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साक्षी मलिक है रियल की लेडी सुल्तान, इनके इस दांव का कोई तोड़ नहीं
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक(हरियाणा)
Updated Wed, 24 Aug 2016 11:10 AM IST
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साक्षी मलिक
- फोटो : PTI
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फिल्मी 'सुल्तान के दांव की तरह ही पहलवान साक्षी मलिक का भी एक अपना दांव है, विरोधियों के पास इसका कोई जवाब नहीं। दांव का नाम है ‘दोहरी पट’। वह रिंग में तुरंत अटैक करती हैं और विरोधी के दांव को काटने में माहिर हैं। इसी का परिणाम है कि आज साक्षी का नाम देश की हर जुबां पर है। साक्षी की यह खासियत सांझा की है उनके कोच ईश्वर सिंह दहिया ने।
सिसाना निवासी कोच ईश्वर ने बताया कि साक्षी को कुश्ती का जुनून है, वह हर पल अपने दांव पेच का ही अभ्यास करती रहती है। वह समय की बेहद पाबंद है। 5 अप्रैल 1994 को खेल विभाग से सेवानिवृत्ति के बाद छोटूराम स्टेडियम में प्रशिक्षण देना शुरू किया। यहां 100 से अधिक राष्ट्रीय खिलाड़ी हैं। वर्ष 2004 में मेरे पास साक्षी आई तो उस समय भी उसके अंदर कुश्ती को लेकर पूरा जुनून था।
साक्षी की इच्छा थी कि भले ही उसके मृत शरीर को मेडल पहनाया जाए, लेकिन मेडल हर हाल में चाहिए। इसी का परिणाम था कि वह अंतिम सेकेंड तक प्रतिद्वंद्वी से लड़ी और अंतिम क्षणों में बाजी पलट दी। इसी लगन के चलते साक्षी ने सबसे कम समय में परिणाम दिखाया है। अगले ओलंपिक 2020 में उसका गोल्ड मेडल निश्चित है। वे अभी साक्षी को मिले मेडल से संतुष्ट नहीं हैं, क्योंकि उसमें गोल्ड जीतने की क्षमता है।
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सिसाना निवासी कोच ईश्वर ने बताया कि साक्षी को कुश्ती का जुनून है, वह हर पल अपने दांव पेच का ही अभ्यास करती रहती है। वह समय की बेहद पाबंद है। 5 अप्रैल 1994 को खेल विभाग से सेवानिवृत्ति के बाद छोटूराम स्टेडियम में प्रशिक्षण देना शुरू किया। यहां 100 से अधिक राष्ट्रीय खिलाड़ी हैं। वर्ष 2004 में मेरे पास साक्षी आई तो उस समय भी उसके अंदर कुश्ती को लेकर पूरा जुनून था।
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साक्षी की इच्छा थी कि भले ही उसके मृत शरीर को मेडल पहनाया जाए, लेकिन मेडल हर हाल में चाहिए। इसी का परिणाम था कि वह अंतिम सेकेंड तक प्रतिद्वंद्वी से लड़ी और अंतिम क्षणों में बाजी पलट दी। इसी लगन के चलते साक्षी ने सबसे कम समय में परिणाम दिखाया है। अगले ओलंपिक 2020 में उसका गोल्ड मेडल निश्चित है। वे अभी साक्षी को मिले मेडल से संतुष्ट नहीं हैं, क्योंकि उसमें गोल्ड जीतने की क्षमता है।
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खेल के मैदान में महिला-पुरुष कुछ नहीं होता
साक्षी मलिक
- फोटो : PTI
कोच ईश्वर ने महिला पहलवान के सवाल पर कहा कि खेल के मैदान में जातपात, छोटा-बड़ा और महिला-पुरुष जैसा कुछ नहीं होता। 2003 में उनके पास दो लड़कियां थी और आज 30 से 40 लड़कियां पहलवानी सीख रही हैं। मैदान में विश्वसनीय कोच होना चाहिए, बाकी कोई सवाल होता ही नहीं है।
यूं जाने दोहरी पट
इसमें पहलवान विरोधी का बैलेंस बिगाड़ देता है और दोहरी पट दे देता है। इसमें सामने वाला पहलवान खतरे में आ जाता है और दोहरी पट देने वाले को चार अंक सीधे मिल जाते हैं।
नर्सरी है पैसा नहीं
कोच ईश्वर ने प्रदेश के पहलवानों की स्थिति पर कहा कि कहीं नर्सरी नहीं है। जहां नर्सरी है तो पैसा नहीं है। इसलिए एक सिस्टम होना चाहिए। जब सिस्टम खराब होता है तो गड़बड़ होना लाजमी हो जाता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि चीन का सालाना खेल बजट 23 हजार करोड़ है और हमारा 1200 करोड़।
यूं जाने दोहरी पट
इसमें पहलवान विरोधी का बैलेंस बिगाड़ देता है और दोहरी पट दे देता है। इसमें सामने वाला पहलवान खतरे में आ जाता है और दोहरी पट देने वाले को चार अंक सीधे मिल जाते हैं।
नर्सरी है पैसा नहीं
कोच ईश्वर ने प्रदेश के पहलवानों की स्थिति पर कहा कि कहीं नर्सरी नहीं है। जहां नर्सरी है तो पैसा नहीं है। इसलिए एक सिस्टम होना चाहिए। जब सिस्टम खराब होता है तो गड़बड़ होना लाजमी हो जाता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि चीन का सालाना खेल बजट 23 हजार करोड़ है और हमारा 1200 करोड़।