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चंडीगढ़: पेट्रोल-डीजल की कीमत से हाहाकार, लोग बोले- अब तो जागो सरकार

Sun, 25 Jul 2021 08:00 PM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: ajay kumar Updated Sun, 25 Jul 2021 08:00 PM IST
सार

पूर्व केंद्रीय मंत्री पवन कुमार बंसल का कहना है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने का कारण है एक्साइज ड्यूटी बढ़ाना है। एक्साइज ड्यूटी अधिक है। इसके अलावा अन्य प्रकार के वैट हैं। यदि सरकार 2014 के अनुसार ही एक्साइज ड्यूटी कर दे तो 30 रुपये तक पेट्रोल की कीमत कम हो सकती है। ऐसे में रेट कम होना चाहिए लेकिन सरकार नहीं कर रही है। 

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People upset due to rising prices of petrol and diesel in Chandigarh
फाइल फोटो। - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

मोहाली में पेट्रोल की कीमतें 100 रुपये पार हो गई हैं, जबकि चंडीगढ़ व पंचकूला शतक के करीब पहुंच गई हैं। हर दूसरे दिन पेट्रोल-डीजल के दाम में बढ़ोतरी हो रही है। दामों में लगातार वृद्धि का असर आम आदमी की जेब पर दिखने लगा है। जरूरी चीजों के दाम बढ़ रहे हैं तो आने-जाने का खर्च भी काफी ज्यादा हो चुका है।

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लोगों का सवाल है कि कब तक दाम बढ़ते रहेंगे और सरकार अब तक कोई कदम क्यों नहीं उठा रही। दरअसल, साल 2010 में सरकार ने पेट्रोल से और साल 2014 में डीजल से अपना नियंत्रण हटा लिया था। उसके बाद से जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें घटती-बढ़ती हैं तो भारत में भी इसका असर दिखता है। हालांकि यह भी सच है कि पेट्रोल-डीजल की मूल कीमत से ज्यादा आम लोगों को टैक्स भरना पड़ता है।
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एक लीटर पेट्रोल पर केंद्र सरकार भी टैक्स वसूलती है और राज्य सरकार भी। पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने पर कई लोग मनमोहन व मोदी सरकार के बीच तुलना कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि साल 2014 से पहले यूपीए सरकार में क्रूड ऑयल की कीमतें काफी ज्यादा थी लेकिन फिर भी पेट्रोल के दाम नियंत्रण में थे। केंद्र सरकार जल्द से लोगों को राहत दे।

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मनमोहन व मोदी सरकार में क्रूड ऑयल की कीमत कितनी

साल 2014 में चुनाव से ठीक पहले क्रूड आयल की कीमत करीब 108 डॉलर प्रति बैरल थी, तो उस समय चंडीगढ़ में पेट्रोल की कीमत 74 रुपये थी। शुक्रवार को क्रूड आयल की कीमत करीब 73 डालर प्रति बैरल तो पेट्रोल की कीमत करीब 97.93 रुपये प्रति लीटर है। हालांकि जब यूपीए सरकार साल 2004 में सत्ता में आई थी तो उस वक्त क्रूड तेल की कीमत 35 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ही थी, लेकिन 2011-12 में यह 112 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को पार कर गई।  

जीएसटी में आ जाए तो होगा सस्ता
अगर पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाया जाता है तो काफी सस्ता हो जाएगा लेकिन इससे केंद्र व राज्य सरकार को काफी नुकसान पहुंचेगा। केंद्र सरकार प्रति लीटर पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी वसूलती है, जबकि राज्य सरकार व यूटी प्रशासन वैट।

कोरोना काल में केंद्र व राज्य सरकार की कमाई बंद हो गई है। ऐसे में उनके पास पेट्रोल व डीजल आय का सबसे अच्छा स्रोत है। दोनों ही सरकारें इसके लिए राजी नहीं होगी। यदि पेट्रोल-डीजल पर केंद्र व राज्य सरकार अपने टैक्स हटाकर सिर्फ जीएसटी की उच्चतम दर 28 फीसदी टैक्स वसूलती है तो पेट्रोल-डीजल कीमतें करीब 40 फीसदी तक गिर सकती है।

पीयू के अर्थशास्त्री डॉ. तिलकराज बोले- ईंधन के दाम बढ़ने का एक कारण नहीं

पेट्रोल-डीजल के दामों में वृद्धि का सबसे बड़ा कारण राज्य सरकारों का टैक्स है। इस टैक्स या पेट्रोल को यदि जीएसटी के दायरे में लाया जाए तो काफी हद तक दरों में राहत मिलेगी। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक वाहनों को प्रमोट किया जाना चाहिए। लोग बिजली से चलित वाहन चलाने लगेंगे तो पेट्रोल की मांग कम होगी। 

यह कहना है पीयू के अर्थशास्त्री डॉ. तिलकराज का। उन्होंने बताया कि क्रूड ऑयल कुछ महंगा जरूर हुआ लेकिन पेट्रोल के दाम अधिक बढ़ने का यह केवल एक ही कारण है। रिफाइनरी कर, ट्रांसपोर्टेशन, डीलर कमीशन के अलावा राज्यों का टैक्स पेट्रोल के दाम बढ़ा रहा है। पेट्रोल की मांग लगातार बढ़ रही है। क्योंकि पेट्रोल हर किसी की जरूरत बन गया है। मांग कम होगी तो निश्चित इसके दाम कम होंगे। 

सरकार नहीं, कंपनियां तय करती हैं दाम
तेल का दाम सरकार नहीं, कंपनियां तय करती हैं। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि की वजह साल 2014 में मनमोहन सरकार द्वारा तेल कंपनियों को जारी किए आयल बांड हैं, जिन्हें ब्याज सहित चुकाना पड़ रहा है और उसी के कारण कीमतें बढ़ी हैं। ये कीमत बहुत ज्यादा है, जिसे अब वर्तमान सरकार चुका रही है। इसलिए ही पेट्रोल के दामों में वृद्धि हुई है। - अरुण सूद, प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा

कांग्रेस कार्यकाल की तुलना में महंगाई नियंत्रण में

वर्ष 2014 में जब भाजपा आई थी, तब जो हालात थे, उसे देखते हुए महंगाई नियंत्रण में है। पेट्रोल-डीजल के दाम वैश्विक बाजार के जरिए तय होते हैं। इसलिए इस पर सरकार का नियंत्रण नहीं होता है। सरकार पेट्रोल-डीजल के दामों पर नियंत्रण के लिए कंपनियों से भी चर्चा कर रही है। कोरोना महामारी का यह समय एकजुटता से कार्य करने का है। - रविकांत शर्मा, मेयर

50 प्रतिशत तेल निजी सेक्टर के हाथों में
सबसे बड़ा कारण यह है कि 50 प्रतिशत तेल निजी सेक्टर के हाथों में है। पांच प्रदेशों में चुनाव हैं। इसके लिए पैसे एकत्र किए जा रहे हैं। चुनाव पास आने पर तेल के रेट कम करेंगे। सरकार का आर्थिक प्रबंधन गड़बड़ाया हुआ है। सरकार को समझ में नहीं आ रहा है कि टैक्स बढ़ाने के अलावा और क्या करें। इसे जीएसटी के दायरे में लाना चाहिए।  - सुभाष चावला, अध्यक्ष, चंडीगढ़ प्रदेश कांग्रेस

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