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हरियाणा मांगे हक: पंजाब से अलग होने के 58 साल बाद भी नहीं मिले ये अधिकार, सभी ने लिया सिर्फ राजनीतिक फायदा

Wed, 24 Apr 2024 03:00 PM IST
शाहरुख खान आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: शाहरुख खान Updated Wed, 24 Apr 2024 03:00 PM IST
सार

हरियाणा को 58 साल बाद भी हक नहीं मिला है। हरियाणा को अभी तक हाईकोर्ट नहीं मिला है, न ही अलग विधानसभा मिली है।

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Haryana News 58 Years After Separation From Punjab Rights Remain Unfulfilled Details in Hindi
Haryana News - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पंजाब से अलग होने के 58 साल बाद भी हरियाणा को अपना हक नहीं मिल सका। न तो अपना हाईकोर्ट मिला और न ही विधानसभा। करीब छह दशकों के बाद भी रावी-ब्यास से पानी लाने का मुद्दा भी जस का तस बना हुआ है। पंजाब यूनिवर्सिटी से हरियाणा के कॉलेज संबद्ध का मुद्दा भी चुनाव से पहले हवा हो गया है। 
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हाईकोर्ट को लेकर तो कई बार आंदोलन हुए। चुनाव से पहले पूर्व आईएएस व वकीलों ने इसका मुद्दा भी उठाया, लेकिन लोकसभा और राज्यसभा के 15 सांसद और प्रदेश के 90 विधायक होने के बावजूद हरियाणा पंजाब से अपना हक नहीं ले पाया है। 
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हरियाणा के हक को लेकर अभी तक सभी दलों ने कागजी कार्यवाही कर राजनीतिक फायदा लेने का ही प्रयास किया है। विपक्ष इस मुद्दे को लेकर हमलावर है। उसका कहना है कि भाजपा की सरकार सिर्फ नारे देने और लोगों के वोट लेने तक गंभीर है। 
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लोगों के हक के लिए सरकार को दिन रात एक कर देना चाहिए, मगर राज्य सरकार ने केवल कागजी कार्यवाही ही की। वहीं, हरियाणा सरकार का दावा है कि कॉलेज की संबद्धता का मुद्दा हो या एसवाईएल का। इस सरकार ने जितनी मजबूती से लड़ाई लड़ी, शायद ही इससे पहले किसी सरकार ने प्रयास किए होंगे। 

मजबूत पैरवी की वजह से ही एसवाईएल पर सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के पक्ष में फैसला सुनाया। कॉलेज के संबद्धता के मुद्दे पर भी भाजपा सरकार ने ही पहल की, जबकि कांग्रेस सरकार ने संबद्धता वापस ले ली थी। यदि पूर्व सरकार ने हरियाणा के हित में फैसला लिया होता तो राज्य के कॉलेज आज पीयू से संबद्ध होते।

विधानसभा : लंबी लड़ाई के बाद अलग से जमीन मिली पर वह भी सरंक्षित एरिया में
1966 में हरियाणा बनने के बाद दोनों राज्यों में 60-40 का अनुपात तय हुआ था। मगर हरियाणा को विधानसभा में अपने हिस्से का 40% नहीं मिल पाया है। शुरुआत में हरियाणा को विधानसभा के भवन में 37% हिस्सा अलॉट हुआ था, मगर बाद में पंजाब ने सिर्फ 27% दिया। हरियाणा के हिस्से के 20 कमरे अब भी पंजाब के पास हैं। विधानसभा के स्पीकर ज्ञान चंद गुप्ता ने इस मुद्दे को पंजाब के तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष और केंद्र सरकार के समक्ष उठाया। जब पंजाब ने उनकी मांग को अनसुना कर किया तो हरियाणा ने चंडीगढ़ में ही अलग से विधानसभा बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी। चंडीगढ़ प्रशासन ने जमीन तो उपलब्ध करवा दी, लेकिन इसके बदले में हरियाणा सरकार ने जो जमीन देने का प्रस्ताव दिया था, वह सरंक्षित एरिया में आ गई है, इसलिए मामला आगे नहीं बढ़ पाया है।

एसवाईएल : पंजाब का अड़ियल रवैया
केंद्र सरकार के समझौते के तहत ब्यास व रावी में बहने वाले 4.22 मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ) पानी पंजाब को, 3.5 एमएएफ हरियाणा और 8.6 एमएएफ पानी राजस्थान को देना तय हुआ। हरियाणा के अपने हिस्से को पानी लाने के लिए 211 किमी लंबी नहर बनाने का एक प्रस्ताव दिया गया, जिसमें 90 किमी हिस्सा हरियाणा में बनना था और 121 किलोमीटर पंजाब में। एसवाईएल को लेकर सुप्रीम कोर्ट दो बार हरियाणा के हक में फैसला दे चुका है। इसके बावजूद पंजाब अपने हिस्से में नहर का निर्माण नहीं कर रहा है। यहां तक सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच तीन बैठकें हो चुकी हैं, मगर सहमति नहीं बनी। पंजाब का कहना है कि उसके बाद पानी बंटवारे को लेकर एक बूंद पानी नहीं है।

हाईकोर्ट : कांग्रेस व भाजपा दोनों ने प्रयास किए, आंदोलन हुए...हर बार हवा हुआ मुद्दाअलग हाईकोर्ट के लिए कई बार आंदोलन हुए। पूर्व सीएम मनोहर लाल और पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी प्रयास किए, मगर प्रयास नाकाफी ही साबित हुए। पूर्व सीएम मनोहर लाल ने 2018 में केंद्रीय कानून मंत्री को पत्र लिखकर अलग हाईकोर्ट की मांग उठाई थी। उन्होंने दलील दी कि पंजाब-हरियाणा की विधानसभा एक ही बिल्डिंग में है, मगर दोनों राज्यों की विधानसभाएं अलग संचालित होती हैं। इसी तरह से हाईकोर्ट भी अलग-अलग होना चाहिए। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में करीब छह लाख केस लंबित हैं। इनमें से 40 फीसदी केस हरियाणा से संबंधित हैं। 14 लाख मामले हरियाणा की जिला अदालतों में लंबित चल रहे हैं। इस मुद्दे पर कुछ दिन तो बयानबाजी होती रही। मीडिया में सुर्खियां भी बनीं पर बाद में यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया।

पंजाब यूनिवर्सिटी : 42 साल बाद उठी मांग
हरियाणा सरकार ने 2018 में केंद्रीय गृह मंत्री को पत्र लिखकर पंजाब विश्वविद्यालय में हिस्सा मांगा था। हरियाणा की मांग है कि वह विश्वविद्यालय को अनुदान देने के लिए तैयार है, मगर बदले में पंचकूला, अंबाला और यमुनानगर के कॉलेजों को पीयू से संबद्ध किए जाए। हालांकि 1976 तक हरियाणा पीयू में हिस्सेदारी रखता था। हरियाणा का रोहतक इसका क्षेत्रीय केंद्र हुआ करता था। मगर तत्कालीन हरियाणा के तत्कालीन सीएम बंसीलाल ने हरियाणा के काॅलेजों की संबद्धता खत्म कर दी थी और अनुदान देना भी बंद कर दिया। 42 साल बाद भाजपा सरकार ने इसकी फिर से मांग उठाई। दस अगस्त 2022 को हरियाणा विधानसभा में पीयू में हिस्सेदारी को लेकर सर्वसम्मति से प्रस्ताव भी पारित किया गया।

एक्सपर्ट व्यू
हरियाणा के बाद से जितने राज्य बने हैं, उन राज्यों का अलग हाईकोर्ट और अलग विधानसभा बनी हुई है। राजनीतिक दलों के पास इच्छाशक्ति की कमी है। यह मुद्दे सिर्फ दिखावों के लिए उठाए जाते हैं। इनेलो अकाली दल के साथ मिली हुई है और आम आदमी पार्टी का कोई स्टैंड नहीं है। ऐसे मुद्दों पर राजनीतिक दलों को राजनीति से ऊपर उठकर हरियाणा के हित के बारे में सोचना चाहिए। केंद्र सरकार भी इन मुद्दों को लेकर गंभीर नहीं है। मैं 2008 से पंचकूला और यमुनानगर के कॉलेजों का मुद्दा उठाता आ रहा हूं। जब कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी नहीं थी तो यहां के कॉलेज पंजाब यूनिवर्सिटी से जुड़े थे। -विजय बंसल, एडवोकेट व प्रदेश अध्यक्ष शिवालिक विकास मंच।

इस सरकार ने गंभीरता से प्रयास नहीं किए हैं। यदि कोशिश की होती तो उसका परिणाम भी सामने आता। सुप्रीम कोर्ट ने एसवाईएल पर 2016 में हरियाणा के हक में फैसला दे दिया था, फिर भी हम पानी नहीं ला पाए। हाईकोर्ट में हरियाणा के लोगों को कितनी परेशानियां झेलनी पड़ती है। -रघुबीर कादियान, विधायक व पूर्व स्पीकर हरियाणा

एसवाईएल को लेकर जितना प्रयास भाजपा ने किया है, उतना किसी दल ने नहीं किया है। जहां तक पीयू से कालेजों की संबद्धता का मामला है, इस मुद्दे को गृह मंत्री की बैठक में भी रखा गया था। -ज्ञानचंद गुप्ता, विस स्पीकर

दिल्ली स्थित इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी पहले हरियाणा के एनसीआर के जिले में स्थित सभी कॉलेजों को संबद्धता देती थी, मगर अब उसके रास्ते बंद कर दिए गए हैं। सेंट्रल यूनिवर्सिटी की ओर कॉलेजों को दी जाने वाली संबद्धता पर रोक लगा दी गई है। पहले यह तो शुरू करें। चंडीगढ़ में दोनों राज्यों का अधिकार होना चाहिए। पंजाब-हरियाणा की अलग-अलग राजधानी बने और इसका पैसा केंद्र सरकार दे। -सुशील गुप्ता, आप प्रदेश अध्यक्ष व कुरुक्षेत्र से उम्मीदवार
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