एक नजर में जाट हिंसा पर प्रकाश सिंह कमेटी की रिपोर्ट की महत्वपूर्ण बातें
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जाट आरक्षण आंदोलन के दौरा हिंसा पर प्रदेश सरकार की ओर से गठित प्रकाश सिंह कमेटी की रिपोर्ट की महत्वपूर्ण बातें जानिए। जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान रोहतक धू धू कर जल रहा था और अधिकारी इस आग में लापरवाही का घी डाल रहे थे।
इन अफसरों को डर था कि उन्होंने सख्त कार्रवाई की तो उनकी नौकरी जा सकती है। आरक्षण हिंसा में अधिकारियों की भूमिका की जांच करने वाली प्रकाश सिंह कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में रोहतक के 30 अफसरों की नाकामी को उपद्रव के लिए जिम्मेदार माना है। कमेटी ने आरक्षण के दौरान हरियाणा के विभिन्न शहरों में आगजनी, लूट और हिंसा के लिए प्रदेश के कुल 90 अफसरों की लापरवाही को जिम्मेदार माना है। इनमें आईएएस, आईपीएस, उपायुक्त, एसपी, एडीसी, एसडीएम, नायब तहसीलदार, थाना प्रभारी और एसआई इंचार्ज स्तर के अधिकारी हैं।
15 दिन चल दहशत का राज जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हरियाणा के आठ जिले 7 से 22 फरवरी तक हिंसा और उपद्रव की आग में झुलसते रहे। कानून और व्यवस्था की स्थिति पूरी तरह चौपट थी। स्थित पर नियंत्रण पाने के लिए सेना को लगाना पड़ा था। बाद में सरकार ने पुलिस और प्रशासनिक विफलता की वजहों की जांच के लिए असम और उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह के नेतृत्व में कमेटी गठित की थी।
2 मार्च से कमेटी ने काम शुरू किया। कमेटी में आईपीएस केपी सिंह (मौजूदा डीजीपी, हरियाणा) और वरिष्ठ आईएएस विजय वर्द्धन (मौजूदा अतिरिक्त मुख्य सचिव, अभिलेखागार एवं सांस्कृतिक कार्य विभाग) ने भी प्रकाश सिंह का सहयोग किया। कमेटी ने हरियाणा के उपद्रव प्रभावित आठ जिलों का दौरा किया। इनमें रोहतक, झज्जर, सोनीपत, जींद, कैथल, हिसार, भिवानी और पानीपत का दौरा कर, वहां के हालात का जायजा लिया।
पूर्व डीजीपी ने पुलिस अफसरों की मनोस्थिति का भी किया जिक्र
उत्तरप्रदेश और असम के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ने हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान पुलिस की भूमिका को लेकर की गई जांच में 90 गैर-जिम्मेदार पुलिस व सिविल अफसरों के नाम सरकार को सौंपे हैं। दूसरी ओर, कमेटी ने प्रदेश के सभी पुलिस अफसरों का पक्ष लेते हुए बचाव भी किया है।
पूर्व डीजीपी ने बताया कि आठ जिलों में जांच के दौरान वे जितने भी पुलिस अफसरों से मिले, उनसे बातचीत में यह बात सामने आई कि सभी अफसरों के मन में यह बात बैठ गई है कि अगर उन्होंने कोई कठोर एक्शन लिया और उसमें किसी नागरिक की मौत हो गई तो सरकार अफसर का बचाव नहीं करेगी। उलटे सरकार की ओर से संबंधित अफसर को नौकरी से हटाया जा सकता है। पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि कुछ अफसरों ने पूछताछ के दौरान साफ तौर पर उन्हें कहा कि अगर वे दंगा रोकने के लिए कड़ी कार्रवाई करते तो हो सकता है कि बाद में उनकी नौकरी ही चली जाती। कुछ अफसरों ने वर्ष 2010 में सुभाष जाधव प्रकरण की याद दिलाई, जिनके खिलाफ सरकार ने इसलिए कार्रवाई की क्योंकि उनकी ड्यूटी के दौरान पुलिस फायरिंग में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी।
इसके साथ ही पूर्व डीजीपी ने ऐसे पुलिस अफसरों के बारे में तीखी टिप्पणी की, जिन्होंने पूछताछ में उन्हें बताया था कि उन्हें कार्रवाई करने के लिए ऊपर से आदेश नहीं थे। पूर्व डीजीपी ने कहा कि कानून लागू करने के लिए किसी के आदेश की जरूरत नहीं होती। यदि धारा 144 लगा दी गई है तो उसे लागू करने के लिए किसी आदेश की जरूरत अफसर को नहीं पड़नी चाहिए। अगर थाना जलाया जा रहा है तो एसएचओ का ऊपर से आदेश का इंतजार करना उसके गैरजिम्मेदार और अयोग्य होने का प्रमाण है। ऐसे अफसरों को तो पुलिस में होना ही नहीं चाहिए।
राजनीतिक साजिश नहीं से इनकार
पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ने जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हिंसा के पीछे कोई राजनीतिक साजिश होने से इनकार किया है। पत्रकारों से सवालों के जवाब में उन्होंने कहा कि हिंसा के पीछे किसी षड्यंत्र की जांच करना उनकी कमेटी के कार्य का हिस्सा नहीं था। फिर भी जांच के दौरान जो भी तथ्य कमेटी के सामने आए उससे यह नहीं लगता कि इसके पीछे कोई राजनीतिक षड्यंत्र था। उल्लेखनीय है कि पूर्व डीजीपी का यह बयान प्रदेश सरकार के उस आरोप को गलत ठहराता है, जिसमें भाजपा की ओर से आरोप लगाया जा रहा है कि आंदोलन में हिंसा भड़काने की साजिश कांग्रेस नेताओं ने रची थी।
जाट आरक्षण आंदोलन में जले हरियाणा के आठ जिले
जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान पुलिस निरंकुश बनी रही और सूबे के आठ जिले जल रहे थे। कमेटी के चेयरमैन प्रकाश सिंह ने पुलिस अधिकारियों और कर्मियों को नौकरियां देने में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद व सिफारिश का आरोप लगाते हुए सैकड़ों अधिकारियों को हालात से निपटने के लिए अक्षम करार दिया है। सिंह ने पहले भर्ती हुए पुलिस कर्मियों को अपरिपक्व व कम कार्यकुशल होने के साथ-साथ ट्रेनिंग में त्रुटियों को पुलिस की मौजूदा कार्यप्रणाली के लिए जिम्मेदार ठहराया है।
अफसरों व कर्मियों के चयन में कमियों का नतीजा
प्रकाश सिंह ने कहा कि पुलिस कर्मियों में बेहतर कार्यक्षमता होने के बावजूद कुछ कमियों की वजह से कई जगहों पर पुलिस का प्रदर्शन स्तरीय नहीं रहा। इसके कारणों के बारे में कहा कि अधिकारियों की कार्यशैली को देखकर ऐसा लगा कि यह चयन प्रक्रिया में कमियाें का नतीजा है। उन्होंने कहा कि उनकी अपरिपक्वता के कारण कई फैसले नहीं जा सके। फेसले लेने में देरी या अपरिपक्वता के कारण हालात और बिगड़े। उन्होंने कि भर्ती के वक्त मानकों का पालन नहीं किए जाने की वजह से ही ऐसी स्थिति पैदा हुई है। उन्होंने इस बात पर हैरानी जताते हुए कहा कि सिफारिश, भ्रष्टाचार सहित कई और वजह हैं, जिससे ऐसे पुलिस कर्मियों को नौकरियां मिली हुई हैं। कुछ थाना प्रभारियों का जिक्र करते हुए प्रकाश सिंह ने कहा कि अगर थाने को सुरक्षित नहीं रख सकते हैं तो उनसे आम लोगों की सुरक्षा की कैसे उम्मीद की जा सकती है।
हरियाणा के लोगों की तारीफ
प्रकाश सिंह ने हरियाणा के लोगों की तारीफ करते हुए कहा कि यहां का ह्यूमन मैटेरियल कई और प्रदेशों से बेहतर है, लेकिन ट्रेनिंग में कमियां, आधुनिक हथियारों की कमी और कर्मियों को प्रोत्साहन न मिलना कई परेशानियों की वजह है। उन्होंने जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान कई जगहों से हट जाने वाले पुलिस कर्मियों को डरपोक कहे जाने को गलत बताते हुए कहा कि इन्हें दिशा देने की जरूरत है। अगर, इनकी क्षमताओं का उचित जगह पर सही मायने में इस्तेमाल किया जाए तो इनकी बराबरी मुश्किल है।
जांच रिपोर्ट में आईजी श्रीकांत जाधव पर टिप्पणी
जाट आरक्षण आंदोलन के तत्काल बाद निलंबन की कार्रवाई का सामने करने वाले आईजी श्रीकांत जाधव को सरकार ने वीरवार को भले ही बहाल कर दिया, लेकिन प्रकाश सिंह कमेटी ने अपनी जांच रिपोर्ट में श्रीकांत जाधव के बारे में विपरीत टिप्पणी की है। यह खुलासा शुक्रवार को जांच कमेटी के अध्यक्ष पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ने की।
प्रकाश सिंह ने बताया कि रोहतक में जांच के दौरान उन्होंने श्रीकांत जाधव से भी पूछताछ की थी। यह पूछे जाने पर कि क्या जांच रिपोर्ट में दर्ज 90 अफसरों में श्रीकांत जाधव का नाम भी है, पूर्व डीजीपी ने पहले तो कुछ भी कहने से इंकार किया, लेकिन फिर कहा कि श्रीकांत जाधव के बारे में भी जांच रिपोर्ट में टिप्पणी की गई है।
उल्लेखनीय है कि श्रीकांत जाधव जोकि आरक्षण आंदोलन के दौरान रोहतक रेंज के पुलिस महानिरीक्षक थे, पर आंदोलन के दौरान सही तरीके से जिम्मेदारी न निभाने के कारण उंगली उठी थी। जब श्रीकांत जाधव ने बयान जारी कर प्रदेश सरकार को ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की तो सरकार ने उनका रोहतक रेंज से तबादला कर मधुबन में स्टेट क्त्रसइम रिकार्ड ब्यूरो में आईजी नियुक्त कर दिया था।
इतना ही नहीं 21 फरवरी को तबादला व नियुक्ति के चार दिन बाद ही सरकार ने 25 फरवरी को उन्हें निलंबित कर दिया था। हालांकि 12 मई (वीरवार) को सरकार ने उनके खिलाफ विभागीय जांच लंबित करते हुए उन्हें फिर से मधुबन में आईजी स्टेट क्त्रसइम रिकार्ड ब्यूरो तैनात कर दिया है।
गौरतलब है कि श्रीकांत जाधव को निलंबित किए जाने के समय ही सरकार ने रोहतक के डीएसपी अमित भाटिया और अमित दहिया को भी निलंबित करने के आदेश जारी किए थे। उनके बारे में अभी विभागीय जांच जारी है।