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महादान: जिंदगी को अलविदा कह तीन जिंदगियों में खुशियां बिखेर गए कांगड़ा के नवनीत, दिल्ली में धड़केगा दिल
Sun, 13 Jul 2025 11:02 AM IST
निवेदिता वर्मा
संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Sun, 13 Jul 2025 11:02 AM IST
सार
इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे 23 साल के नवनीत सिंह 3 जुलाई को छत से गिर गए थे। पीजीआई में उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया था।
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नवनीत
- फोटो : फाइल
विस्तार
इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे 23 साल के नवनीत सिंह के अंगदान से तीन घरों में खुशियां लौट आई हैं। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के गांव गंगथ के रहने वाले इंजीनियरिंग के छात्र नवनीत को 3 जुलाई को छत से गिरने के बाद गंभीर चोट लगने पर पीजीआई लाया गया था।
पीजीआई में इलाज के दौरान शुक्रवार रात डॉक्टरों ने ब्रेन डेड घोषित कर दिया। इस दुख की घड़ी में उनके पिता जनक सिंह ने बेटे के अंगदान का साहसिक निर्णय लेकर न केवल तीन गंभीर रूप से बीमार जिंदगियों को नया सवेरा दिया बल्कि इंसानियत की मिसाल भी कायम की।
जनक सिंह के लिए यह फैसला उनके जीवन का सबसे कठिन क्षण था। अपने युवा बेटे के अंगदान का विचार ही दिल दहला देने वाला था। मगर जब उन्हें बताया गया कि नवनीत के अंग दूसरों को जीवन का एक और मौका दे सकते हैं तो पिता का हृदय विशाल हो गया। उन्होंने भरे गले से कहा, हमें गर्व है कि नवनीत इनमें जीवित रहेगा। इस दुख में नवनीत की मां अंजू, बहन पूजा और दादी सत्या देवी भी दृढ़ता से उनके साथ खड़ी रहीं। पीजीआई के निदेशक प्रो. विवेक लाल ने परिवार की इस असाधारण उदारता को नमन करते हुए कहा कि उनके इस फैसले ने कई रोगियों को नई आशा और जीवन का दूसरा अवसर दिया है।
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पीजीआई में इलाज के दौरान शुक्रवार रात डॉक्टरों ने ब्रेन डेड घोषित कर दिया। इस दुख की घड़ी में उनके पिता जनक सिंह ने बेटे के अंगदान का साहसिक निर्णय लेकर न केवल तीन गंभीर रूप से बीमार जिंदगियों को नया सवेरा दिया बल्कि इंसानियत की मिसाल भी कायम की।
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जनक सिंह के लिए यह फैसला उनके जीवन का सबसे कठिन क्षण था। अपने युवा बेटे के अंगदान का विचार ही दिल दहला देने वाला था। मगर जब उन्हें बताया गया कि नवनीत के अंग दूसरों को जीवन का एक और मौका दे सकते हैं तो पिता का हृदय विशाल हो गया। उन्होंने भरे गले से कहा, हमें गर्व है कि नवनीत इनमें जीवित रहेगा। इस दुख में नवनीत की मां अंजू, बहन पूजा और दादी सत्या देवी भी दृढ़ता से उनके साथ खड़ी रहीं। पीजीआई के निदेशक प्रो. विवेक लाल ने परिवार की इस असाधारण उदारता को नमन करते हुए कहा कि उनके इस फैसले ने कई रोगियों को नई आशा और जीवन का दूसरा अवसर दिया है।
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