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दस साल की सुनवाई के बाद चंडीगढ़ की सुखना झील पर फैसला सुरक्षित, अब आदेश का इंतजार
Fri, 17 Jan 2020 12:16 PM IST
खुशबू गोयल
अमर उजाला, चंडीगढ़
अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Fri, 17 Jan 2020 12:16 PM IST
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Sukhna Lake
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सुखना लेक को बचाने के लिए हाईकोर्ट दस साल से सुनवाई कर रहा था, उसे जस्टिस राजीव शर्मा ने दो सुनवाई में निपटा दिया। जस्टिस राजीव शर्मा अब कांसल के निर्माण, सुखना को बचाने और सुखना से जुड़े कई मुद्दों पर जल्द ही फैसला सुनाएंगे। 2006 में चंडीगढ़ प्रशासन ने सुखना लेक को डी-सिल्ट कर इसकी गहराई बढ़ा और क्षमता बढ़ाने के लिए जो योजना बनाई थी उसे पूरा करने के लिए आवश्यक 73.51 करोड़ की राशि जारी करने के केंद्र सरकार को हाईकोर्ट ने आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस राशि से दो तरीके से सुखना से गाद निकल सकते हैं। पहला सुखना को बिना खाली किए ड्रेजिंग करके और दूसरा नैनीताल की लेक की तरह से सफाई। या तो सुखना में कुछ ब्लॉक्स बनाए जाएं और प्रत्येक ब्लॉक से पानी निकल कर गाद निकाली जाए। इस दौरान हाईकोर्ट ने प्रशासन को फटकार भी लगाते हुए कहा कि जब केंद्र पैसे देने को तैयार था तो प्रशासन 2008 से किस बात का इंतजार कर रहा था। 2008 में ही केंद्र ने जब प्रशासन एक प्रस्ताव पर जवाब मांगा था तो अब तक इंतजार क्यों किया।
सुखना लेक को डी-सिल्ट कर औसत गहराई 3.48 मीटर से बढाकर 4.68 मीटर किए जाने और कैचमेंट एरिया ट्रीटमेंट एक्टिविटी के लिए योजना बनाई गई थी। जिसके तहत सुखना लेक में 19.65 लाख क्यूबिक मीटर गाद (सिल्ट) निकाली जानी थी। मंत्रालय ने इस पर आईआईटी रुड़की और सेंटर फॉर वाटर रिसोर्सेज डेवलपमेंट एंड मैनेजमेंट इन दोनों संस्थानों ने दो विशेषज्ञों से उनकी राय मांगी थी। दोनों विशेषज्ञों ने अप्रैल 2007 में लेक का दौरा कर अपनी राय भेजते हुए कहा था कि लेक में पानी की कैपेसिटी बढ़ाई जाए।
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इसके लिए डी-सिल्ट और अन्य उपायों के लिए 73.51 करोड़ रुपये की राशि तय की गई थी। अगस्त 2008 में इसका प्रस्ताव बना चंडीगढ़ प्रशासन के केंद्र सरकार को भेज दिया था।
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हाईकोर्ट ने कहा कि इस राशि से दो तरीके से सुखना से गाद निकल सकते हैं। पहला सुखना को बिना खाली किए ड्रेजिंग करके और दूसरा नैनीताल की लेक की तरह से सफाई। या तो सुखना में कुछ ब्लॉक्स बनाए जाएं और प्रत्येक ब्लॉक से पानी निकल कर गाद निकाली जाए। इस दौरान हाईकोर्ट ने प्रशासन को फटकार भी लगाते हुए कहा कि जब केंद्र पैसे देने को तैयार था तो प्रशासन 2008 से किस बात का इंतजार कर रहा था। 2008 में ही केंद्र ने जब प्रशासन एक प्रस्ताव पर जवाब मांगा था तो अब तक इंतजार क्यों किया।
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सुखना लेक को डी-सिल्ट कर औसत गहराई 3.48 मीटर से बढाकर 4.68 मीटर किए जाने और कैचमेंट एरिया ट्रीटमेंट एक्टिविटी के लिए योजना बनाई गई थी। जिसके तहत सुखना लेक में 19.65 लाख क्यूबिक मीटर गाद (सिल्ट) निकाली जानी थी। मंत्रालय ने इस पर आईआईटी रुड़की और सेंटर फॉर वाटर रिसोर्सेज डेवलपमेंट एंड मैनेजमेंट इन दोनों संस्थानों ने दो विशेषज्ञों से उनकी राय मांगी थी। दोनों विशेषज्ञों ने अप्रैल 2007 में लेक का दौरा कर अपनी राय भेजते हुए कहा था कि लेक में पानी की कैपेसिटी बढ़ाई जाए।
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इसके लिए डी-सिल्ट और अन्य उपायों के लिए 73.51 करोड़ रुपये की राशि तय की गई थी। अगस्त 2008 में इसका प्रस्ताव बना चंडीगढ़ प्रशासन के केंद्र सरकार को भेज दिया था।
कांसलवासियों का भी पक्ष सुना
कांसलवासियों की ओर से फिर कहा गया कि उनके घर सुखना कैचमेंट एरिया, कृषि भूमि या वन भूमि पर नहीं है बावजूद इसके उनकी भूमि को कैचमेंट एरिया में बताया जा रहा है जिसके चलते उनके निर्माण पर तलवार लटकी हुई है। पंजाब सरकार ने भी अपना पक्ष रखते हुए यही कहा कि उनके ओर की जमीन कैचमेंट एरिया में नहीं है।
ऐसे हुई थी केस की शुरुआत
2009 में सुखना लेक के वजूद पर संकट को लेकर हाईकोर्ट ने संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू की थी। इसी दौरान 2011 में सुखना कैचमेंट एरिया और कांसल में सभी निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी थी। सुखना को लेकर आईआईटी रुड़की और अन्य संस्थानों के विशेषज्ञों ने स्टडी कर रिपोर्ट सौंपी थी।
जस्टिस राजीव शर्मा की खंडपीठ के समक्ष पहली बार यह मामला दिसंबर में सुनवाई के लिए आया था और उन्होंने साफ कर दिया था कि अब इस मामले को लटकने नहीं दिया जाएगा। दो बार चीफ जस्टिस की खंडपीठ में सुनवाई के बाद यह मामला जस्टिस राजीव शर्मा की खंडपीठ के समक्ष आया बुधवार को आया। उन्होंने अभी तक के सभी आदेशों को समझा और वीरवार को दो घंटे सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।
ऐसे हुई थी केस की शुरुआत
2009 में सुखना लेक के वजूद पर संकट को लेकर हाईकोर्ट ने संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू की थी। इसी दौरान 2011 में सुखना कैचमेंट एरिया और कांसल में सभी निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी थी। सुखना को लेकर आईआईटी रुड़की और अन्य संस्थानों के विशेषज्ञों ने स्टडी कर रिपोर्ट सौंपी थी।
जस्टिस राजीव शर्मा की खंडपीठ के समक्ष पहली बार यह मामला दिसंबर में सुनवाई के लिए आया था और उन्होंने साफ कर दिया था कि अब इस मामले को लटकने नहीं दिया जाएगा। दो बार चीफ जस्टिस की खंडपीठ में सुनवाई के बाद यह मामला जस्टिस राजीव शर्मा की खंडपीठ के समक्ष आया बुधवार को आया। उन्होंने अभी तक के सभी आदेशों को समझा और वीरवार को दो घंटे सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।