फोन पर कुलविंदर ने कही थी हालात ठीक न होने की बात’
भोगपुर के गांव फतेहगढ़ के कुलविंदर सिंह साल 2013 में इराक गए और जून 2014 के बाद उनका कुछ पता नहीं लग सका है। गांव फतेहगढ़ में मातम पसरा हुआ था, लेकिन अमनदीप के घर से चीखों की पुकार पूरे गांव की शांति को चीरकर सुनने को मिल रही थी। अमनदीप कौर का रो रोकर बुरा हाल था। एक बुजुर्ग महिला बताने लगी कि अमन पति कुलविंदर की याद में चार सालों से रोती आ रही है। कुलविंदर ने अपनी पत्नी अमनदीप कौर को फोन पर बताया था कि यहां हालात ठीक नहीं हैं।

उन्होंने कहा था कि जिस कंपनी में वह काम कर रहे हैं, वह भी साथ नहीं दे रही। खाने के लाले पड़े हुए हैं, सभी दोस्त वापसी की कोशिश कर रहे हैं इतना कहते ही उन्होंने फोन काट दिया। इसके बाद तो खबर यह आई कि उनको अगवा कर लिया गया है। कुलविंदर घर के हालात बेहद खराब हैं। कुलविंदर का विवाह साल 2006 में हुआ था। उनके दो जुड़वा बच्चे बेटी संजना और बेटा हर्ष हैं।

पिता के इंतजार में बेटे ने नहीं करवाई शादी
होशियारपुर रोड पर गांव ढड्डे में मंगलवार को मातम छाया हुआ था। हर कोई चौराहे पर खड़ा होकर बलवंत राय कैंथ के बारे में जिक्र कर रहा था। सुषमा स्वराज ने लोकसभा में खुलासा किया तो तत्काल किसी ने खबर बलवंत राय के परिवार वालों तक पहुंचा दी। इसके बाद गांव के लोगों का जमघट लगने लगा। बेटे पवन कुमार ने अभी तक शादी नहीं रचाई, उनको यकीन था कि उसके पिता एक दिन जरूर वापस आएंगे और वह उसी दिन घर में उनकी बहू लेकर आएगा। बलवंत राय के करीबी रिश्तेदार जसपाल ने बताया कि हमें खुद ही यकीन नहीं है कि उनकी हत्या हो चुकी है। अतीत में जाकर बताते हैं कि हमारे खानदान में आरती नामक युवती की शादी थी, कई दिनों तक हम यह विचार करते रहे कि बलवंत भाजी ने आ ही जाना है, हम शादी लेट कर लेते हैं। बलवंत की पत्नी ज्ञानो का रो-रोककर बुरा हाल था।

4 लाख खर्च कर भेजा था इराक, अब परिवार पर 10 लाख कर्ज

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इराक में मारे गए भारतीय
गांव चूहड़वाली के रहने वाले सुरजीत मेणका 2013 में इराक गए थे। 2014 में घटना से पहले उन्होंने अपनी पत्नी ऊषा को फोन किया और इतना ही कहा था कि मेरे फोन आ जाए तो समझना की जिंदा हूं.. न आए तो समझना खत्म, हमें किडनैप कर लिया गया है। किसी समय भी मारा जा सकता हूं। इसके बाद सुरजीत चिल्लाने लगा और रोने लगा था और फोन कट गया। ऊषा रानी को एक चिंता थी, जिसको वह रो-रोकर कह रही थी कि अब उनकी सात साल की बच्ची टविन्स मेणका का क्या होगा? परिवार के पास रोजी रोटी का कोई साधन नहीं है।

चाचा हरमेश लाल ने बताया कि सुरजीत माणके पहले तीन बार दुबई गए, लेकिन उनके साथ एजेंटों ने धोखा कर दिया और उनको वापस आना पड़ा था। इराक में उनको एक अच्छी सैलरी की ऑफर आई थी, उनको 45 हजार प्रतिमाह मिलना था। इस लालच में सुरजीत ने किसी से चार लाख ब्याज पर लिये और यह ठानकर गए थे कि वह दस माह में सारा कर्ज उतार देेेंगे, लेकिन परिवार को क्या पता था कि वह कुछ माह बाद ही आतंकवादियों ने उनको मार दिया। अब ब्याज समेत पैसा 10 लाख रुपये तक पहुंच गया है। मां हरबंस कौैर भी किसी तरह से मेहनत मजदूरी कर पेट पाल रही हैं।

दिमागी बीमारी से ग्रस्त हो गयी रूप लाल की पत्नी
नकोदर के पास बाठ कलां की रहने वाली कमलजीत कौर अपने पति के गम में कई सालों तक दिमागी बीमारी से ग्रस्त रही हैं। घर की सारी जिम्मेदारी उनके कंधों पर है। दो बेटों सौरभ व करण को पढ़ाना, लिखाना भी है और उनका भविष्य कैसे बनेगा, इसे लेकर कमलजीत कौर रोने लगती हैं। बार-बार बच्चों को देखकर उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगती है। सरपंच कुलविंदर अहीर ने बताया कि परिवार ने काफी दुख सहन किया है। रोजाना कमलजीत अपने पति की राह देखती थी, हमेशा यही कहती थी कि रूप लाल जरूर वापस आएंगे। घर की आर्थिक तंगी को दूर करने के लिए रूप लाल इराक गए थे, लेकिन 2014 के बाद से परिवार के साथ संपर्क नहीं हुआ। पत्नी किसी तरह से मेहनत मजदूरी कर दोनों बच्चों को दो वक्त की रोटी खिला रही थी।

 

मां और बहन ने कहा, अब सरकार से भरोसा ही उठ गया

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इराक में मारे गए भारतीय
केंद्र सरकार की ओर से इराक में 39 भारतीयों की मौत की पुष्टि के बाद बटाला के गांव तलवंडी झूरा के धर्मेंद्र कुमार के घर में मंगलवार को मातम पसर गया। पूरे गांव के लोग धर्मेंद्र के घर पहुंच गए। उनका रो-रो कर बुरा हाल था। धर्मेंद्र कुमार वासी तलवंडी झूगलां की मां कंवलजीत औैर बहन डिंपलजीत ने बताया कि उन्हें जब टीवी पत्रकारों ने घर पहुंच कर उनको यह दुखद समाचार सुनाया तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्होंने कहा पहले तो सरकार ने उन्हें दिलासा दी था, आज  उनका सरकार से भरोसा उठ गया है।

सरकार के आश्वासन से उन्हें उम्मीद थी कि कभी न कभी वह घर लौटेगा, अब उनकी आस पर भी टूट गई है। उन्होंने बताया कि अभी धर्मेंद्र के पिता को इसके बारे में नहीं पता है। वह बीमार हैं जब उन्हें इस बात का पता चलेगा तो वह टूट जाएंगे। उन्होंने बताया कि धर्मेंद्र कुमार 2013 में इराक गया था। धर्मेंद्र की मां ने बताया कि उनका सपना था कि जिस दिन उनका बेटा आएगा, उस दिन दीवाली मनाई जाएगी। बहन डिंपलजीत का कहना है कि अब वह कभी अपने भाई को राखी नहीं बांध पाएंगी।

सुनहरे भविष्य के लिए संदीप गए थे इराक
गांव अलेवाल निवासी संदीप कुमार 2012 में इराक गए थे। पिता तरसेम लाल बुजुर्ग हो चुके थे और संदीप कुमार की इच्छा थी कि विदेश जाकर वह अच्छा कमाएंगे और परिवार का भविष्य सुनहरा कर देंगे। मां सुमित्रा को भी वह दिलासा देकर गए थे कि मैं सख्त मेहनत करूंगा और आप देखना कि हमारे दिन बदल जाएंगे और घर में रौनक आ जाएगी। मां ने भी आशीर्वाद देकर बेटे को रवाना किया था। मां रो-रोकर कह रही थी कि मुझे क्या पता था, हम गरीबी व तंगी में गुजारा कर लेते, लेकिन मेरा तो कलेजा ही चीर लिया।

39 भारतीयों को बचाने में केंद्र सरकार रही फेल: सरदारा सिंह

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इराक में मारे गए भारतीय
इराक में मौत का शिकार हुए गुरचरण सिंह जोकि जलालउसामा का रहने वाला है। गुरचरण के परिवार वाले उसकी मौत की खबर पर यकीन नहीं कर रहे हैं। गुरचरण सिंह के पिता सरदारा सिंह ने कहा कि उनका बेटा रोटी रोजी की तलाश में जून 2013 में इराक गया था। उन्होंने कहा कि 39 भारतीयों को कैद करने की खबर के बाद से ही केंद्र सरकार से उन्हें जल्द ही उनके बेटे के वापस आने का भरोसा मिला था। लेकिन बेटे की मौत की सूचना के बाद उनको यकीन हो गया है कि केंद्र सरकार उनके बेटे जैसे 39 भारतीयों को छुड़ाने में असफल रही है।

‘बेटे के बिना हमारा जीना बेकार है’
इराक के मोसुल में 39 भारतीयों की मौत हो जाने के बाद परिवारों में मातम छा गया है। इन 39 भारतीयों में कुछ ऐसे नौजवान भी थे, जो कि पंजाब के थे। इनके घर वालों का हाल बेहाल है। तहसील अजनाला के तहत आते गांव संगुआणा के निशान सिंह की मौत के बाद माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल है। मारे गए निशान सिंह के घर में उसके माता-पिता व एक भाई है। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा, कि उनका बेटा अब इस दुनिया में नहीं है। उन्होंने कहा कि अब हमारा जीना भी बेकार है।

जमीन बेचकर बेटा विदेश भेजा था, आई बेटे की मौत की खबर
अमृतसर के ब्लाक चौंगांवा के तहत आते गांव मानावाला के रणजीत सिंह के घर उसकी मौत की खबर पहुंचते ही उसके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। रणजीत सिंह जो दो बहनों का एक भाई था, उसके पिता ने जमीन बेचकर इराक गरीबी दूर करने के लिए भेजा था। रणजीत सिंह की विधवा मां दो बेटियों के साथ अपने बेटे के आने का इंतजार कर रही थी। लेकिन मंगलवार को बेटा तो नहीं आया, लेकिन मौत की खबर आ गई। मौत की खबर आते ही रणजीत सिंह की मां व उसकी दो बहनों का रो-रो कर बुरा हाल है। उनका कहना था कि उन्हें सरकार ने धोखे में रखा। सरकार उनके बेटे सहित 39 भारतीयों को वापस लाने में नाकाम रही।

‘हुण ता साढा कोई सहारा वी नहीं रिहा’
अमृतसर के गांव सिआलका के जतिंदर सिंह (24) के पिता कैंसर की बीमारी से पीड़ित हैं। वह अपने बेटे के विदेश जाने के बाद अच्छे दिन का इंतजार कर रहे थे। लेकिन बेटे की मौत की सूचना के साथ सब कुछ जैसे खो गया। जतिंदर सिंह के माता-पिता की इस बात का यकीन ही नहीं कर पा रहे हैं कि उनका बेटा अब इस दुनिया में नहीं है। जतिंदर सिंह की माता राजविंदर कौर का रो-रोकर बुरा हाल है। उनका कहना है कि 8 माह पहले उन्होंने अपने बेटे को इराक भेजा था। जिस दिन उन्हें खबर मिली कि उनके बेटे को आंतकियों ने अगवा कर लिया है तो उनको उम्मीद थी कि भारत सरकार उनके बेटे को जरूर छुड़ाएगी। लेकिन बेटे की मौत के बाद अब दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। उन्होंने कहा कि हुण ता साढा कोई सहारा वी नहीं रिहा, हुण साढा जीना काहदा जीना रह गया ए। इतना कहते ही तजिंदर सिंह की माता फफक-फफक कर रो पड़ी।

कंवलजीत नहीं देख सका बेटी का चेहरा

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इराक में मारे गए भारतीय
इराक में 39 भारतीय के मारे जाने की खबर से बटाला के गांव रूपावाली के रहने वाले कंवलजीत सिंह के घर में भी मातम छा गया। मंगलवार को सुबह कवंलजीत सिंह के घर में पूरा गांव इकट्ठा था। परिजनों के रोने की आवाजों से हर की आंखों में आंसू आ गए। कंवलजीत सिंह के पिता हरभजन सिंह वासी गांव रूपावली ने बताया कि मंगलवार को सुबह उनके किसी रिश्तेदार की मौत हो गई थी और वह वहीं पर गए थे। इसी दौरान उनके दामाद का फोन आया, जिसने बताया कि सरकार ने इराक में फंसे 39 भारतीयों की मौत हो जाने की पुष्टि की है।

उन्होंने बताया कि खबर सुनते ही उनके शरीर से तो जैसे जान ही निकल गई। हरभजन सिंह ने बताया कि बेटा कंवलजीत (29) करीब साढ़े चार वर्ष पहले इराक गया था। वह वहां क्रेन आपरेटर के तौर पर काम करता था। उसके इराक जाने के बाद बेटी पैदा हुई। कंवलजीत ने अभी तक अपनी बेटी का चेहरा भी नहीं देखा था। हरभजन सिंह ने बताया कि उसका बड़े बेटे की 22 वर्ष की आयु में ही मौत हो गई थी। अब कंवलजीत भी इस दुनिया से चल गया है। उनके आगे पीछे कोई नहीं रहा है। एक पोती है, वह भी अपने ननिहाल में हैं।

‘विदेश मंत्री ने कही थी बेटे के बांग्लादेश में काम करने की बात’
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की घोषणा के बाद इराक में कई सालों से लापता कादियां के मोहल्ला हरीजन के राकेश कुमार (21) के घर पर मातम छा गया। भाई दीपक और पिता मदन लाल ने बताया कि राकेश कुमार 2013 में इराक की कंपनी तारीक नूर अलहुदा कमटिन 22 में रोजगार के लिए गया था। 16 जून 2014 को उससे फोन पर अंतिम बार बात हुई। उसने हमें बताया था कि हमारी कंपनी पर आतंकवादियों का कब्जा हो चुका है। वह हमें यहां से कहां ले जा रहे हैं, कोई पता नहीं है। इसके बाद हमारी उससे बात नहीं हुई।

इस घटना के बारे में हमने एक पत्र नायब तहसीलदार कादियां को दिया था। दादी भी अपने लाडले की तस्वीर लिए बहुत भावुक थी। दीपक और मदन लाल ने बताया कि वह बीते कई सालों से विदेश मंत्रालय के चक्कर काटते रहे, लेकिन हमें सही सूचना मंत्रालय ने आज तक नहीं दी। जब विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से लापता परिवार वाले मिले तो वह यही कहतीं कि आपके बेटे बांग्लादेश में कहीं काम कर रहे हैं, हम पता कर रहे हैं। आज जब सदन में उनसे पूछा गया तो कह रही है वह मर चुके हैं, यह हमारे साथ अन्याय हुआ है।

उन्होंने कहा कि राकेश अब दुनिया में नहीं रहा, लेकिन हमारी खबर लेने कोई सरकारी अफसर नहीं आया है। पारिवारिक सदस्यों ने सरकार की कार्य प्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। परिवार ने केंद्र और पंजाब सरकार से मांग की है कि राकेश कुमार के बूढे़ हो चुके परिजनों को सहारा दिया जाए।
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