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MSME: इन दो शख्स की सक्सेस स्टोरी प्रोत्साहित करेगी आपको
ब्यूरो/अमर उजाला, फरीदाबाद
Updated Sat, 23 Jan 2016 04:02 PM IST
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खेती छोड़ लगाया उद्योग
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खेती का पैतृक व्यवसाय छोड़ 1980 में 20 हजार रुपये से टेबल फैन की पंखड़ियां बनाने की यूनिट लगाने वाले श्यामसुंदर शर्मा वर्तमान में तीन फैक्ट्रियों के मालिक हैं। इनके उत्पाद कृषि और अर्थ मूवर्स उपकरण बनाने वाली महिंद्रा, एस्कॉट्र्स, एस, हाइड्रा और टैरेस जैसी कंपनियों को सप्लाई किए जाते हैं।
वह कहते हैं कि 1980 के दशक में उन्होंने एपी इंजीनियरिंग और सुपर इंजीनियरिंग नाम से दो यूनिट लगाईं। इनमें पंखुडिय़ां बनाने के बाद पंखे और मोटर का उत्पादन शुरू किया, फिर कूलर और वाशिंग मशीन भी बनाईं। कृषि और कंस्ट्रक्शन उपकरण बनाने वाली बड़ी कंपनियां आईं तो उनके लिए उत्पाद तैयार करने लगे।
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इसके लिए सेक्टर 56 में बड़े क्षेत्रफल में टेक्नोफैब इंडस्ट्री नाम से फैक्ट्री डाली। यह कंपनी हाइड्रा, टैरेस कंपनियों के लिए बकेट, महेंद्रा, एस्कॉट्र्स, एस टैरेस कंपनियों के लिए रोड रोलर के रोलर, कृषि उपकरण बना रही है। करीब चालीस करोड़ सालाना कारोबार करने वाले श्यामसुंदर सात सौ परिवारों के रोजगार का जरिया बने हैं।
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पुरानी मोल्डिंग मशीन से शुरू किया कारोबार
1983 में बड़ी मुश्किल से आठ हजार रुपये जोड़ कर हाथ से चलने वाली पुरानी मोल्डिंग मशीन खरीद कर रविभूषण खत्री इस क्षेत्र में आए थे। आज 25 करोड़ रुपये सालाना टर्नओवर के साथ 100 से ज्यादा लोगों को रोजगार मुहैया करा रहे हैं।
बताते हैं कि घर का एकमात्र टेबल फैन भी उन्होंने कारखाने में लगाया था, वह भी अपने लिए नहीं कारीगरों के लिए। जब कारीगर काम नहीं करते तो थोड़ी देर पंखें की हवा खा लेते थे। पहला ऑर्डर अब बंद हो चुकी कार के लिए उपकरण बनाने वाली हैला कंपनी से मात्र 150 रुपये कीमत का मिला था। उसके बाद से कई बड़ी कंपनियों के लिए उत्पाद तैयार किए और कारोबार बढ़ता गया।
वर्तमान में उनके पास करीब पंद्रह आधुनिकतम ऑटो हाईड्रोलिक मोल्डिंग मशीनें हैं। कहते हैं कि 80 लाख रुपये कीमत वाली ये मशीनें उसी आठ हजार रुपये की सेकेंड हैंड मशीन से बनीं हैं। वर्तमान में वह जेसीबी जैसी कंपनियों के लिए उपकरण तैयार कर रहे हैं। वह टियर वन टियर टू और टियर थ्री के रूप में कई मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए उत्पाद तैयार कर रहे हैं।
उनके उत्पाद ब्राजील, यूएसए और यूरोपियन देशों में भी भेजे जा रहे हैं। कारोबार में सफलता अर्जित करने के बाद उन्होंने 1991 में गरीब बच्चों के लिए एक स्कूल खोला। स्कूल में पढ़ रहे करीब पौने तीन सौ विद्यार्थियों को कापी, किताब, भोजन आदि सुविधाएं मुफ्त उपलब्ध कराई जाती हैं।