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20 लाख साल पुरानी बस्ती के खुलने लगे राज
अरविंद वाजपेयी/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Mon, 24 Feb 2014 09:31 AM IST
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चंडीगढ़ से 20 किलोमीटर की दूरी पर मिले जीवाश्म की हड्डी पर एक कट मिला है। यह कट बता रहा है कि 20 लाख साल पहले चंडीगढ़ के आसपास रहने वाले शिकारी थे।
आर्कियोलॉजिस्ट मानव की शिकार प्रवृत्ति और मानव बस्ती से जुड़े अन्य तथ्यों को तलाश करने के लिए उस स्थान पर खुदाई शुरू करने जा रहे हैं, जहां यह जीवाश्म मिला है।
चंडीगढ़ के आर्कियोलॉजिस्ट के अनुसार इस बात के भी संकेत मिले हैं कि 20 लाख साल पहले मानव बस्ती में नुकीले पत्थरों से बने जो हथियार थे, वे कई सदियों तक जानवरों के शिकार के लिए इस्तेमाल किए जाते रहे।
यह भी संभावना है कि पत्थर से बने पतले तीर और जानवरों की हड्डियों को सुखाकर तैयार किए गए धनुष से शिकार किए जाने की जानकारी भी मिल सके। चंडीगढ़ के आर्कियोलॉजिस्ट के अनुसार यह जीवाश्म एक साल पहले मिला था।
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नहीं मिल पाई फ्रांस ले जाने की इजाजत :
सूत्रों के अनुसार इस रिसर्च से पेरिस की जानी मानी पुरातत्वविद् क्लेयर गैरलैंड और पुरातत्वविद् डॉ. मुकेश सिंह जुड़े हैं। जानकारों के अनुसार जो अवशेष मिले, उनको फ्रांस ले जाने की इजाजत नहीं मिल पाई है।
इस जीवाश्म के नमूने को फ्रांस की अत्याधुनिक लैब में टेस्ट करके कई अन्य जानकारी भी निकाली जा सकती है। उस जगह की खुदाई की इजाजत भी काफी समय बाद मिल सकी है। इसी वजह से रिसर्च कुछ समय के लिए रुकी रही।
क्वार्ट्ज हथियार का कट :
आर्कियोलॉजिस्टों के अनुसार भारत में अब तक की यह पहली रिसर्च है जिसमें 20 लाख साल पहले का फॉसिल मिला है। इससे पहले अफ्रीका में जो रिसर्च हुई, उसमें भी ऐसा फॉसिल नहीं मिल सका।
आर्कियोलॉजिस्ट केके ऋषि के अनुसार यह जीवाश्म पहाड़ में फिक्स था। हड्डी में कट का निशान बताता है कि क्वार्ट्ज (नुकीला कर तैयार किया गया) हथियार इसको लगा।
उन्होंने कहा कि शिवालिक की पहाड़ियों को सोलह भागों में बांटा गया है। यह जीवाश्म टैट्रोट फॉरमेशन में मिला है जो कि शिवालिक की पहाड़ियों के चौथे भाग का अंतिम रूप हैं।
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आर्कियोलॉजिस्ट मानव की शिकार प्रवृत्ति और मानव बस्ती से जुड़े अन्य तथ्यों को तलाश करने के लिए उस स्थान पर खुदाई शुरू करने जा रहे हैं, जहां यह जीवाश्म मिला है।
चंडीगढ़ के आर्कियोलॉजिस्ट के अनुसार इस बात के भी संकेत मिले हैं कि 20 लाख साल पहले मानव बस्ती में नुकीले पत्थरों से बने जो हथियार थे, वे कई सदियों तक जानवरों के शिकार के लिए इस्तेमाल किए जाते रहे।
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यह भी संभावना है कि पत्थर से बने पतले तीर और जानवरों की हड्डियों को सुखाकर तैयार किए गए धनुष से शिकार किए जाने की जानकारी भी मिल सके। चंडीगढ़ के आर्कियोलॉजिस्ट के अनुसार यह जीवाश्म एक साल पहले मिला था।
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नहीं मिल पाई फ्रांस ले जाने की इजाजत :
सूत्रों के अनुसार इस रिसर्च से पेरिस की जानी मानी पुरातत्वविद् क्लेयर गैरलैंड और पुरातत्वविद् डॉ. मुकेश सिंह जुड़े हैं। जानकारों के अनुसार जो अवशेष मिले, उनको फ्रांस ले जाने की इजाजत नहीं मिल पाई है।
इस जीवाश्म के नमूने को फ्रांस की अत्याधुनिक लैब में टेस्ट करके कई अन्य जानकारी भी निकाली जा सकती है। उस जगह की खुदाई की इजाजत भी काफी समय बाद मिल सकी है। इसी वजह से रिसर्च कुछ समय के लिए रुकी रही।
क्वार्ट्ज हथियार का कट :
आर्कियोलॉजिस्टों के अनुसार भारत में अब तक की यह पहली रिसर्च है जिसमें 20 लाख साल पहले का फॉसिल मिला है। इससे पहले अफ्रीका में जो रिसर्च हुई, उसमें भी ऐसा फॉसिल नहीं मिल सका।
आर्कियोलॉजिस्ट केके ऋषि के अनुसार यह जीवाश्म पहाड़ में फिक्स था। हड्डी में कट का निशान बताता है कि क्वार्ट्ज (नुकीला कर तैयार किया गया) हथियार इसको लगा।
उन्होंने कहा कि शिवालिक की पहाड़ियों को सोलह भागों में बांटा गया है। यह जीवाश्म टैट्रोट फॉरमेशन में मिला है जो कि शिवालिक की पहाड़ियों के चौथे भाग का अंतिम रूप हैं।