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सुई से लेकर मंगलयान के पुर्जे तक ढले हरियाणा के सांचे में
ब्यूरो/अमर उजाला, फरीदाबाद
Updated Sat, 23 Jan 2016 03:40 PM IST
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देश की सबसे बड़ी लाइट इंजीनियरिंग इंडस्ट्री हरियाणा में। प्रदेश को यह पहचान दी है फरीदबाद की दस हजार माइक्रो, स्माल और मीडियम इकाइयों ने। बाजार की सभी चुनौतियों से निपटते हुए अपने कौशल से सफलता की ऐसी गाथा लिख रहे हैं, जिसकी गवाह एक छोटी सूई से लेकर अंतरिक्ष में मंडराता मंगलयान भी है।
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गुड़गांव के गांवों और गलियों में भी करीब 200 इकाइयां अपनी अलग पहचान बनाने में जुटी हैं। बाबा फरीद की नगरी को आजादी के बाद शरणार्थी के रूप में बसे कुछ हजार परिवारों ने खुद की मेहनत से देश के सबसे बड़े औद्योगिक नगर तब्दील किया। 1960 के दशक में हाथ के बनाए उपकरणों से शुरू हुआ यह सफर अब आधुनिक मशीनों तक पहुंच चुका है।
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20 हजार करोड़ सालाना से ज्यादा टर्नओवर से वाली शहर की लाइट इंडस्ट्री वर्तमान में सुई से लेकर मंगलयान तक के पुर्जे बनाने विदेश में भी अपने उत्पादों की धाक जमा चुकी है। करीब 10 हजार सूक्ष्म, लघु और मझोली इकाइयां घरेलू उपकरणों से लेकर हैवी इंडस्ट्री के लिए उत्पाद तैयार कर रही हैं।
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विकास के लिए अच्छी पहल
लाइट इंजीनियरिंग उद्योगों के लिए सरकार क्लस्टर डेवलपमेंट पर काम कर रही है। इसमें एक ही तरह के उद्योगों के बीच गुणवत्ता युक्त उत्पादन, स्किल डेवलपमेंट के जरिए बेहतर श्रम, कम लागत में उत्पादकता बढ़ाने के अवसर पैदा किए जाएंगे। इनके बीच प्रतिस्पर्धा पैदा कर बेहतर उत्पान को भी प्रोत्साहित किया जाएगा।
उद्योगों की पूंजीगत और आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मुख्यमंत्री अगस्त 2015 में हैपनिंग हरियाणा की घोषणा कर चुके हैं। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के जरिए जहां उद्योगों के लिए पूंजी का आकर्षित किया जा रहा है वहीं तकनीकी ज्ञान का आदान प्रदान कर उन्हें वैश्विक गुणवत्ता वाले उत्पाद बनाने को तैयार किया जा रहा है।
बेहतर भविष्य की संभावना
फैक्टरी कानून में संशोधन, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, तकनीकी आयात के अलावा उद्योगों को बढ़ावा देने के सरकारी प्रयासों का असर भविष्य में देखने को मिलेगा। अधिकतर उद्यमियों का कहना है कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल उद्योगों के विकास और विस्तार के लिए गंभीर प्रयास कर रहे हैं। औद्योगिक विकास के लिए केंद्र या राज्य स्तर पर बनाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं का फायदा सबसे ज्यादा लाइट इंडस्ट्री को ही होगा क्योंकि इन्हें आधारभूत उद्योग माना जाता है।
दिक्कतें- महंगी बिजली
विदेश और अन्य राज्यों के उत्पादों से प्रतिस्पर्धा में उद्यमियों को सबसे बड़ी बाधा महंगी बिजली लगती है। मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन के महासचिव रमणीक प्रभाकर के अनुसार अक्तूबर 2015 में जारी किए गए टैरिफ प्लान में 50 किलोवाट से अधिक बिजली की खपत करने वाले बड़े उद्योगों की दरों में प्रति यूनिट 10 फीसदी तक का इजाफा किया गया।
औद्योगिक इकाइयों की मीटर रीडिंग केडब्ल्यूएच (किलोवाट प्रति घंटे) की जगह केवीएच (किलो वोल्ट प्रति घंटे) के हिसाब से की गई है। जिले के करीब 80 फीसदी उद्योग पावर कैपेसिटर बैंक का इस्तेमाल नहीं करते हैं, केवीएच रीडिंग में इन्हें नुकसान उठाना पड़ रहा है क्योंकि यह ज्यादा होती है। पावर कैपेसिटर लगाने में छोटी से छोटी इकाई पर कम से कम 50 हजार तक का बोझ पड़ा है।
महंगी श्रम
एक नवंबर से प्रदेश में न्यूनतम मजदूरी 5600 से बढ़ाकर 7600 किए जाने का सीधा असर सूक्ष्म और लघु उद्योगों पर पड़ा है। वर्तमान में राजस्थान में न्यूनतम मजदूरी 5100 रुपये और उत्तर प्रदेश में 4900 रुपये है। कभी दिल्ली में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाए जाने पर वहां के उद्योग फरीदाबाद में संभावनाएं तलाश रहे थे। अब वही दूसरे प्रदेशों में धंधा जमाने की सोच रहे हैं। राज्य के सबसे पहले औद्योगिक नगर में श्रमिकों का जीवन स्तर भी मानकों के अनुरूप नहीं है।
पूंजीगत बाधाएं
सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योगों की सेल्स लिमिट अभी भी 1.5 करोड़ रुपये है। उद्यमियों के हिसाब से यह काफी कम है, वर्तमान परिस्थितियों में इसे बढ़ाकर पांच करोड़ किए जाने की मांग उद्यमी लगातार उठा रहे हैं। दूसरी समस्या एक्साइज व अन्य करों की एक समान दरें होना है। बड़े और छोटे दोनों उद्योगों पर वैट आदि टैक्स समान रूप से लगते हैं।
औद्योगिक असुरक्षा
सरकारी कागजों पर तो सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को संरक्षण देने के प्रावधान किए गए हैं लेकिन हकीकत में यह लागू नही हैं। नियमानुसार सार्वजनिक उपक्रम इन उद्योगों से एक निश्चित मात्रा में उत्पाद खरीद कर इस्तेमाल करेंगे लेकिन इसे माना नहीं जाता है। सार्वजनिक उपक्रम भी अपेक्षाकृत महंगा होने की वजह से इन उद्योगों से उत्पाद खरीदने से हिचकते हैं। निर्धारित मात्रा का मात्र पांच से दस फीसदी उत्पाद ही खरीदकर औपचारिकता निभा दी जाती है बाकी 90 फीसदी माल बड़े उद्योगों से खरीदा जाता है।
गैर अधिसूचित क्षेत्रों के उद्योगों को मिले स्वीकृति
जिले के 15000 से अधिक रजिस्टर्ड उद्योगों में से मात्र 3674 को ही सरकारी प्लॉट मिला है। रजिस्टर्ड के अलावा भी दस हजार और सूक्ष्म और लघु इकाइयां हैं। प्लाट ने होने से सभी उद्योग गैर अधिसूचित क्षेत्र में चल रहे हैं। सीएलयू नहीं मिलने की वजह से इंस्पेक्टर राज हावी है। जिले में उद्योगों के 31 पॉकेट्स चिह्नित किए गए है जो गैर अधिसूचति इलाकों में स्थापित हैं। प्रदूषणकारी उद्योगों को हटाकर अन्य को उसी जगह स्वीकृति दिए जाने का प्रस्ताव सरकार के पास विचाराधीन है। यदि सरकार इस पर निर्णय ले तो उद्यमियों को बड़ी राहत मिलेगी।
फैक्टरी एक्ट संशोधन का इंतजार
देश में अभी भी 1948 में बनाया गया फैक्टरी एक्ट लागू है। मात्र 11 लोगों के नियुक्त होने पर यह एक्ट लागू हो जाता है। इस छोटे से कारखाने पर भी श्रम कानून, कर्मचारी भविष्य निधि, कर्मचारी बीमा जैसी शर्तें लागू हो जाती हैं। 68 साल पहले बनाया गया यह कानून वर्तमान परिस्थितियों में सही नहीं बैठता। केंद्र सरकार अगस्त 2015 में फैक्टरी एक्ट में संशोधन का बिल लाई है। इसके तहत 40 कामगार (इनमें प्रबंधन या ऑफिस के कर्मचारी शामिल नहीं है) वाली यूनिट पर ही फैक्टरी एक्ट लागू होगा। फिलहाल उद्यमी इस बिल के पास होने के इंतजार में हैं।
प्रदूषण नियंत्रण में मिले मदद
एनजीटी ने दिसंबर 2016 तक जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (जेडएलडी) मानक लागू करने के निर्देश जारी किए हैं। जिले में करीब एक हजार यूनिट पानी के इस्तेमाल पर आधारित हैं। इनमें अधिकतर यूनिट सूक्ष्म या लघु पूंजी वाली हैं। करीब डेढ़ से दो करोड़ की लागत से तैयार होने वाला एफ्ल्यूएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) लगाना इन छोटी पूंजी वाले उद्योगों के लिए मुश्किल है।
ऐसे में यदि सरकार चार पांच करोड़ की लागत से बड़ा कॉमन एफ्ल्यूएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) का निर्माण करा दे तो इन उद्योगों को खत्म होने से बचाया जा सकता है। सरकार पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) या बिल्ट ऑपरेट ट्रांसफर (बीओटी) आधार पर भी सीईटीपी का निर्माण करवा सकती है।
समय सीमा पर भुगतान बड़ी जरूरत
सूक्ष्म, लघु और मझोले आकार के उद्योगों को आर्थिक सुरक्षा समय की मांग और जरूरत दोनों है। नियमानुसार एमएसएमई सेक्टर से की गई खरीद का भुगतान किसी भी सूरत में एक माह के भीतर किया जाना चाहिए। व्यवहार में यह नियम लागू नहीं हो पा रहा है। इसमें सबसे ज्यादा दिक्कत टियर दो और टियर तीन के उद्योगों को होती है।
इनसे उत्पाद लेने वाले टियर एक या टियर दो स्तर के उद्योग समय पर भुगतान नहीं करते। कुछ उद्यमियों को 90 दिन या उसके बाद ही भुगतान मिल रहा है। इतने दिन पूंजी रुकने से यह सूक्ष्म और लघु उद्योग आर्थिक संकट में आ जाते है। यदि सरकार सख्त कानून बनाकर समय से भुगतान निश्चित कराए तो बाजार में पूंजी की तरलता बढ़ेगी और उद्योगों को आसानी होगी।