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चंडीगढ़ः करोड़ों की हाईटेक मशीनें खरीद ली, पर फायदा एक मरीज को नहीं हुआ, उठे सवाल
Wed, 15 Jan 2020 02:40 PM IST
पंचकुला ब्यूरो
अमर उजाला, चंडीगढ़
अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: पंचकुला ब्यूरो
Updated Wed, 15 Jan 2020 02:40 PM IST
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पीजीआई चंडीगढ़
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मरीजों को विश्व स्तरीय चिकित्सा सुविधा मुहैया करवाने के नाम पर पीजीआई प्रशासन हर साल करोड़ों रुपये की हाइटेक मशीनें खरीद रहा है। लेकिन अफसोस है कि इन मशीनों का फायदा मरीजों को नहीं मिल पा रहा है।
रेडियोलॉजी डिपार्टमेंट के मियाबीलैब की आटोमैटिक इंजेक्टर मशीन और हाई इंटेंसिटी फोकस अल्ट्रासाउंड मशीन (हाईफू) इसके दो बड़े उदाहरण हैं। इन दो मशीनों को बिना किसी योजना के आनन-फानन में खरीद तो लिया गया है, लेकिन तकरीबन पांच साल बीत जाने के बाद भी मरीजों तक इसका लाभ नहीं पहुंच सका है।
गाइनी की मशीन का ट्रामा सेंटर में क्या काम...
पीजीआई के रेडियोलॉजी डिपार्टमेंट की ओर से 2014-15 में करीब चार करोड़ की लागत से हाई इंटेसिटी फोकस अल्ट्रासाउंड मशीन खरीदी गई थी। गर्भाशय के ट्यूमर संबंधी मर्ज में जांच के लिए काम आने वाली इस मशीन को संबंधित डिपार्टमेंट में लगाने के बजाय ट्रामा सेंटर में इंस्टॉल कर दिया गया है।
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ट्रामा के डॉक्टरों और कर्मचारियों का कहना है कि यहां 24 घंटे इमरजेंसी रहती है, ऐसे में इस मशीन को चलाने का कहां मौका मिलेगा। जब इस मशीन का इस्तेमाल महिलाओं से संबंधित बीमारी का इलाज करने के लिए होता है तो इसे गाइनी वार्ड में लगाना चाहिए था। इसमें चौंकाने वाली बात यह है कि इस मशीन की खरीद के बाद इससे संबंधित तकनकी ट्रेनिंग भी कराई जा चुकी है। लेकिन ट्रेनिंग लेने वाले डॉक्टरों में गाइनी डिपार्टमेंट से किसी को शामिल नहीं किया गया है।
कब बाहर आएगा ऑटोमैटिक इंजेक्टर
हाइटेक और महंगी मशीनों को खरीदने के क्रम में रेडियोलॉजी डिपार्टमेंट ने ही 25 लाख रुपये का आटोमैटिक इंजेक्टर मंगवाया था। ये मशीन भी 2015 में ही खरीदी गई थी। लेकिन अब तक यह एक भी मरीज के इलाज में इस्तेमाल नहीं हो पाई है। डिपार्टमेंट के विशेषज्ञों का कहना है कि मियाबी लैब में सीटीस्कैन और एंजियोग्राफी के समय इंजेक्टरका इस्तेमाल कर एक बार में ही बेहतर रिजल्ट पाया जा सकता है। जबकि इसके लिए अभी अलग-अलग प्रक्रिया करनी पड़ती हैं।
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रेडियोलॉजी डिपार्टमेंट के मियाबीलैब की आटोमैटिक इंजेक्टर मशीन और हाई इंटेंसिटी फोकस अल्ट्रासाउंड मशीन (हाईफू) इसके दो बड़े उदाहरण हैं। इन दो मशीनों को बिना किसी योजना के आनन-फानन में खरीद तो लिया गया है, लेकिन तकरीबन पांच साल बीत जाने के बाद भी मरीजों तक इसका लाभ नहीं पहुंच सका है।
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गाइनी की मशीन का ट्रामा सेंटर में क्या काम...
पीजीआई के रेडियोलॉजी डिपार्टमेंट की ओर से 2014-15 में करीब चार करोड़ की लागत से हाई इंटेसिटी फोकस अल्ट्रासाउंड मशीन खरीदी गई थी। गर्भाशय के ट्यूमर संबंधी मर्ज में जांच के लिए काम आने वाली इस मशीन को संबंधित डिपार्टमेंट में लगाने के बजाय ट्रामा सेंटर में इंस्टॉल कर दिया गया है।
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ट्रामा के डॉक्टरों और कर्मचारियों का कहना है कि यहां 24 घंटे इमरजेंसी रहती है, ऐसे में इस मशीन को चलाने का कहां मौका मिलेगा। जब इस मशीन का इस्तेमाल महिलाओं से संबंधित बीमारी का इलाज करने के लिए होता है तो इसे गाइनी वार्ड में लगाना चाहिए था। इसमें चौंकाने वाली बात यह है कि इस मशीन की खरीद के बाद इससे संबंधित तकनकी ट्रेनिंग भी कराई जा चुकी है। लेकिन ट्रेनिंग लेने वाले डॉक्टरों में गाइनी डिपार्टमेंट से किसी को शामिल नहीं किया गया है।
कब बाहर आएगा ऑटोमैटिक इंजेक्टर
हाइटेक और महंगी मशीनों को खरीदने के क्रम में रेडियोलॉजी डिपार्टमेंट ने ही 25 लाख रुपये का आटोमैटिक इंजेक्टर मंगवाया था। ये मशीन भी 2015 में ही खरीदी गई थी। लेकिन अब तक यह एक भी मरीज के इलाज में इस्तेमाल नहीं हो पाई है। डिपार्टमेंट के विशेषज्ञों का कहना है कि मियाबी लैब में सीटीस्कैन और एंजियोग्राफी के समय इंजेक्टरका इस्तेमाल कर एक बार में ही बेहतर रिजल्ट पाया जा सकता है। जबकि इसके लिए अभी अलग-अलग प्रक्रिया करनी पड़ती हैं।
इन मशीनों के बारे में मुझे जानकारी नहीं है। अगर ऐसा है तो इसे पीजीआई प्रशासन के संज्ञान में लाया जाएगा, ताकि मरीजों तक उसका लाभ पहुंच सके। - अशोक कुमार, पीजीआई प्रवक्ता