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High Court: सहमति से शारीरिक संबंध और बाद में शादी नहीं हुई तो यह दुष्कर्म नहीं... युवक पर दर्ज FIR रद्द
Sun, 21 Sep 2025 04:22 PM IST
अंकेश ठाकुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चडीगढ़
Published by: अंकेश ठाकुर
Updated Sun, 21 Sep 2025 04:22 PM IST
सार
सहमति से शारीरिक संबंध और बाद में शादी नहीं हुई तो यह दुष्कर्म नहीं है। यह टिप्पणी पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने एक मामले में करते हुए युवक पर दर्ज दुष्कर्म की एफआईआर रद्द करने का आदेश दिया है।
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high court
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम आदेश में यह स्पष्ट कर दिया कि दो वयस्कों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंध को केवल इस कारण दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता कि अंततः विवाह नहीं हो पाया। अदालत ने हरियाणा के एक युवक के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म के मामले में एफआईआर रद्द कर दी।
जस्टिस कीर्ति सिंह की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि किसी महिला की सहमति विवाह के झूठे वादे पर ली गई थी यह साबित करना है तो यह दिखाना आवश्यक है कि आरोपी की शुरू से ही शादी करने की कोई मंशा नहीं थी और उसने केवल शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए झूठा वादा किया।
मामले में शिकायतकर्ता महिला और युवक की सगाई हो चुकी थी। दोनों लंबे समय तक रिश्ते में रहे और रोका समारोह भी संपन्न हुआ था। यहां तक कि नवंबर 2024 की शादी की तारीख भी तय कर दी गई थी। लेकिन बाद में दोनों परिवारों में मतभेद उभर आए और विवाह नहीं हो सका। इसके बाद युवती ने युवक पर दुष्कर्म का मामला दर्ज करा दिया।
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हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि दोनों ही शिक्षित और परिपक्व वयस्क थे और शुरू से ही संबंध सहमति से बने थे। यह भी सामने आया कि विवाह न होने का कारण केवल दोनों परिवारों के बीच उत्पन्न मतभेद थे। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि केवल विवाह का वादा पूरा न होने से दुष्कर्म का मामला नहीं बनता, जब तक यह साबित न हो कि आरोपी की नीयत शुरू से ही धोखाधड़ी करने की थी।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह मामला इस बात का उदाहरण है जब एक सहमति आधारित संबंध, अपेक्षा अनुसार विवाह में परिणत न होने पर आपसी रंजिश का शिकार बन गया और उसे आपराधिक रंग दे दिया गया। ऐसा दुरुपयोग न्यायालयों द्वारा बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इस आधार पर अदालत ने आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द कर दी।
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जस्टिस कीर्ति सिंह की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि किसी महिला की सहमति विवाह के झूठे वादे पर ली गई थी यह साबित करना है तो यह दिखाना आवश्यक है कि आरोपी की शुरू से ही शादी करने की कोई मंशा नहीं थी और उसने केवल शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए झूठा वादा किया।
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मामले में शिकायतकर्ता महिला और युवक की सगाई हो चुकी थी। दोनों लंबे समय तक रिश्ते में रहे और रोका समारोह भी संपन्न हुआ था। यहां तक कि नवंबर 2024 की शादी की तारीख भी तय कर दी गई थी। लेकिन बाद में दोनों परिवारों में मतभेद उभर आए और विवाह नहीं हो सका। इसके बाद युवती ने युवक पर दुष्कर्म का मामला दर्ज करा दिया।
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हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि दोनों ही शिक्षित और परिपक्व वयस्क थे और शुरू से ही संबंध सहमति से बने थे। यह भी सामने आया कि विवाह न होने का कारण केवल दोनों परिवारों के बीच उत्पन्न मतभेद थे। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि केवल विवाह का वादा पूरा न होने से दुष्कर्म का मामला नहीं बनता, जब तक यह साबित न हो कि आरोपी की नीयत शुरू से ही धोखाधड़ी करने की थी।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह मामला इस बात का उदाहरण है जब एक सहमति आधारित संबंध, अपेक्षा अनुसार विवाह में परिणत न होने पर आपसी रंजिश का शिकार बन गया और उसे आपराधिक रंग दे दिया गया। ऐसा दुरुपयोग न्यायालयों द्वारा बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इस आधार पर अदालत ने आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द कर दी।