चंडीगढ़ के राजधानी होने पर उठे सवाल, पंजाब और हरियाणा नहीं सौंप पाए नोटिफिकेशन
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चंडीगढ़ को हरियाणा और पंजाब की राजधानी कैसे मान लिया जाए जबकि तीन सुनवाई के बावजूद दोनों में से कोई भी इससे जुड़ा कोई नोटिफिकेशन नहीं सौंप पाया है। यह टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने अब केंद्र सरकार और चंडीगढ़ प्रशासन को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
जस्टिस आरके जैन एवं जस्टिस अरुण कुमार त्यागी की खंडपीठ ने गुरुवार को सुनवाई के दौरान कहा कि क्यों न इस याचिका को रेफरेंस के लिए सुप्रीम कोर्ट भेज दिया जाए।
बाद में पंजाब और हरियाणा दोनों राज्यों के आग्रह किए जाने पर हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई 9 सितंबर तक स्थगित कर दी।
हालांकि हाईकोर्ट ने अब इस मामले में केंद्र सरकार को भी पक्ष बनाते हुए नोटिस जारी कर जवाब मांगा हैं, साथ ही चंडीगढ़ प्रशासन से उनका पक्ष रखने को कहा है।
पिछली सुनवाई पर पंजाब सरकार की ओर से कहा गया था कि चंडीगढ़ पंजाब की राजधानी है और वर्ष 1952 में इसकी घोषणा भी की जा चुकी है।
इसके दस्तावेज मंगलवार को पंजाब के एडवोकेट जनरल अतुल नंदा ने हाईकोर्ट को सौंप दिए और कहा कि चाहे वर्ष 1966 में पंजाब रीऑर्गेनाइजेशन एक्ट जरूर आया था, जिसमें चंडीगढ़ को केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया गया लेकिन इस एक्ट के बावजूद चंडीगढ़ का पंजाब की राजधानी होने का दर्जा कायम रहा है।
दावे पर कागज नहीं
हाईकोर्ट में अभी तक दोनों राज्यों ने चंडीगढ़ पर दावा ठोकते हुए इसे अपना हिस्सा बताया। लेकिन अभी तक ऐसी कोई नोटिफिकेशन नहीं सौंपी है जिससे चंडीगढ़ पर दावा साबित होता हो। अभी तक जो दस्तावेज सौंपे गए हैं हाईकोर्ट उनको चंडीगढ़ को राजधानी साबित करने के लिए अपर्याप्त मान चुका है। अब केंद्र सरकार और चंडीगढ़ प्रशासन को प्रतिवादी बनाने के बाद मामला और रोचक हो चुका है।
याची ने उठाए सवाल
मामले में याची के वकील राजीव आत्मा राम ने कहा कि 1952 एक्ट में चंडीगढ़ पंजाब की राजधानी थी, मगर 1 नवंबर 1966 को जब पंजाब से हरियाणा और हिमाचल अलग राज्य बने और चंडीगढ़ यूटी बन गया। उन्होंने कहा कि अगर ये यूटी अलग हुई है और उसे राजधानी बनाने की नोटिफिकेशन नहीं है तो ऐसे में चंडीगढ़ पंजाब और हरियाणा का हिस्सा नहीं है और ऐसे में दोनों राज्य कैसे चंडीगढ़ को अपना हिस्सा मान रहे है ।