क्या मोदी, शाह हरियाणा में खिला पाएंगे कमल?
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के नए अध्यक्ष अमित शाह की पहली अग्नि परीक्षा हरियाणा के चुनावी दंगल में होने जा रही है। दिल्ली में शनिवार को शाह की भाजपा अध्यक्ष के तौर पर विधिवत ताजपोशी हो चुकी है और अब उनके सामने पहला लक्ष्य हरियाणा में कमल खिलाना है।
हरियाणा में कांग्रेस, इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के साथ ही अब भाजपा भी बड़ी ताकत बनकर मैदान में है, जबकि गैर जाट जातियों को लामबंद करने में जुटे कुलदीप बिश्नोई की हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) भी दमदार तरीके से ताल ठोकने जा रही है। इससे इस बार चुनावी दंगल में चौकोना मुकाबला होना तय है।
पिछले चुनाव में थी कांग्रेस-इनेलो की सीधी टक्कर
पिछले चुनाव में कांग्रेस और इनेलो के बीच सीधी टक्कर थी। हाल के लोकसभा चुनाव में प्रदेश की 10 में से सात सीटें जीतने वाली भाजपा इस चुनाव में भी दमदार मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश करेगी।
एक दशक से सत्तारूढ़ कांग्रेस के सामने एंटी इंक्मबैंसी फैक्टर से निपटना बड़ी चुनौती है। इनेलो की मुश्किल यह है कि उसके प्रुमख ओम प्रकाश चौटाला विभिन्न अदालती मामलों से जूझ रहे हैं।
प्रदेश भाजपा के नेता भी मानते हैं कि लोकसभा चुनाव में पार्टी को नरेंद्र मोदी की लहर का लाभ मिला था, जबकि विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दे हावी रहेंगे।
बीजेपी ने पेश नहीं किया मुख्यमंत्री पद का दावेदार
भाजपा मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर अभी तक कोई चेहरा पेश नहीं कर पाई है। इसीलिए मोदी और शाह की जोड़ी की असली परीक्षा हरियाणा में होगी।
मोदी के पीएम बनने और अब शाह के भाजपा की कमान थामने के बाद हरियाणा विधानसभा पहला बड़ा चुनाव है। वैसे तो केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद उत्तराखंड विधानसभा के उपचुनाव में भाजपा को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है, लेकिन विधानसभा स्तर का यह पहला चुनाव है।
इस लोकसभा चुनाव से पहले तक भाजपा हरियाणा की राजनीति में मामूली उपस्थित दर्ज कर पाती रही है। हालांकि, 1967 में अलग राज्य बनने पर विधानसभा की कुल 81 सीटों में से भारतीय जनसंघ के 12 विधायक थे और कांग्रेस के बाद वही दूसरी बड़ी पार्टी थी।
ऐसा रहा हरियाणा में बीजेपी की सत्ता का गणित
हरियाणा के अलग राज्य बनने पर प्रदेश में भारतीय जनसंघ ही प्रमुख विपक्षी दल था और तब उसके खाते में 14.39 फीसदी वोट थे, लेकिन उसके बाद पार्टी का जनाधार घटता चला गया।
हालांकि, 1977 में जनता पार्टी में विलय के बाद भाजपा को सत्ता सुख मिला। इसके बाद 1987 में भाजपा को 16 सीटें मिलीं, लेकिन वोट का आंकड़ा 10.08 फीसदी तक सीमित रहा। 1996 में भाजपा 11 सीटें जीतने में सफल रही, लेकिन वोट 8.88 फीसदी तक सिमट गए।
2009 में तो पार्टी को मात्र 9.05 फीसदी मत मिले और सीटें मात्र चार तक रह गईं। 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी सात सीटें जीतने के साथ 34.70 फीसदी वोट पाने में कामयाब हो गई।