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हाईकोर्ट सख्त, सुखना लेक बचाने को सैकड़ों लोगों ने दिए सुझाव
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 22 Oct 2016 12:48 AM IST
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सुखना लेक को लेकर पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट के निर्देश
- फोटो : फाइल फोटो
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सिटी ब्यूटीफुल की पहचान सुखना लेक का वजूद बचाने के लिए चंडीगढ़, मोहाली व पंचकूला के सैकड़ों जागरूक लोगों ने अपने सुझाव दिए हैं। यह जानकारी शुक्रवार को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में दी गई।
इस पर जस्टिस एके मित्तल और जस्टिस रामेंद्र जैन की खंडपीठ ने यूटी प्रशासन को आदेश जारी किए कि सभी सुझावों पर विचार करने के बाद मामले की अगली सुनवाई पर प्रशासन सुखना लेक बचाने की कोई ठोस योजना लेकर हाईकोर्ट के समक्ष पहुंचें और विस्तृत जानकारी दें कि सुखना लेक को कैसे बचाया जा सकता है?
हाईकोर्ट ने सुखना लेक की स्थिति पर चिंता जताते हुए इस मामले में स्वत: संज्ञान लेकर यूटी प्रशासन, पंजाब और हरियाणा को इस मामले पर प्रतिवादी बनाया हुआ है। इस मामले में हाईकोर्ट को सहयोग दे रहे एमिकस क्यूरी सीनियर एडवोकेट एमएल सरीन और एडवोकेट तनु बेदी ने हाईकोर्ट को बताया की उनके पास सैकड़ों सुझाव पहुंचे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि अधिकतर लोगों ने सुखना को डी-सिल्ट करने की बात कही है।
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इस पर खंडपीठ ने भी सहमति जताते हुए कहा की सुखना से गाद निकलना सबसे जरूरी है। क्योंकि गाद और जलीय वनस्पति ही सुखना लेक के लिए सबसे घातक है। सुखना को डी-सिल्ट किए बिना सुखना को नहीं बचाया जा सकता है। शक्रवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि पांच वर्षों से सुखना को बचाने के लिए कागजी कार्रवाई ही हुई है। किसी ने भी सुखना लेक को बचाने का
कोई ठोस प्रयास नहीं किया है। यही वजह है कि सुखना पर संकट बढ़ता जा रहा है और सुखना पहले जैसी खूबसूरत नहीं रही है। कोशिश होनी चाहिए कि सुखना के वजूद को बचाने के साथ-साथ इसे पहले से अधिक खूबसूरत बनाने का प्रयास हो।
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इस पर जस्टिस एके मित्तल और जस्टिस रामेंद्र जैन की खंडपीठ ने यूटी प्रशासन को आदेश जारी किए कि सभी सुझावों पर विचार करने के बाद मामले की अगली सुनवाई पर प्रशासन सुखना लेक बचाने की कोई ठोस योजना लेकर हाईकोर्ट के समक्ष पहुंचें और विस्तृत जानकारी दें कि सुखना लेक को कैसे बचाया जा सकता है?
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हाईकोर्ट ने सुखना लेक की स्थिति पर चिंता जताते हुए इस मामले में स्वत: संज्ञान लेकर यूटी प्रशासन, पंजाब और हरियाणा को इस मामले पर प्रतिवादी बनाया हुआ है। इस मामले में हाईकोर्ट को सहयोग दे रहे एमिकस क्यूरी सीनियर एडवोकेट एमएल सरीन और एडवोकेट तनु बेदी ने हाईकोर्ट को बताया की उनके पास सैकड़ों सुझाव पहुंचे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि अधिकतर लोगों ने सुखना को डी-सिल्ट करने की बात कही है।
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इस पर खंडपीठ ने भी सहमति जताते हुए कहा की सुखना से गाद निकलना सबसे जरूरी है। क्योंकि गाद और जलीय वनस्पति ही सुखना लेक के लिए सबसे घातक है। सुखना को डी-सिल्ट किए बिना सुखना को नहीं बचाया जा सकता है। शक्रवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि पांच वर्षों से सुखना को बचाने के लिए कागजी कार्रवाई ही हुई है। किसी ने भी सुखना लेक को बचाने का
कोई ठोस प्रयास नहीं किया है। यही वजह है कि सुखना पर संकट बढ़ता जा रहा है और सुखना पहले जैसी खूबसूरत नहीं रही है। कोशिश होनी चाहिए कि सुखना के वजूद को बचाने के साथ-साथ इसे पहले से अधिक खूबसूरत बनाने का प्रयास हो।
सुझावों में आम लोगों ने सुखना लेक में सिल्ट को गंभीर खतरा बताया
Sukhna Lake
- फोटो : अमर उजाला
सुनवाई के दौरान शुक्रवार को चंडीगढ़ प्रशासन को फिर हाईकोर्ट की फटकार झेलनी पड़ी जब एमिकस क्यूरी ने हाईकोर्ट को बताया कि हैदराबाद व बंगलूरू ने जिस तरह अपनी झीलों को बचाने के लिए अलग से एक कैनाल निकाली और झीलों में पानी की कमी को पूरा किया। उस अनुभव का चंडीगढ़ प्रशासन कोई लाभ नहीं ले रहा।
हाईकोर्ट को बताया कि चंडीगढ़ प्रशासन ने इस मामले में अध्ययन करना तो दूर, वहां के विशेषज्ञों से आजतक इस विषय कोई बात भी नहीं की। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि आम लोगों के सुझावों के साथ चंडीगढ़ प्रशासन इस तरह के मामलों के विशेषज्ञों से भी परामर्श करे। इसके लिए आईआईटी और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी के विशेषज्ञों से परामर्श लेना चाहिए।
भाप हो जाता है सुखना झील का पानी : एनआईएच रुड़की
मामले में पिछली सुनवाई पर हाईकोर्ट ने एनआईएच रुड़की को इस मामले में सहयोग करने के निर्देश दिए थे। खास बात यह भी है कि वर्ष 2014 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी (एनआईएच) ने सुखना लेक का दो वर्षों तक अध्ययन कर हाईकोर्ट को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि सुखना लेक का पानी इतना साफ है कि इस पानी को पीने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
रिपोर्ट में सुखना लेक में पानी की कमी का मुख्य कारण बरसात की कमी को बताया गया था। यह भी कहा गया कि सुखना लेक का 80 फीसदी पानी वाष्पीकरण के कारण उड़ जाता है। रिपोर्ट में, सुखना लेक में उगी जलीय वनस्पति को भी इसके वजूद के लिए घातक करार दिया गया था। हाईकोर्ट ने एक बार फिर से एनआईएच रुड़की से इस मामले में राय लेने के निर्देश चंडीगढ़ प्रशासन को दिए हैं।
हाईकोर्ट को बताया कि चंडीगढ़ प्रशासन ने इस मामले में अध्ययन करना तो दूर, वहां के विशेषज्ञों से आजतक इस विषय कोई बात भी नहीं की। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि आम लोगों के सुझावों के साथ चंडीगढ़ प्रशासन इस तरह के मामलों के विशेषज्ञों से भी परामर्श करे। इसके लिए आईआईटी और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी के विशेषज्ञों से परामर्श लेना चाहिए।
भाप हो जाता है सुखना झील का पानी : एनआईएच रुड़की
मामले में पिछली सुनवाई पर हाईकोर्ट ने एनआईएच रुड़की को इस मामले में सहयोग करने के निर्देश दिए थे। खास बात यह भी है कि वर्ष 2014 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी (एनआईएच) ने सुखना लेक का दो वर्षों तक अध्ययन कर हाईकोर्ट को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि सुखना लेक का पानी इतना साफ है कि इस पानी को पीने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
रिपोर्ट में सुखना लेक में पानी की कमी का मुख्य कारण बरसात की कमी को बताया गया था। यह भी कहा गया कि सुखना लेक का 80 फीसदी पानी वाष्पीकरण के कारण उड़ जाता है। रिपोर्ट में, सुखना लेक में उगी जलीय वनस्पति को भी इसके वजूद के लिए घातक करार दिया गया था। हाईकोर्ट ने एक बार फिर से एनआईएच रुड़की से इस मामले में राय लेने के निर्देश चंडीगढ़ प्रशासन को दिए हैं।