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मिलिए पंजाब के 'बजरंगी भाईजान' से, 68 साल से बिछड़े भाई-बहन को मिलवाया
प्रदीप सिंगला/ अमर उजाला ब्यूरो, संगरूर
Updated Mon, 01 Aug 2016 08:18 PM IST
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Mohammd Ashraf
- फोटो : amar ujala
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मालेरकोटला के गांव टिब्बा के सिख परिवार की एक बेटी विभाजन के समय पाकिस्तान में रह गई थी। मालेरकोटला के मोहम्मद अशरफ ने बजरंगी भाईजान बन 18 सालों की जी तोड़ कोशिश के बाद भाई बहन को मिलवा दिया। साढ़े छह दशक के बाद रविवार को जब भाई-बहन मिले तो उनकी खुशी का पारावार नहीं रहा। हर कोई इसका श्रेय मालेरकोटला के गांव बदेशा निवासी मोहम्मद अशरफ को दे रहा है।
जानकारी के अनुसार अशरफ पाकिस्तान के शहर ननकाना साहिब जाते रहते हैं। साल 1998 में गुरु नानक देव जी के जन्म स्थल गुरुद्वारा ननकाना साहिब के द्वार पर भारत से आए श्रद्धालुओं से एक बुजुर्ग महिला पूछ रही थी कि बेटा तू मालेरकोटला के गांव टिब्बे से तो नहीं आया है। अशरफ के पूछने पर महिला ने बताया कि 1947 में विभाजन के समय वह सात आठ साल की उम्र में अपने ननिहाल पाकिस्तान में थी।
उसके मां-बाप मालेरकोटला के टिब्बा गांव में रहते थे। विभाजन की आग से पाकिस्तान स्थित उसका ननिहाल भी नहीं बच पाया। उसे होश नहीं कि कब उसे एक मुस्लिम परिवार ने सहारा दिया और ननकाना साहिब में ही शादी कर दी। बेशक अब उनका नाम शरीफा बानो है लेकिन वह अर्से से अपने भाई डोगर सिंह को ढूंढ रही हैं।
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जानकारी के अनुसार अशरफ पाकिस्तान के शहर ननकाना साहिब जाते रहते हैं। साल 1998 में गुरु नानक देव जी के जन्म स्थल गुरुद्वारा ननकाना साहिब के द्वार पर भारत से आए श्रद्धालुओं से एक बुजुर्ग महिला पूछ रही थी कि बेटा तू मालेरकोटला के गांव टिब्बे से तो नहीं आया है। अशरफ के पूछने पर महिला ने बताया कि 1947 में विभाजन के समय वह सात आठ साल की उम्र में अपने ननिहाल पाकिस्तान में थी।
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उसके मां-बाप मालेरकोटला के टिब्बा गांव में रहते थे। विभाजन की आग से पाकिस्तान स्थित उसका ननिहाल भी नहीं बच पाया। उसे होश नहीं कि कब उसे एक मुस्लिम परिवार ने सहारा दिया और ननकाना साहिब में ही शादी कर दी। बेशक अब उनका नाम शरीफा बानो है लेकिन वह अर्से से अपने भाई डोगर सिंह को ढूंढ रही हैं।
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शरीफां ने रोते हुए अपने भाई की कलाई पर राखी बांधी
sharifa bano
- फोटो : amar ujala
शरीफां की बेटी भी अपनी मां को भारत भेजने के लिए दो बार वीजा दाखिल कर चुकी है लेकिन एंबेसी ने यह कहकर खारिज कर दिया है कि शरीफा का सगा संबंधी भारत में नहीं है। बेबस शरीफा सालों से गुरुद्वारा ननकाना साहिब के द्वार पर पंजाब से आए लोगों से अपने भाई का पता पूछ रही थीं।
अशरफ ने साल 1998 से लेकर 2015 तक जी तोड़ कोशिशें करके शरीफां के भाई डोगर सिंह को ढूंढ निकाला। डोगर सिंह ने जब अपने से भी वृद्ध रिश्तेदारों से अपनी खोई हुई बहन के विषय में पूछा तो उन्होंने पुष्टि की कि विभाजन के समय एक बच्ची पाकिस्तान में रह गई थी।
अशरफ ने अपने वीजा आवेदन में पाकिस्तान सरकार से अपील की कि दूर के रिश्ते में उसकी मौसी लगने वाली शरीफां बानो को मालेरकोटला के गांव बदेशा का वीजा दिया जाए। वीजा पर मुहर लगी और अशरफ, शरीफा और उनकी बेटी को लेकर वह अपने गांव आ गया। शरीफा रविवार को जब गांव टिब्बा पहुंची तो मां-बाप के घर को देखकर उसकी आंखें जैसे पथरा गईं।
भाई डोगर सिंह से जब वह रूबरू हुई तो दोनों ही सन्न रह गए। उनकी आंखें भीग गईं। शरीफां ने रोते हुए अपने भाई की कलाई पर राखी बांधी और दोनों ने एक दूसरे का मुंह मीठा करवाया। गांव में जश्न मनाया गया और लोगों ने इसका श्रेय अशरफ को दिया ।