{"_id":"2dbbeea44e9aa4d39b64bfa43e4d3253","slug":"shaktipeeth-kali-mata-temple","type":"story","status":"publish","title_hn":"इस मंदिर के नाम पर शहर का नाम पड़ा कालका","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
इस मंदिर के नाम पर शहर का नाम पड़ा कालका
ब्यूरो/अमर उजाला, कालका
Updated Mon, 31 Mar 2014 12:42 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सीमा क्षेत्र में हरियाणा के आखिरी और हिमाचल के पहले द्वार स्थित सिद्ध शक्तिपीठ काली माता मंदिर में सोमवार से नवरात्र मेला शुरू होगा। इसके लिए मंदिर को आकर्षक ढंग से सजाया गया है और सुरक्षा व्यवस्था भी दुरुस्त कर दी गई है।
विज्ञापन
पौराणिक कथाओं के अनुसार, काली माता मंदिर के नाम पर ही शहर का नाम कालका पड़ा था। मान्यता है कि यहां मांगी गई हर मुराद पूरी होती है।
किंवदंति के अनुसार, सतयुग में महिषासुर, चंड-मुंड, शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज आदि राक्षसों का उपद्रव बढ़ गया था, जिससे देवता भी डरकर कंदराओं में छिपे फिरते थे। एक दिन सभी देवताओं ने आदिशक्ति श्री जगदंबा मातेश्वरी की स्तुति की, जिससे प्रसन्न होकर माता एक बालक के रूप में प्रकट हुईं।
विज्ञापन
देवताओं का दुख सुनकर माता ने अपने स्वरूप को विस्तृत किया, जिसके हजारों हाथ पैर थे। सभी देवाताओं ने आदिशक्ति को अपना एक-एक शस्त्र दिया। विष्णु ने चक्र, शिव ने त्रिशूल, ब्रह्मा ने कमंडल, इंद्र ने वज्र, शेषनाग ने शेषफांस, यमराज ने यमफांस आदि शस्त्र माता को अर्पण किए।
विज्ञापन
इसके बाद माता जगदंबा रणभूमि में उतरीं और महिषासुर सहित अन्य दैत्यों का संहार करके कालका भूमि स्थल पर स्थित हुईं, जो कालांतर में कालका में काली माता के नाम से प्रसिद्ध हुई।
धारणा ऐसी भी है कि भगवान कृष्ण के द्वापर युग में जब पांडव जुए में हार गए थे तो उन्हें 12 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास हुआ। उस दौरान वह विराटनगर में 12 वर्ष रहे। उस समय केवट राजा के राज्य में गाय की बहुत सेवा की जाती थी। वहीं एक श्यामा नामक गाय रोजाना अपने दूध से माता की पिंडी का अभिषेक करती थी। यह करिश्मा देख पांडव आश्चर्यचकित रह गए व पांडवों ने इसी स्थान पर मंदिर की स्थापना की।