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FIR के चलते नहीं रोक सकते कर्मचारी का प्रमोशन: हाईकोर्ट
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sun, 03 Sep 2017 11:29 AM IST
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कोर्ट
- फोटो : सांकेतिक चित्र
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हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि एफआईआर के चलते किसी कर्मचारी का प्रमोशन नहीं रोका जा सकता। एक कांस्टेबल की याचिका मंजूर करते हुए यह फैसला दिया गया। याचिकाकर्ता के मामले में तो उसका नाम चालान की कॉलम संख्या 2 में है, इसलिए उसके प्रमोशन को रोकना गलत है। हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को तीन माह के भीतर कांस्टेबल को 2008 से प्रमोट करने के आदेश दिए हैं।
याचिका दाखिल करते हुए कांस्टेबल जोगा सिंह ने कहा कि उसके बैच के सभी कर्मचारियों को प्रमोशन 2008 में ही मिल गया था। उसका प्रमोशन 2004 में हुई एक एफआईआर के चलते रोक दिया गया था।
मामला एक कैदी के हिरासत से भागने का है। इस मामले में जब चालान पेश किया गया तो उसके कॉलम नंबर 2 में याची का नाम रखा गया। मामले में मुख्य आरोपी पेश नहीं हुए और उन्हें प्रोक्लेम अफेंडर घोषित कर दिया गया। इसके बाद मामला 2009 तक लंबित रहा, जिसके चलते 2008 में याची को प्रमोशन का लाभ नहीं दिया गया।
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एफआईआर कर्मचारी की नीयत पर शक का आधार नहीं
याचिकाकर्ता की दलीलें और पंजाब सरकार का पक्ष सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की कि केवल एफआईआर दर्ज होना किसी कर्मचारी की नीयत या उसके चरित्र पर शक करने का आधार नहीं बनाया जा सकता है। याचिकाकर्ता का नाम कॉलम संख्या 2 में रखा गया, जो याची के पक्ष को और मजबूत करता है।
जिसके मायने यह हुए कि उसे मुख्य आरोपी नहीं बनाया गया था और न ही ट्रायल में पेश होना था। ऐसे में एफआईआर लंबित होने मात्र से किसी कर्मी की प्रमोशन को नहीं रोका जा सकता है। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों को स्वीकार करते हुए 3 माह के भीतर 2008 से उसे प्रमोट करने के आदेश जारी किए।
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याचिका दाखिल करते हुए कांस्टेबल जोगा सिंह ने कहा कि उसके बैच के सभी कर्मचारियों को प्रमोशन 2008 में ही मिल गया था। उसका प्रमोशन 2004 में हुई एक एफआईआर के चलते रोक दिया गया था।
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मामला एक कैदी के हिरासत से भागने का है। इस मामले में जब चालान पेश किया गया तो उसके कॉलम नंबर 2 में याची का नाम रखा गया। मामले में मुख्य आरोपी पेश नहीं हुए और उन्हें प्रोक्लेम अफेंडर घोषित कर दिया गया। इसके बाद मामला 2009 तक लंबित रहा, जिसके चलते 2008 में याची को प्रमोशन का लाभ नहीं दिया गया।
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एफआईआर कर्मचारी की नीयत पर शक का आधार नहीं
याचिकाकर्ता की दलीलें और पंजाब सरकार का पक्ष सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की कि केवल एफआईआर दर्ज होना किसी कर्मचारी की नीयत या उसके चरित्र पर शक करने का आधार नहीं बनाया जा सकता है। याचिकाकर्ता का नाम कॉलम संख्या 2 में रखा गया, जो याची के पक्ष को और मजबूत करता है।
जिसके मायने यह हुए कि उसे मुख्य आरोपी नहीं बनाया गया था और न ही ट्रायल में पेश होना था। ऐसे में एफआईआर लंबित होने मात्र से किसी कर्मी की प्रमोशन को नहीं रोका जा सकता है। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों को स्वीकार करते हुए 3 माह के भीतर 2008 से उसे प्रमोट करने के आदेश जारी किए।