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Highcourt: पत्नी का व्यभिचार साबित करने के लिए सोशल मीडिया की सामग्री हो सकती है आधार, गुजारा भत्ते से इनकार
Thu, 03 Oct 2024 11:03 AM IST
निवेदिता वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Thu, 03 Oct 2024 11:03 AM IST
सार
याची ने राजपुरा के फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। उसे पत्नी को तीन हजार रुपये अंतरिम गुजारा भत्ता व दस हजार रुपये का एकमुश्त मुकदमा खर्च देने का निर्देश दिया गया था। याची ने पत्नी को व्यभिचारी बताते हुए सोशल मीडिया की सामग्री पेश की थी।
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पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम आदेश जारी करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि पत्नी की ओर से शुरू की गई अंतरिम गुजारा भत्ता से जुड़ी कानूनी कार्यवाही का विरोध करने के लिए पति व्यभिचार की दलील दे सकता है। उस चरण में न्यायालय सोशल मीडिया से प्राप्त साक्ष्यों पर विचार कर सकता है। हाईकोर्ट ने पत्नी की तस्वीरों को देखने के बाद पत्नी को गुजारा भत्ता और मुकदमेबाजी खर्च से इन्कार कर दिया।
हाईकोर्ट ने याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि पत्नी के व्यभिचार को साबित करने के लिए पति की ओर से प्रस्तुत सोशल मीडिया आदि से संबंधित सामग्री पर न्यायालय अंतरिम भरण-पोषण के निर्णय के चरण में भी विचार किया जा सकता है। किसी भी ऐसी सामग्री पर विचार किया जा सकता है, जो मामले के प्रभावी ढंग से निर्णय के लिए आवश्यक हो। वर्तमान सामाजिक जीवन अब फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, एप पर व्यस्त है और सोशल नेटवर्क पर मौजूद सामग्री (फोटोग्राफ, टेक्स्ट के आदान-प्रदान) को साक्ष्य उद्देश्यों के लिए अच्छी तरह उपयोग में लिया जा सकता है।
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राजपुरा फैमिली कोर्ट के आदेश को दी थी चुनाैती
हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए पति ने पंजाब के राजपुरा के पारिवारिक न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे पत्नी को 3,000 रुपये प्रति माह का अंतरिम गुजारा भत्ता व 10,000 रुपये का एकमुश्त मुकदमा खर्च देने का निर्देश दिया था। याची ने आरोप लगाया कि पत्नी व्यभिचारी है और इसलिए वह सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अंतरिम भरण-पोषण की हकदार नहीं है।
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हाईकोर्ट ने याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि पत्नी के व्यभिचार को साबित करने के लिए पति की ओर से प्रस्तुत सोशल मीडिया आदि से संबंधित सामग्री पर न्यायालय अंतरिम भरण-पोषण के निर्णय के चरण में भी विचार किया जा सकता है। किसी भी ऐसी सामग्री पर विचार किया जा सकता है, जो मामले के प्रभावी ढंग से निर्णय के लिए आवश्यक हो। वर्तमान सामाजिक जीवन अब फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, एप पर व्यस्त है और सोशल नेटवर्क पर मौजूद सामग्री (फोटोग्राफ, टेक्स्ट के आदान-प्रदान) को साक्ष्य उद्देश्यों के लिए अच्छी तरह उपयोग में लिया जा सकता है।
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