हरियाणा : मारकंडा और सरस्वती नदी को जोड़ेगा कैनथल आपूर्ति चैनल, आदिबद्री में होगा बांध का निर्माण
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हरियाणा सरकार ने सरस्वती नदी के पुनरुद्धार की परियोजना को मंजूरी दे दी है। इसके तहत आदि बद्री में सरस्वती बांध, सरस्वती बैराज और सरस्वती जलाशय का निर्माण किया जाएगा। कैनथल सप्लाई चैनल मारकंडा नदी और सरस्वती नदी को आपस मे जोड़ेगा।
इस परियोजना के पूरा होने पर लगभग 894 हेक्टेयर मीटर बाढ़ का पानी सरस्वती जलाशय में मोड़ा जा सकेगा। केंद्रीय जल आयोग डैम की डिजाइनिंग का काम कर रहा है। आदिबद्री में 800 करोड़ की लागत से सरकार बैराज और सरस्वती सरोवर का निर्माण करेगी।
मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने ये जानकारी यमुनानगर के आदिबद्री में चल रहे अंतरराष्ट्रीय सरस्वती महोत्सव-2021 में आयोजित वेबिनार में दी। मुख्यमंत्री सरस्वती नदी नए परिप्रेक्ष्य और विरासत विकास विषय पर वेबिनार से जुड़े। विद्या भारती संस्कृति संस्थान और हरियाणा सरस्वती हैरिटेज विकास बोर्ड ने वेबिनार का आयोजन किया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि महाभारत के अनुसार सरस्वती हरियाणा में यमुनानगर से थोड़ा ऊपर और शिवालिक पहाड़ियों से थोड़ा-सा नीचे आदिबद्री नामक स्थान से निकलती थी। आज भी लोग इस स्थान को तीर्थस्थल मानते हैं। वैदिक और महाभारत कालीन वर्णन के अनुसार इसी नदी के किनारे ब्रह्मावर्त था, कुरुक्षेत्र था लेकिन आज वहां जलाशय हैं।
वर्तमान में इसरो, जीएसआई, एसओआई, एएसआई, ओएनजीसी, एनआईएच रुड़की, बीएआरसी, सरस्वती नाड़ी शोध संस्थान जैसे 70 से अधिक संगठन सरस्वती नदी विरासत के अनुसंधान कार्य में लगे हैं। अनुसंधान, दस्तावेजों, रिपोर्ट, और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर यह साबित हो गया है कि सरस्वती नदी का प्रवाह भूगर्भ में अब भी आदिबद्री से निकलकर गुजरात के कच्छ तक चल रहा है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि अभी तक हड़प्पा सभ्यता को सिर्फ सिंधु नदी की देन माना जा रहा था लेकिन शोध से सिद्ध हो गया है कि सरस्वती का इस सभ्यता में बहुत बड़ा योगदान है। यदि हड़प्पा सभ्यता की 2600 बस्तियों को देखें तो पाते हैं कि वर्तमान पाकिस्तान में सिंधु तट पर मात्र 265 बस्तियां थीं, जबकि शेष अधिकांश बस्तियां सरस्वती नदी के तट पर मिलती हैं।
उन्होंने सरस्वती नदी की खोज से जुड़े कार्यों में हुई प्रगति का श्रेय काफी हद तक स्वर्गीय दर्शन लाल जैन को दिया। उन्होंने कहा कि वे आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके विचार आज भी हमारे साथ हैं। सरस्वती नदी के अस्तित्व को लेकर जो शंकाएं थीं, उन सबका समाधान हो चुका है। इसके प्रवाह के वैज्ञानिक प्रमाण मिल चुके हैं।
सरस्वती की उत्पत्ति, विलुप्त होने का पता लगाना जरूरी
सिंधु सभ्यता के उत्थान और पतन को समझने के लिए भी सरस्वती नदी की उत्पत्ति व विलुप्ति का पता लगाना अति आवश्यक है। सरस्वती पर शोध व अन्य कार्यों के लिए सरकार वर्ष 2015 में ‘सरस्वती हैरिटेज विकास बोर्ड’ की स्थापना कर चुकी है। भारतीय सर्वेक्षण विभाग के पुराने मानचित्रों के अनुसार सरस्वती नदी योजना को अंतिम रूप दिया गया है।
दुनिया की सबसे पुरानी सरस्वती नदी सभ्यता आएगी सामने
मनोहर लाल ने कहा कि सरस्वती नदी का पुनरुद्धार प्राचीन सरस्वती विरासत को पुनर्जीवित करेगा। इससे सबसे पुरानी सरस्वती नदी सभ्यता दुनिया के सामने आएगी। सरस्वती नदी में गिरने वाले सभी 23 छोटे चैनलों व नालों को सरस्वती नदी का नाम दिया गया है।
सरस्वती नदी में जल के बारहमासी प्रवाह से भूजल स्तर का पुनर्भरण होगा, क्योंकि हरियाणा का अधिकांश क्षेत्र डार्क जोन में बदल गया है। सरस्वती नदी के साथ सोम और घग्गर को परस्पर जोड़ने का कार्य चल रहा है। इससे बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई में सुधार व भूजल रिचार्जिंग का लाभ मिलेगा।
इससे ये लाभ भी होंगे
- आदिबद्री से सिरसा तक कुरुक्षेत्र, पिहोवा, हिसार, राखीगढ़ी, फतेहाबाद और सिरसा में राष्ट्रीय स्तर के पर्यटन सर्किट के विकास से तीर्थाटन के नए अवसर सृजित होंगे।
- रोजगार और व्यापार बढ़ेगा, सरस्वती नदी के साथ रिवर फ्रंट डेवलपमेंट से मूलभूत सुविधाओं में सुधार होगा।
- सरस्वती नदी के तट पर सामाजिक वानिकी से पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी।