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जमीन हड़पने के आरोपी भाजपा पार्षद ने फिर दायर की जमानत याचिका
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Mon, 27 Jun 2016 11:06 PM IST
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पार्षद सतीश कैंथ
- फोटो : amar ujala
हल्लोमाजरा में विधवा के प्लॉट पर कब्जा करने के मामले में आरोपी और 9 जून से बुड़ैल जेल में बंद भाजपा पार्षद सतीश कैंथ ने निचली अदालत से जमानत याचिका खारिज होने के बाद वेकेशनल एडीजे कोर्ट में जमानत याचिका दायर की है। अदालत ने सेक्टर-31 थाना पुलिस को नोटिस जारी कर एक जुलाई तक जवाब दाखिल करने के आदेश दिए हैं।
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कैंथ, उनके पिता सोहन लाल और पत्नी जसवंत कौर के खिलाफ सेक्टर-31 थाना पुलिस ने इसी वर्ष 14 मार्च को धोखाधड़ी और आपराधिक ट्रैसपासिंग की धाराओं में केस दर्ज किया था। इससे पहले 15 जून को निचली कोर्ट से कैंथ की जमानत याचिका खारिज हो चुकी है।
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कैंथ की ओर से दायर जमानत याचिका में कहा गया है कि उसे पुलिस ने केस में झूठा फंसाया है। उसका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। एफआईआर के तथ्यों को देखने से पता चलता है कि पुलिस संबंधित अपराध के साथ उनकी भूमिका को जोड़ने में नाकाम रही है। संबंधित जमीन की जीपीए उनके पिता सोहन लाल के नाम है। वहीं इसकी सेल डीड उनकी पत्नी जसवंत कौर के नाम है। दस्तावेजों में कहीं भी उनका नाम नहीं है। इससे उनके खिलाफ कोई केस नहीं बनता। कैंथ की ओर से कहा गया है कि, अगर उनके पिता और पत्नी ने कोई अपराध किया है तो ऐसे में उन पर अपराध का दायित्व हस्तांतरित नहीं किया जा सकता।
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याचिका में कहा गया है कि उनकी पत्नी ने बिमला देवी के खिलाफ जमीन पर दखल देने पर रोक लगाने की मांग संबंधी याचिका दायर की थी। इस पर प्रतिवादी पक्ष को नोटिस भी हुआ था। वहीं कैंथ ने कहा है कि बिमला देवी द्वारा शिकायत दायर करने पर उन्हें पता चला कि एक टाइपिंग गलती हुई है, जिसमें अनजाने में टाइपिस्ट ने हल्लोमाजरा स्थित खसरा नंबर 133/1/2 और खतौनी नंबर 64-65, हदबस्त नंबर 219 की प्रॉपर्टी की जानकारी की जगह हल्लोमाजरा स्थित खसरा नंबर 133/2/1 व खतौनी नंबर 64-65 दर्ज कर दिया था। उस गलती की जानकारी जसवंत कौर और सोहन लाल के सामने कभी नहीं आई।
उनका कहना है कि शिकायतकर्ता ने पुलिस को गुमराह किया है। ताकि याचिकाकर्ता की छवि को नुकसान पहुंचाया जा सके। अगर एफआईआर के तथ्यों पर विश्वास भी कर लिया जाए तो भी धोखाधड़ी और ट्रैसपासिंग की धाराएं उनके खिलाफ नहीं बनती। क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड में कहीं भी उनका नाम नहीं है। वहीं बिमला देवी यह साबित करने में भी नाकाम रही हैं कि याचिकाकर्ता या उनके परिवार ने उनकी जमीन पर कब्जा किया है।