केदारनाथ: जिंदा हैं पर खौफजदा हैं, 5 सच्चे किस्से
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पिछले साल चार धाम की यात्रा पर निकले 30 लोगों को मालूम नहीं था कि वह कब, कहां और किस हाल में रहेंगे। ईश्वर की यह कृपा ही रही कि ये परिवार सुरक्षित घर लौट आए, लेकिन जलप्रलय ने जो कहर बरपाया, उसका जख्म आज तक हरा-भरा है। यदि भगवान की कृपा रही तो ये परिवार अगली बार बाकी बची बद्रीनाथ यात्रा पर भी जाएंगे।
भारतीय योग संस्थान से जुड़े लोग पिछले साल जून के दूसरे सप्ताह में पंचकूला से रवाना हुए थे। यह दल सबसे पहले यमुनोत्री, फिर गंगोत्री और इसके बाद केदारनाथ पहुंचा। सेक्टर-20 के जीएच-28 में रहने वाले केडी पाठक ने बताया कि केदारनाथ में जिस रात यह हादसा हुआ, उससे करीब छह-सात घंटे पहले सभी बद्रीनाथ के लिए रवाना हो चुके थे। खराब मौसम और ऊपरी हिस्से में रास्ता टूटा देखकर सभी ने गोविंदघाट के एक होटल में रुकने का मन बनाया, लेकिन जगह कम होने की वजह से वहां ठहरने का मौका नहीं मिला।
थोड़ी देर बाद गोविंदघाट और बद्रीनाथ के बीच का रास्ता भी टूट गया और सभी लोगों को बस में ही पूरी रात बितानी पड़ी। इसके बाद लौटते हुए जब कर्णप्रयाग के पास एक स्कूल में रात बिताने का मन बनाया, तो स्थानीय लोगों ने मना कर दिया। इसके बाद सभी लोग रात के वक्त फिर बस में ही सो गए और सुबह उठकर देखा तो स्कूल भी पानी के बहाव में बह चुका था।
यहां से आगे बढ़ा तो हालात और खराब थे। एक जगह कच्चा रास्ता बनाया गया, जिससे लोगों को पैदल निकाला गया, जबकि बस पीछे-पीछे आई। इस बस के गुजरते ही एक बड़ा चट्टान वहां गिरा, जिसके साथ सब कुछ सैकड़ों फुट की गहराई में जा गिरा।
उन्होंने कहा कि इस ग्रुप में शाम लाल गर्ग, बीडी शर्मा और उनकी पत्नी ऊषा शर्मा सहित कई लोग शामिल थे, लेकिन इस आपदा को ताउम्र भुलाना मुश्किल है।
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बस ड्राइवर की जिद ने बचाई जान
सभी लोग मिनी बस में गए थे और सुरक्षित लौट आए, लेकिन जिंदगी की जद्दोजहद कम नहीं थी। दो रातें बस में गुजारीं। पता नहीं था कि यहां भी सुरक्षित रहेंगे या नहीं। एक दिन गंदे पानी से बनी खिचड़ी खाई। ठहरने और वापस लौटने के रास्ते के मसले पर बस ड्राइवर के साथ कई बार कहासुनी भी हुई, लेकिन उसकी जिद ने ही इन 30 यात्रियों को सुरक्षित घर पहुंचाया। उत्तराखंड निवासी होने की वजह से उसे सभी रास्तों के बारे में पूरी जानकारी थी और वह अपनी समझ से ही बाधाओं को पार करता चला गया।
पंचकूला के सौ लोग सुरक्षित लौटे
प्राकृतिक आपदा में तबाही के मंजर को इतने करीब से देखा कि मूल रूप से उत्तराखंड निवासी पंचकूला में रहने वाले दर्जनों परिवार इस गर्मी छुट्टी में अपने घर तक जाने की हिम्मत तक नहीं जुटा सके।
पिछले साल केदारनाथ तक की यात्रा पर निकले सेक्टर-10 निवासी सुदेश वशिष्ट (मूल निवासी तिलवाड़ा) और उनकी पत्नी मधु का कहना है कि तबाही का नजारा देखकर वे अपने घरों में ही रुक गए, लेकिन जब घरों को पानी में बहते देखा तो रूह कांप गया। उनके कुछ रिश्तेदार ऐसे हैं, जो आज तक इस तबाही के मंजर से उबर नहीं सके। उनके एक रिश्तेदार के परिवार में एक बुजुर्ग ऐसे भी हैं, जिन्हें प्राकृतिक आपदा के तुरंत बाद पैरेलाइसिस अटैक आया और अब भी वह सदमे से उबर नहीं सके हैं।
सुदेश वशिष्ट ने बताया कि उनके सामने सड़क बह गई और स्कूल के निशान तक मिट गए। ऊंचाई पर होने की वजह से उनका घर तो बच गया, लेकिन मंदाकिनी नदी के किनारे लगते दर्जनों घर पानी में विलीन हो गए। इस पूरी घटना को देखकर सदमे में आया परिवार आखिरकार पिछले साल 22 जून को पंचकूला सुरक्षित लौट आया। यह भगवान का शुक्र है।
तबाही के बीच बेटी ने ही पूरे परिवार को बचाया
सड़कों पर बहता बाढ़ का पानी और चंद फुट की दूरी पर सैकड़ों मीटर गहरी खाई...। तबाही का यह मंजर देखकर भी बी.कॉम की छात्रा अंकिता डरी नहीं। उसने अपने पापा से कहा कि इतने लोगों की मौत हो रही है, अब डरने से क्या फायदा? अंकिता ने हिम्मत नहीं हारी और अपने परिजनों को बचाने का संकल्प लेकर मारुति-800 कार खुद ड्राइव करने चल पड़ी।
वह रुदप्रयाग तक पूरे रास्ते में खाई और पानी के तेज बहाव के पास से गुजरकर तमाम बाधाओं को पार करती हुई आखिरकार अपने परिजनों को घर तक पहुंचाने में कामयाब रहीं। उस कार में अंकिता के पिता राजेश पुरोहित, मम्मी शशि पुरोहित, बहन प्राची और प्रियंका भी बैठी थीं।
अंकिता ने कहा कि ड्राइविंग सीखने के बाद उसने पहली बार ऐसे खतरनाक रास्तों पर ड्राइविंग की, क्योंकि हालात देखकर उसे लगा कि यहां से बचने का बस यही एक विकल्प बचा है। इसी सोच ने हौसला बढ़ाया और वह बाधाओं से लड़ते हुए मंजिल की ओर चल पड़ी। आखिरकार, कामयाब भी रही। इसके लिए आज भी वह भगवान का धन्यवाद करती है।
9 लोगों के परिवार में अकेली बची वो
उत्तराखंड के केदारघाटी में ठीक एक साल पहले आई त्रासदी में मोहाली के फेज-3 बी1 स्थित श्री वैष्णों देवी माता मंदिर के पुजारी श्याम लाल डबराल की पूरे परिवार समेत मौत हो गई थी। उनके परिवार में एकमात्र उनकी पत्नी शशि डबराल ही जीवित बची। पूरे परिवार को खो देने का दर्द लेकर शशि इस हादसे के बाद कुछ समय तक ही यहां रहीं। चार माह पूर्व वह अपने पैतृक गांव उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल स्थित चंबा चली गईं।
रविवार को मंदिर के पुजारी महेश्वर से इस संबंध में बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि इस हृदयविदारक हादसे के बारे में उनकी शशि देवी ने बात हुई थी उन्होंने उन्हें बताया था कि उन्हें उत्तराखंड गए हुए थोड़ा ही समय हुआ था। 15 जून सुबह से ही मूसलाधार बारिश हो रही थी। इसके बाद 16 जून को वहां जलप्रलय आई। इससे बचने के लिए वह और उनके पति श्यामलाल, उनकी बहन और सास-ससुर दूसरे किनारे पर चले गए। लेकिन, उनका बाकी का परिवार दूसरे किनारे पर पहुंचने से पहले ही जलप्रलय की चपेट में आ गया।
देखते ही देखते उनके माता-पिता, भाई-भाभी और दोनों बच्चे इसमें बह गए। बच्चों में उनकी 12 साल की बेटी स्वाति और आठ साल का बेटा नितिन था। इस हादसे के बाद उनके पति श्यामलाल और शेष लोग भी इस त्रासदी के शिकार हो गए। इस हादसे में वहीं एकमात्र अपने परिवार में जीवित बच सकी।
मंदिर के पुजारी श्री महेश्वर ने मंदिर प्रबंधक कमेटी के कार्यालय में लगी श्याम लाल और उनके बच्चों की फोटो भी दिखाई। उन्होंने बताया कि अपना सब कुछ खोने के बाद शशि देवी मंदिर में आकर रहने लगी और ज्यादातर समय मंदिर के कार्यों में बिताती थी। इस दौरान उन्होंने बोलचाल भी कम कर दी थी। मंदिर कमेटी ने उनकी पूरी मदद करने के साथ-साथ उन्हें मंदिर में नौकरी भी दी।
वह केवल मंदिर में आने वाले बच्चों के साथ समय व्यतीत करती थीं। एक दो बार उसके माता-पिता उनसे मिलने आए और उन्हें गांव चलने को कहा, लेकिन, वह नहीं गईं। पुजारी ने बताया कि अब शशि देवी को मंदिर छोड़े हुए करीब चार माह होने वाले हैं और वह अब अपने पैतृक गांव टिहरी गढ़वाल के चंबा चली गईं। मंदिर के लोग आज भी पुजारी श्याम लाल को याद करते हैं।
जिंदा रहने का जज्बा ही घर ले आया
खतरनाक जलजले में फंसकर उन्हें उम्मीद नहीं थी कि वे वापस जिंदा लौट आएंगे। जो जहां था, वहीं अपने-अपने रब को याद कर रहा था। इधर , उनके घरवाले अपनों की सलामती और घर वापसी के लिए दुआएं कर रहे थे। वहां टूटी पहाड़ियों, कटी सड़कों में फंसे लोगों के लिए हर तरफ से उम्मीदें टूट चुकी थी। तभी मालूम चला कि फंसे लोगों को बचाने का जिम्मा सेना ने उठा लिया है। फिर क्या भूखे प्यासे ही सही, इस उम्मीदें में दिन और रात काटी कि कभी न कभी सेना उन तक जरूर पहुंच जाएगी।
भले ही पांच दिन से सोलह दिन लगे अंबाला के करीब 160 श्रद्धालु सेना की मदद से सकुशल अपने घर लौट आए। त्रासदी के एक साल बीत गया लेकिन उनकी सिहरन आज भी उनकी बातों से साफ झलकती है। ये श्रद्धालु वापस जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।
मलबे से ढूंढकर खाईं रोटियां, बचाई जान
अंबाला के ये श्रद्धालु केदारनाथ से नीचे गोबिंदघाट, हेमकुंड साहिब और बद्रीनाथ में फंसे हुए थे। लेकिन सबसे ज्यादा खराब हालत गोबिंदघाट और हेमकुंड में फंसे लोगों की थी। यहां फंसे लोग राजदीप सिंह सिद्धू, दविंद्र, विनय और शमशेर के अनुसार एक बार तो लगा कि यहां से निकलना अब नामुमकिन है। खाने और पीने का सामान खत्म हो चुका था।
लेकिन जिंदा रहने की चुनौती भी सामने थी। इसीलिए उन्हें यह ध्यान आया कि गोबिंदघाट का जो गुरुद्वारा ढह गया है, उसके मलबे में कहीं न कहीं गुरुद्वारे में तैयार किया गया लंगर की रोटियां जरूर मिलेंगी। इसी आस से उन्होंने घंटों मलबे से मिट्टी से सनी काफी रोटियां निकाल ली, उन्हीं रोटियों को वहीं पाने से साफ कर उन्होंने खाया और अपनी जान बचाई। नरेश शर्मा व वीना शर्मा के अनुसार वे लोग तेरह दिनों तक बद्रीनाथ में ही फंसे रहे। सेना का सहारा न होता तो शायद जिंदा बचकर आना नामुमकिन था।
कागज की किश्ती तरह बह रही थीं गाड़ियां
ड्राइवर दविंद्र के अनुसार वे गोबिंदघाट गुरुद्वारे की पार्किंग में गाड़ी लगाने जा रहा था। लेकिन जाम की वजह से वे सड़क पर ही खड़ा जाम खुलने का इंतजाम कर रहा था। तभी आधी रात को ऐसा उफान आया कि उसके सामने ही पार्किंग में खड़ी तमाम गाड़ियां कागज की कश्ती की तरह पानी में बह गए।
वह ये सब देखकर सन्न रह गए, क्योंकि यदि सड़क पर जाम न होता तो वे भी उस वक्त अपनी गाड़ी के साथ पार्किंग में होते। जहां वे खड़े थे वो सड़क भी बह गई। वे आठ दिन बाद बमुश्किल लौटे। जबकि राजदीप सिंह सिद्धू का कहना है उनकी गाड़ी तो वही बह गई थी, क्योंकि वो पार्किंग में थी, गनीमत यही रही कि वे गाड़ी से बाहर थे। इसी तरह अंबाला के छह लोग भी इस त्रासदी का शिकार हो गए, जिनका आज तक कुछ पता नहीं चला।