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कारगिल युद्ध के शहीद को अब तक वीरता पदक नहीं, मां की आंखें छलकी
जितेंद्र शर्मा/अमर उजाला, पठानकोट
Updated Wed, 27 Jul 2016 09:37 AM IST
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अपना दुखड़ा सुनाती शहीद हरीश पाल शर्मा की माता व भाई सतीश शर्मा, वीर चक्र विजेता कैप्टन रघुनाथ सिंह।
- फोटो : amarujala
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कारगिल युद्ध में शहादत का जाम पीने वाले भारतीय सेना के 13 जैक राइफल के शहीद लांस नायक हरीश पाल शर्मा, गांव भरोली के परिजनों की आंखें विजय दिवस पर बरबस ही छलक उठती है। सरकार की बेरुखी भी इनके दर्द को कम नहीं होने दे रही है।
शहीद की माता राज दुलारी व भाई सतीश शर्मा ने बताया कि 15 जून 1999 को उन्होंने कारगिल युद्ध में अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ टाइगर हिल फतेह करते हुए शहादत दी थी। उनके अदम्य साहस व बहादुरी को सम्मुख रखते हुए सरकार की ओर से मरणोपरांत सेना मेडल देने की घोषणा की गई थी लेकिन अब तक उनके लाडले को घोषित वीरता पदक प्राप्त नहीं हो पाया। वह कई बार सरकार व सेना के यूनिट सेंटर जबलपुर से पत्र व्यवहार कर चुके हैं।
उन्होंने बताया कि बेटे की शहादत के डेढ़ वर्ष बाद उसकी पत्नी ने दूसरी शादी कर ली। सरकार की ओर से मिली आर्थिक सहायता भी उनकी बहू साथ ले गई। सरकार की ओर से अलॉट पेट्रोल पंप भी वह ही चलाती है। पंजाब सरकार से मात्र उन्हें दो लाख रुपये मिले थे। वह अपने दो बेटों के साथ घर का गुजारा मुश्किल से चला रही हैं। किसी भी राजनेता व प्रशासनिक अधिकारी ने उनके परिवार की सुध नहीं ली। उन्होंने बताया कि बेटे की शहादत के समय गांव के सरकारी स्कूल का नाम उनके बेटे के नाम पर रखने, लाइब्रेरी, स्टेडियम बनाने व गांव को आदर्श गांव बनाने की घोषणाएं की गई थी जो कागजों में दफन होकर रह गई। पंचायत की ओर से बनाया गया शहीदी गेट भी जर्जर हालत में है।
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शहीद की माता राज दुलारी व भाई सतीश शर्मा ने बताया कि 15 जून 1999 को उन्होंने कारगिल युद्ध में अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ टाइगर हिल फतेह करते हुए शहादत दी थी। उनके अदम्य साहस व बहादुरी को सम्मुख रखते हुए सरकार की ओर से मरणोपरांत सेना मेडल देने की घोषणा की गई थी लेकिन अब तक उनके लाडले को घोषित वीरता पदक प्राप्त नहीं हो पाया। वह कई बार सरकार व सेना के यूनिट सेंटर जबलपुर से पत्र व्यवहार कर चुके हैं।
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उन्होंने बताया कि बेटे की शहादत के डेढ़ वर्ष बाद उसकी पत्नी ने दूसरी शादी कर ली। सरकार की ओर से मिली आर्थिक सहायता भी उनकी बहू साथ ले गई। सरकार की ओर से अलॉट पेट्रोल पंप भी वह ही चलाती है। पंजाब सरकार से मात्र उन्हें दो लाख रुपये मिले थे। वह अपने दो बेटों के साथ घर का गुजारा मुश्किल से चला रही हैं। किसी भी राजनेता व प्रशासनिक अधिकारी ने उनके परिवार की सुध नहीं ली। उन्होंने बताया कि बेटे की शहादत के समय गांव के सरकारी स्कूल का नाम उनके बेटे के नाम पर रखने, लाइब्रेरी, स्टेडियम बनाने व गांव को आदर्श गांव बनाने की घोषणाएं की गई थी जो कागजों में दफन होकर रह गई। पंचायत की ओर से बनाया गया शहीदी गेट भी जर्जर हालत में है।
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कैप्टन रघुनाथ को मिला था वीर चक्र
वीर चक्र विजेता कैप्टन रघुनाथ सिंह
- फोटो : amarujala
कस्बा घरोटा निवासी कैप्टन रघुनाथ सिंह काटल को कारगिल युद्ध में बहादुरी की अद्भुत मिसाल कायम करने पर तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायण ने वीरचक्र प्रदान किया था।
कैप्टन रघुनाथ सिंह ने बताया कि कुछ समय पूर्व ही वह सेवानिवृत्त हुए हैं। सात जुलाई 1999 को उनकी यूनिट 13 जैक राइफल कारगिल में तैनात थी। उनकी सैन्य टुकड़ी जिसका नेतृत्व कैप्टन विक्रम बत्रा कर रहे थे को टाइगर हिल के प्वाइंट 05140 मास्कोहिल को फतेह करने का टास्क मिला।
उनकी सैन्य टुकड़ी ने टाइगर हिल के प्वाइंट 04875 की चोटी को फतेह करने के लिए आगे चढ़ाई शुरू की। दोनों तरफ से फिर भीषण गोलाबारी शुरू की। इसी बीच दुश्मन की एक गोली कैप्टन बत्रा का सीना भेदते हुए निकल गई। इससे वह शहादत का जाम पी गए।
कैप्टन बत्रा की शहादत के बाद उन्हें अपनी सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व करने का आदेश प्राप्त हुआ। उन्होंने बताया कि वह खुद रेंगते हुए दुश्मन के काफी करीब पहुंचे और जोरदार हमला बोलते हुए पाक सेना के ग्रुप कमांडर कैप्टन इमत्याज खां समेत 12 पाक सैनिकों को मारकर उस बर्फीली चोटी पर तिरंगा फहराया।
कैप्टन रघुनाथ सिंह ने बताया कि कुछ समय पूर्व ही वह सेवानिवृत्त हुए हैं। सात जुलाई 1999 को उनकी यूनिट 13 जैक राइफल कारगिल में तैनात थी। उनकी सैन्य टुकड़ी जिसका नेतृत्व कैप्टन विक्रम बत्रा कर रहे थे को टाइगर हिल के प्वाइंट 05140 मास्कोहिल को फतेह करने का टास्क मिला।
उनकी सैन्य टुकड़ी ने टाइगर हिल के प्वाइंट 04875 की चोटी को फतेह करने के लिए आगे चढ़ाई शुरू की। दोनों तरफ से फिर भीषण गोलाबारी शुरू की। इसी बीच दुश्मन की एक गोली कैप्टन बत्रा का सीना भेदते हुए निकल गई। इससे वह शहादत का जाम पी गए।
कैप्टन बत्रा की शहादत के बाद उन्हें अपनी सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व करने का आदेश प्राप्त हुआ। उन्होंने बताया कि वह खुद रेंगते हुए दुश्मन के काफी करीब पहुंचे और जोरदार हमला बोलते हुए पाक सेना के ग्रुप कमांडर कैप्टन इमत्याज खां समेत 12 पाक सैनिकों को मारकर उस बर्फीली चोटी पर तिरंगा फहराया।