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ये सियासत के ऐसे संकटमोचक, जो बना दें सरकार

Fri, 22 Aug 2014 09:40 AM IST
विजय गुप्ता/अमर उजाला, चंडीगढ़
विजय गुप्ता/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Fri, 22 Aug 2014 09:40 AM IST
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Haryana Assembly Election 2014

आयाराम-गयाराम की राजनीति के लिए मशहूर हरियाणा विधानसभा में निर्दलीय विधायक शुरू से ही सियासत के संकटमोचक की भूमिका निभाते रहे हैं। कई बार सरकार बनाने और गिराने में आजाद विधायकों की महती भूमिका रही है।

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हरियाणा राज्य के गठन के बाद पहले मुख्यमंत्री पंडित भगवत दयाल शर्मा की सरकार गिराने के बाद राव बीरेंद्र सिंह की ताजपोशी में निर्दलीय उम्मीदवारों की निर्णायक भूमिका रही। बीते विधानसभा चुनाव में निर्दलीय विधायकों के समर्थन से ही भूपेंद्र सिंह हुड्डा दूसरी बार मुख्यमंत्री का ताज पहन पाए।
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कई बार बने किंगमेकर
अतीत में सरकार बनाने और बिगाड़ने में निर्दलीय विधायक कई बार निर्णायक रह चुके हैं। 2009 में कांग्रेस जब बहुमत के संख्या बल से 6 सीटें कम रहीं तो निर्दलीय विधायक ही संकटमोचक के तौर पर सामने आए।
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उस समय सात निर्दलीय विधायक चुन कर आए थे। इन सभी निर्दलीय विधायकों ने हुड्डा सरकार को समर्थन दिया। हालांकि बाद में कांग्रेस ने हजकां में सेंध लगाकर उसके विधायकों को भी अपने पाले में मिला लिया था। हजकां को छह सीटें मिली थीं।

दो बार आजाद विधायक पहुंचे विधानसभा

Haryana Assembly Election 2014

प्रदेश में वर्ष 1967 और 1982 के चुनाव में दोनों ही बार 16-16 निर्दलीय विधायक विधानसभा पहुंचने में कामयाब रहे। 1982 में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाया था। कांग्रेस को 36 और लोकदल को 31 सीटें मिली थीं। सभी 16 निर्दलीय विधायकों की वैशाखी पर ही कांग्रेस ने सरकार बनाई थी।

वहीं, 1967 में पंजाब से अलग होने के बाद गठित नए प्रदेश हरियाणा की विधानसभा में मौजूद 16 निर्दलीय विधायकों ने कांग्रेस के 12 विधायकों के साथ मिलकर मुख्यमंत्री भगवत दयाल शर्मा का तख्ता पलट दिया था। इसके बाद निर्दलियों के समर्थन से राव बीरेंद्र सिंह ने प्रदेश की कमान संभाली।

हालांकि राव सरकार मात्र एक साल में गिर गई। 1968 के विधानसभा चुनाव मैदान 161 निर्दलीय उम्मीदवारों में से 6 विधानसभा पहुंचने में कामयाब रहे। लेकिन तब सत्ता में आई कांग्रेस को निर्दलीय विधायकों की जरूरत नहीं पड़ी। उसे सदन की कुल 81 में से 48 सीटें मिल गई थीं।

ऐसा कम ही हुआ है जब विधानसभा में निर्दलीय विधायकों की कोई पूछ नहीं हुई। 1977, 1987, 1991 और 1996 में निर्दलीय विधायकों की किसी भी दल को जरूरत नहीं पड़ी।

निर्दलीय विधायकों में पिता-पुत्र भी

Haryana Assembly Election 2014

हसनपुर सुरक्षित सीट से गया लाल और उनके बेटे उदयभान निर्दलीय विधायक रह चुके हैं। गया लाल वही हैं जो आयाराम-गयाराम राजनीति के लिए मशहूर हैं। गयालाल 1967 और उदयभान 2000 में हसनपुर से निर्दलीय विधायक चुने गए थे।

खूब वोट बटोरते रहे हैं निर्दलीय
विधानसभा चुनाव में निर्दलीय 13 से 32 फीसदी तक वोट लेते रहे हैं। 1967 में निर्दलीय विधायकों के खाते में 32.97 फीसदी वोट आए थे। हालांकि 2009 में यह आंकड़ा गिरकर 15.96 तक आ पहुंचा। सबसे कम वोट 2005 में मिले। फिर भी यह आंकड़ा 13.70 फीसदी था।

लंबी-चौड़ी फौज ताल ठोंकती रही है मैदान में

Haryana Assembly Election 2014

विधानसभा की चुनावी जंग में 1996 में सबसे ज्यादा निर्दलीय उम्मीदवारों ने ताल ठोंकी थी। तब 2022 निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में थे। हालांकि इनमें से 2001 की जमानत जब्त हो गयी थी। फिर भी 10 निर्दलीय विधानसभा तक पहुंचने में कामयाब रहे। सबसे कम 161 निर्दलीय उम्मीदवार 1968 में मैदान में थे। इनमें से 6 विधानसभा पहुंचे, जबकि 129 की जमानत जब्त हुई।

कांग्रेस में शामिल होकर मंत्री बनी
बल्लभगढ़ विधानसभा क्षेत्र से 1982 के विधानसभा चुनाव में शारदा रानी कांग्रेस (जे) के टिकट पर चुनाव जीती थीं। कांग्रेस (जे) वरिष्ठ नेता जगजीवन राम की पार्टी थी। शारदा रानी को तकनीकी कारणों से विधानसभा में निर्दलीय विधायक का ही दर्जा मिल पाया। बाद में वे कांग्रेस में शामिल हो गई और उन्हें शिक्षा मंत्री बनाया गया।

उम्र के 84 वें बसंत में बने निर्दलीय विधायक
फरीदाबाद से शिवचरण लाल शर्मा 84 साल की उम्र में बतौर निर्दलीय विधायक विधानसभा पहुंचे और बाद में श्रम राज्यमंत्री भी बने। वे फरीदाबाद नगर निगम के दो बार वरिष्ठ उप महापौर भी रहे।

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