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किताबों के साथ जुड़ी रहती हैं बहुत सी यादें, डिजिटल में अपनापन नहीं

Mon, 30 May 2022 02:12 AM IST
Panchkula Bureau पंचकुला ब्‍यूरो
Updated Mon, 30 May 2022 02:12 AM IST
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Many memories are associated with books, there is no familiarity in digital
चंडीगढ़। वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा, आइंदा भी मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल और महके हुए रुक्के, किताबें मांगने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे उनका क्या होगा...वो शायद अब नहीं होंगे! गुलजार की इस नज्म को युवा भी महसूस करते हैं। चूंकि आज लोगों ने किताबें पढ़नी कम कर दी हैं, मोबाइल और डिजिटल डिवाइस में ज्यादा मशगूल हो गए हैं। टेक्नोलॉजी के बावजूद बहुत से युवा आज भी किताबों के साथ अपने रिश्तों को बरकरार रखे हुए हैं। उन्हें किताबें हार्डकॉपी में रखना पसंद है। किताबें इंसान के साथ निजी रिश्ते बना लेती है, आपकी बहुत सी यादें किताबों के अलग-अलग पन्नों में छिपी होती है। कई बार अनजाने में ही किताब के पन्नों पर पढ़ते समय अहसास और कलाकृतियां उकेरे जाती हैं जो बाद में आपकी याद का एक हिस्सा बनकर रह जाती है। ये सब धरोहर के रूप में आपकी अगली पीढ़ी को भी मिलता है, लेकिन डिजिटल डिवाइस में ये सब रिश्ते और अहसास नहीं है।
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कोट्स
पिताजी की किताब में मिला था मां का प्रेम पत्र
किताबों के साथ मेरे निजी रिश्ते बन जाते हैं। कई बार रेफरेंस के लिए किंडल का भी इस्तेमाल करता हूं, लेकिन ये हार्डकॉपी की जगह नहीं ले सकता। घर में लाइब्रेरी में करीब डेढ़ हजार के करीब किताबें रखी हैं और हर किताब से अलग तरह का जुड़ाव है। पिताजी भी किताबें पढ़ते थे, एक बार उन्हीं की पुरानी किताबें देखते हुए मुझे अपनी मां का लिखा हुआ प्रेम पत्र मिला। इससे पहले मुझे नहीं पता था कि माता-पिता में शादी के दिनों के बाद पत्र के माध्यम से भी संवाद होता था। मैंने पत्र को लेमिनेशन करवाकर घर में रखा है। एक ओर किस्सा है- कुछ समय पहले किसी काम से एक महिला से मिलने के लिए इलाहाबाद गए थे। हमने जिस कमरे में मुलाकात की, पता चला कि उसी कमरे में लेखक धर्मवीर भारती ने अपना उपन्यास ‘गुनाहों के देवता’ लिखा था। ऐसी पुरानी यादें किताबों के जरिए ही जिंदा रहती है।
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-अंकित नरवाल, लेखक
किताबें भाव अहसास करवाती हैं
जब तक हाथ में किताब पकड़ नहीं लेता, तब तक मुझे लगता ही नहीं है कि कुछ पढ़ा भी है। अगर कोई किताब पढ़नी है तो मेरे लिए उसकी हार्ड कॉपी होना बहुत जरूरी है। मैं डिजिटल डिवाइस पर नहीं पढ़ सकता हूं। यहां तक कि मैं डिजिटल डिवाइस पर लेखन का काम भी नहीं कर सकता हूं। मैं पहले कॉपी पर लिखता हूं, उसके बाद में उसे कंप्यूटर पर टाइप करता हूं। अगर मैं सीधा स्क्रीन पर लिखने बैठूं तो भाव खत्म हो जाते हैं। मैं अपने भावों को सिर्फ कागज पर उकेर सकता हूं। मुझे लगता है अभी किताबों का जमाना गया नहीं है। किताब मेलों में युवाओं की बहुत भीड़ होती है। किताबें जो भाव अहसास करवाती है, डिजिटल डिवाइस पर वो महसूस नहीं कर सकते हैं।
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-निंदर गुगियानवी, लेखक
ऑनलाइन किताबें भाव विहीन, पढ़ने में रुचि नहीं बनती
ऑनलाइन किताबें नहीं पढ़ीं। ऑनलाइन किताबें भाव विहीन लगती है और पढ़ने में रुचि ही नहीं बन पाती। किताबों की हार्डकॉपी ही हमेशा साथ रखता हूं। अधिकतर किताबें लाइब्रेरी से लेता हूं। बहुत सी किताबें सफर के समय भी खरीदी जाती है। किताबों के साथ आप लंबा समय व्यतीत कर सकते हैं, लेकिन डिजिटल डिवाइस पर आप थोड़ी देर में ही परेशान हो जाते हैं। हालांकि लेखन का काम मैं मोबाइल और कंप्यूटर पर कर लेता हूं क्योंकि बहुत बार कॉपी पेन नहीं होता। लेकिन मोबाइल होता है तो विचारों को उसी समय सहेजा जाता है।
-रविंदर धालीवाल, कहानी लेखक
नोट : इनकी फोटो विक्रम जी के ट्रैक से
स्कूल के समय से ही किताबों से लगाव
स्कूल के समय से ही किताबों से लगाव था। अब वकालत करती हूं तो किताबों के बिना गुजारा नहीं होता। तकनीक के युग में आज भी किताबों से पढ़ना पसंद है। -अर्शदीप कौर, महिला अधिवक्ता
सीखने के लिए किताबें पढ़ें
इंटरनेट सिर्फ सवालों का जवाब कम समय में दे सकता है। जब बात कुछ सीखने की हो तो किताबों से ज्यादा अच्छा माध्यम आज भी कोई दूसरा नहीं है। - कोमल राठौड़, बैंक कर्मचारी
किताबें, ई-बुक से बेहतर
ई-बुक से कई गुना ज्यादा बेहतर पढ़ाई किताबों से होती है। जब भी कोई किताब हाथ में होती है तो पढ़ने में और अधिक रुचि पैदा करती है। -विवेक सिंह, विद्यार्थी पीयू
पुरानी किताबों में मिलती हैं यादें
स्कूल के दौर की कुछ किताबें आज भी जब हाथ में पड़ती हैं तो पन्नों के बीच में पैसे, फूल जैसी पुरानी यादें मिल जाती है। कई सालों बाद बचपन की यादें मिलने पर अच्छा लगता है। - मधुलिका सिंह, महिला अधिवक्ता
किताबें सफलता की कुंजी
पिछले कुछ समय से में सरकारी नौकरी के लिए तैयारी कर रहा हूं। मेरा खुद का अनुभव यह है कि किसी विषय को पढ़ने में और कुछ सीखने में जो मदद किताबें करती है वह ई-बुक नहीं कर सकती हैं। - बसंत सिंह, विद्यार्थी, पीयू
ई-बुक का उपयोग भी जरूरी
किताबों से पढ़ना बेहद कारगर होता है, लेकिन इस आधुनिक समय में हमें ई-बुक का भी प्रयोग करना आना चाहिए। बदलते समय के साथ यह भी जरूरी है। - नवदीप कौर, महिला अधिवक्ता
आधुनिक युग में किताबें भी हैं डिजिटल
कोरोना के बाद से सब कुछ डिजिटल हो गया है। हर हाथ में मोबाइल और टेबलेट है तो ई-बुुक के माध्यम से ही सही कम से कम युवा किताबों से जुड़ा तो है। - कोमल सिंह, विद्यार्थी, पीयू
किताबों के साथ ही बीतता है समय
मुझे बायोग्राफी पढ़ने का बहुत शौक है। कहीं भी किसी महान इंसान की बायोग्राफी दिखती है तो तुरंत खरीद लेता हूं। मेरा ज्यादातर समय इन किताबों के साथ ही बीतता है। -ऋषभ, विद्यार्थी, पीयू
ई-बुक के प्रयोग में संकोच नहीं
आमतौर पर किसी जानकारी को प्राप्त करने के लिए किताब ही पढ़ता हूं, लेकिन ई-बुक के प्रयोग में भी संकोच नहीं करता। इससे सुविधा तो है ही साथ ही समय भी बच जाता है। -मनोज कुुमार, अधिवक्ता
किताबें और ई-बुक दोनों बराबर
किताबों का काम हमें ज्ञान और जानकारी देना है। अब वह चाहे छपी हुई किताबों से मिले या डिजिटल किताब से, मेरे लिए तो दोनों ही बराबर हैं। -विजयभान, विद्यार्थी पीयू
किताबों का भविष्य है ई-बुक
स्कूल के समय में नई किताबें लाने और उनके रखरखाव करने का बड़ा चाव था। अब समय आधुनिक है। वर्तमान में ई-बुक अधिक सुविधाजनक है। ई-बुक किताबों का भविष्य है। -अजय, विद्यार्थी, पीयू

पढ़ कर बांट देता हूं किताबें
किताबें पढ़ कर अपने जानने वालों में बांट देता हूं। इंटरनेट से ज्ञान प्राप्त करने की दौड़ में हम लोग किताबों से दूर होते जा रहे हैं। युवाओं का किताबों से जुड़ाव जरूरी है। -अमृतवीर सिंह, अधिवक्ता
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