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Hindi News ›   Chandigarh ›   High Court said that unmarried women cannot be denied consideration for their request for abortion

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: अविवाहिता की गर्भपात की मांग पर विचार से नहीं कर सकते इनकार, कोर्ट ने सलाह भी दी

Sat, 16 Mar 2024 04:42 PM IST
निवेदिता वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Sat, 16 Mar 2024 04:42 PM IST
सार

हाईकोर्ट ने कहा कि जन्म पर बच्चे को बाल कल्याण समिति को सौंपा जा सकता है। संबंधित जिले की बाल कल्याण समिति महिला के बच्चे को जन्म देने के बाद अधिकारियों को सौंपने के संबंध में सभी आवश्यक दस्तावेज और औपचारिकताएं पूरी करेगी। सभी चरणों में मां की गोपनीयता बरकरार रखी जाएगी और अस्पताल में भर्ती होने और इलाज के दौरान याचिकाकर्ता की पहचान उजागर नहीं की जाएगी।

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High Court said that unmarried women cannot be denied consideration for their request for abortion
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट

विस्तार

गर्भपात की अनुमति को लेकर दाखिल याचिका पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अविवाहित महिलाएं जो यौन स्वायत्तता के अधिकार का प्रयोग करती हैं, उनकी गर्भ गिराने की मांग पर विचार से इनकार नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा कि यौन स्वायत्तता अधिकार है, लेकिन इसके साथ आने वाली जिम्मेदारियों का भी नागरिकों को ध्यान रखना चाहिए।
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पटियाला निवासी युवती ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए बताया कि वह एक युवक के साथ सहमति संबंध में रह रही थी और बाद में दोनों अलग हो गए। कुछ समय बाद उसे पता चला कि वह गर्भवती है और उसका गर्भ 26 सप्ताह का हो चुका है। हाईकोर्ट ने इस मामले में मेडिकल बोर्ड गठित करने का आदेश दिया था। मेडिकल बोर्ड ने पहले भ्रूण जीवित पैदा होने की संभावना और इस प्रकार गर्भावस्था को जारी रखने की सिफारिश की थी, लेकिन कोर्ट ने बोर्ड को दोबारा टर्मिनेशन आफ प्रेग्नेंसी की संभावना की फिर से जांच करने का निर्देश दिया।
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जस्टिस विनोद एस भारद्वाज ने कहा कि इससे याची को अपरिवर्तनीय मानसिक खतरा होगा, युवती सहमति से रिश्ते में थी और बाद में अलग हो गई। मेडिकल बोर्ड की राय है कि भ्रूण संभव जीवित पैदा होगा। इस प्रकार गर्भावस्था को जारी रखने की सिफारिश की गई। 
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मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी अधिनियम के अनुसार 20 से 24 सप्ताह के बाद केवल कुछ श्रेणियों की महिलाओं को गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति है। जस्टिस भारद्वाज ने कहा कि कोर्ट समय से पहले प्रसव की संभावना और उसके आदेश से बच्चे पर पड़ने वाले परिणामों से अनभिज्ञ नहीं रह सकता है। समानता को संतुलित करने और याचिकाकर्ता को कलंक और शर्मिंदगी से बचाने के लिए कोर्ट का दखल जरूरी है। ऐसे में कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि अगर गर्भपात संभव नहीं है तो सरकार की तरफ से याचिकाकर्ता को बिना किसी शुल्क सभी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं और यह सुनिश्चित किया जाए कि प्रसव सुरक्षित तरीके से हो।
 
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