{"_id":"ca852dcf2c8a3dcfdcdb88ed72294a7e","slug":"success-or-failure-depends-on-the-performance-of-the-bjp","type":"story","status":"publish","title_hn":"यहां जब भाजपा हारती है, कांग्रेस लाभ उठाती है","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
यहां जब भाजपा हारती है, कांग्रेस लाभ उठाती है
अनिल भारद्वाज/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Thu, 03 Apr 2014 03:33 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पंजाब में कांग्रेस की सफलता या असफलता भाजपा के प्रदर्शन पर निर्भर करती है। पिछले कुछ चुनावों से यह सिलसिला जारी है।
विज्ञापन
1997 के विधानसभा चुनाव से लेकर अब तक हुए विभिन्न चुनावों में यह बात स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आई है। भाजपा जिन सीटों पर चुनाव हारती है, वह कांग्रेस की झोली में चली जाती हैं और अकाली-भाजपा गठबंधन बहुमत के आंकड़े से दूर रह जाता है, भले ही शिअद की सीटें कितनी भी रहें। इसी प्रकार भाजपा की जीत कांग्रेस की हार में बदल जाती है और यह बहुमत से चूक जाती है।
यही परंपरा लोकसभा चुनाव में भी देखने को मिल रही है। अकाली-भाजपा समझौते के तहत पंजाब विधानसभा चुनाव में शिअद 94 तथा भाजपा 23 सीटों पर चुनाव लड़ती हैं। वहीं, लोकसभा चुनाव में शिअद 10 तो भाजपा तीन सीटों पर अपने प्रत्याशी मैदान में उतारते हैं।
विज्ञापन
1997 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की 117 में से भाजपा को अपने कोटे की 23 में से 18 सीटें मिली थीं तथा इन सभी सीटों पर कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था। कांग्रेस को प्रदेशभर में केवल 14 सीटों पर जीत प्राप्त हुई थी और इसमें काफी हद तक अहम भूमिका हर सीट पर भाजपा के बढ़े मत प्रतिशत की थी।
विज्ञापन
2002 के विधानसभा चुनाव में कहानी पलट गई। भाजपा 23 में से केवल तीन सीटों पर जीत हासिल कर सकी और बाकी की 20 सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशी जीते।
प्रदेश में भाजपा के घटे मत प्रतिशत का लाभ कांग्रेस को अन्य सीटों पर भी मिला और यह अन्य 42 सीटें जीत कर सरकार बनाने में कामयाब रही। इस चुनाव में शिअद को 21 सीटें मिलीं। यदि भाजपा की सीटों का आंकड़ा 1997 के चुनाव वाला ही रहता तो गठबंधन 60 सीटों के साथ सरकार बना जाता।
2007 में तस्वीर फिर बदली और भाजपा की सीटों का आंकड़ा तीन से बढ़कर 19 हो गया। कांग्रेस को भाजपा द्वारा जीती गई 16 अतिरिक्त सीटों का सीधा नुकसान तो हुआ ही अन्य सीटों पर बढ़े भाजपा के मत प्रतिशत की वजह से इसे 44 सीटों पर संतोष करना पड़ा। सरकार अकाली-भाजपा गठबंधन की बनी।
फिर 2012 के चुनाव में बेशक भाजपा का प्रदर्शन 2007 से कुछ कम रहा, लेकिन इसकी सीटों की संख्या 12 तक पहुंच गई। इस प्रकार कांग्रेस को केवल सात सीटों का फायदा भाजपा से मिला और यह 46 सीटों तक ही पहुंच पाई। यदि भाजपा उक्त 12 सीटों भी हार जाती तो निश्चित तौर पर 58 के आंकड़े के साथ सरकार बनाने के करीब पहुंच जाती।
बात लोकसभा चुनाव की करें तो 2009 में भाजपा का प्रदर्शन 2007 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले निराशाजनक रहा। 2007 के चुनाव में 19 विधानसभा सीटें जीतने वाली भाजपा को 2009 के आम चुनाव में केवल 2 विधानसभा क्षेत्रों में ही बढ़त मिल पाई। नतीजा, भाजपा का यह प्रदर्शन इसके कोटे की दो लोकसभा सीटें हारने के साथ-साथ 6 सीटों पर शिअद प्रत्याशियों की हार का कारण भी बना और कांग्रेस 8 सीटें जीतने में कामयाब रही।
2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने कोटे की सभी तीन सीटें जीतीं, तो शिअद को भी इसके बढ़े मत प्रतिशत का लाभ मिला और इसके 8 प्रत्याशी जीते। कांग्रेस केवल 2 सीटों पर सिमट गई।
इसी प्रकार 1999 के आम चुनाव में भाजपा को 2, शिअद को 5 और कांग्रेस को 3, जबकि 1998 में भाजपा को 2, शिअद को 6 तो कांग्रेस को 4 सीटों पर जीत मिली। इस प्रकार आगामी 30 अप्रैल को पंजाब की 13 लोकसभा सीटों पर होने वाले मतदान में भाजपा के प्रदर्शन पर ही कांग्रेस का भविष्य निर्भर करेगा।