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हाईकोर्ट में जाटों ने दिखाए तल्ख तेवर, हमें नहीं तो किसी को भी आरक्षण नहीं
विवेक शर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Fri, 17 Feb 2017 09:18 AM IST
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धरने पर डटे जाट
- फोटो : अमर उजाला
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आरक्षण आंदोलन मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट में जाटों ने तल्ख तेवर दिखाते हुए कहा कि अगर हमें नहीं तो किसी और भी आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। सुनवाई के दौरान वीरवार को जाटों ने अदालत में कहा कि अगर उन्हें आरक्षण नहीं मिलता तो फिर बीसी ए और बी वर्ग को भी इसका लाभ नहीं मिलना चाहिए।
जाटों ने दलील दी कि मंडल कमिशन ने अन्य जातियों के साथ ही उन्हें भी आरक्षण देने की सिफारिश की थी परंतु उन्हें इसका लाभ नहीं दिया गया। इंदिरा साहनी मामले का हवाला देते हुए जाटों ने कहा कि 10 साल में आरक्षण को रिव्यू करने का प्रावधान था और ऐसा नहीं किया गया ऐसे में बीसी ए व बी वर्ग का आरक्षण भी सही नहीं। सभी पक्षों की दलील पूरी न होने के चलते सुनवाई को शुक्रवार तक के लिए टाल दिया गया।
मामले की सुनवाई आरंभ होते ही जाटों की ओर से पेश वकील ने पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि मंडल कमिशन के गठन के बाद से ही हरियाणा में बीसी ए तथा बीसी बी श्रेणी में आने वाली जातियां आरक्षण का लाभ पा रही हैं। मंडल कमिशन ने जाटों को आरक्षण का लाभ देने की बात कही थी परंतु उस समय यह लाभ नहीं दिया गया। याची पक्ष बीसी वर्ग से ताल्लुक रखता है।
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मंडल कमिशन के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा इंदिरा साहनी मामले में दिए गए मानकों के अनुरूप कार्य किया जाना चाहिए था, जो नहीं किया गया। हर दस वर्ष में आरक्षण की समीक्षा अनिवार्य थी, जो नहीं की गई। ऐसे में बीसी ए और बी का आरक्षण भी सही नहीं है। बीसी वर्ग के होने के नाते याची इस याचिका को दाखिल नहीं कर सकते थे।
हाईकोर्ट ने इस पर स्पष्ट कर दिया कि इस याचिका में जाट आरक्षण को चुनौती दी गई है और कोर्ट इस याचिका का दायरा नहीं बढ़ाना चाहता। यदि उन्हें कोई आपत्ति है तो अलग से याचिका दाखिल कर इसे चुनौती दे सकते हैं।
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जाटों ने दलील दी कि मंडल कमिशन ने अन्य जातियों के साथ ही उन्हें भी आरक्षण देने की सिफारिश की थी परंतु उन्हें इसका लाभ नहीं दिया गया। इंदिरा साहनी मामले का हवाला देते हुए जाटों ने कहा कि 10 साल में आरक्षण को रिव्यू करने का प्रावधान था और ऐसा नहीं किया गया ऐसे में बीसी ए व बी वर्ग का आरक्षण भी सही नहीं। सभी पक्षों की दलील पूरी न होने के चलते सुनवाई को शुक्रवार तक के लिए टाल दिया गया।
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मामले की सुनवाई आरंभ होते ही जाटों की ओर से पेश वकील ने पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि मंडल कमिशन के गठन के बाद से ही हरियाणा में बीसी ए तथा बीसी बी श्रेणी में आने वाली जातियां आरक्षण का लाभ पा रही हैं। मंडल कमिशन ने जाटों को आरक्षण का लाभ देने की बात कही थी परंतु उस समय यह लाभ नहीं दिया गया। याची पक्ष बीसी वर्ग से ताल्लुक रखता है।
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मंडल कमिशन के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा इंदिरा साहनी मामले में दिए गए मानकों के अनुरूप कार्य किया जाना चाहिए था, जो नहीं किया गया। हर दस वर्ष में आरक्षण की समीक्षा अनिवार्य थी, जो नहीं की गई। ऐसे में बीसी ए और बी का आरक्षण भी सही नहीं है। बीसी वर्ग के होने के नाते याची इस याचिका को दाखिल नहीं कर सकते थे।
हाईकोर्ट ने इस पर स्पष्ट कर दिया कि इस याचिका में जाट आरक्षण को चुनौती दी गई है और कोर्ट इस याचिका का दायरा नहीं बढ़ाना चाहता। यदि उन्हें कोई आपत्ति है तो अलग से याचिका दाखिल कर इसे चुनौती दे सकते हैं।
‘अधिकतर पदों पर जाट काबिज फिर पिछड़े कैसे’
धरने पर डटे जाट
- फोटो : अमर उजाला
जाटों का पक्ष पूरा होने के बाद याचिका दाखिल करने वाले मुरारी लाल गुप्ता के वकील मुकेश वर्मा ने एडवोकेट लाल बहादुर खोवाल तथा पीआर यादव के साथ अपना पक्ष रखा। याची की ओर से 2014 में दाखिल की गई याचिका का हवाला दिया गया।
याची ने बताया कि उनके पास आरटीआई और सरकार की वेबसाइट से प्राप्त जानकारी है जिसके अनुसार हरियाणा में 39 प्रतिशत आईएएस, 37 प्रतिशत आईपीएस, 42 प्रतिशत एचसीएस एग्जीक्यूटिव, 62 प्रतिशत आईएफएस, फूड सप्लाई विभाग में 30 प्रतिशत तथा एचपीएस में 37 फीसदी पदों पर जाट काबिज हैं। ऐसे में उन्हें पिछड़ा कैसे कह सकते हैं जबकि उनकी आबादी इससे कहीं कम 25 फीसदी है।
गलत रिपोर्ट का आरोप
याची पक्ष ने कहा कि जाटों सहित अन्य को लाभ देने के लिए हरियाणा सरकार ने सर्वे की जिम्मेदारी क्रिड को दी थी और इसके लिए 70 लाख का भुगतान भी किया। क्रिड से अपने पक्ष में रिपोर्ट नहीं आता देख एमओयू के स्थान पर यह जिम्मेदारी एमडीयू रोहतक को दे दी। आरोप है कि प्रोफेसर खजान सिंह सांगवान को सर्वे का जिम्मा सौंपा गया और उन्होंने बिना फील्ड सर्वे किए ऑफिस में बैठे-बैठे रिपोर्ट जाटों के हक में तैयार कर दी।
याची ने कहा कि हरियाणा सरकार खुद इस रिपोर्ट को पूर्व में दाखिल याचिका पर गलत और बेबुनियादी मान चुकी है। ऐसे में इस रिपोर्ट के आधार पर आगे आरक्षण कैसे दिया जा सकता है। हाईकोर्ट का समय पूरा होने के चलते इस मामले में आगे सुनवाई नहीं हो सकी।
याची ने बताया कि उनके पास आरटीआई और सरकार की वेबसाइट से प्राप्त जानकारी है जिसके अनुसार हरियाणा में 39 प्रतिशत आईएएस, 37 प्रतिशत आईपीएस, 42 प्रतिशत एचसीएस एग्जीक्यूटिव, 62 प्रतिशत आईएफएस, फूड सप्लाई विभाग में 30 प्रतिशत तथा एचपीएस में 37 फीसदी पदों पर जाट काबिज हैं। ऐसे में उन्हें पिछड़ा कैसे कह सकते हैं जबकि उनकी आबादी इससे कहीं कम 25 फीसदी है।
गलत रिपोर्ट का आरोप
याची पक्ष ने कहा कि जाटों सहित अन्य को लाभ देने के लिए हरियाणा सरकार ने सर्वे की जिम्मेदारी क्रिड को दी थी और इसके लिए 70 लाख का भुगतान भी किया। क्रिड से अपने पक्ष में रिपोर्ट नहीं आता देख एमओयू के स्थान पर यह जिम्मेदारी एमडीयू रोहतक को दे दी। आरोप है कि प्रोफेसर खजान सिंह सांगवान को सर्वे का जिम्मा सौंपा गया और उन्होंने बिना फील्ड सर्वे किए ऑफिस में बैठे-बैठे रिपोर्ट जाटों के हक में तैयार कर दी।
याची ने कहा कि हरियाणा सरकार खुद इस रिपोर्ट को पूर्व में दाखिल याचिका पर गलत और बेबुनियादी मान चुकी है। ऐसे में इस रिपोर्ट के आधार पर आगे आरक्षण कैसे दिया जा सकता है। हाईकोर्ट का समय पूरा होने के चलते इस मामले में आगे सुनवाई नहीं हो सकी।