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Haryana: पहली बार सत्र नहीं बुलाए जाने पर हरियाणा विधानसभा भंग, अधिसूचना जारी, अब नायब सैनी कार्यवाहक सीएम
Fri, 13 Sep 2024 10:04 AM IST
निवेदिता वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Fri, 13 Sep 2024 10:04 AM IST
सार
यह पहली बार है, जब सत्र नहीं बुलाए जाने पर विधानसभा भंग की गई है। इससे पहले भी हरियाणा में तीन बार विधानसभा समय से पहले भंग की गई मगर तीनों में कारण समय से पहले चुनाव करवाना था।
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हरियाणा के सीएम नायब सैनी
- फोटो : X @cmohry
विस्तार
हरियाणा सरकार की सिफारिश के बाद राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने विधानसभा को भंग कर दिया है। विधानसभा सचिवालय की ओर से इस बारे में अधिसूचना भी जारी कर दी गई। अब सीएम नायब सिंह सैनी अगली सरकार के गठन होने तक कार्यवाहक सीएम के तौर पर काम करेंगे। वे कोई नीतिगत फैसले नहीं ले पाएंगे। मगर आपातकालीन स्थिति आने पर वह फैसले लेने के लिए अधिकृत होंगे।
सैनी सरकार का कार्यकाल तीन नवंबर तक था। मगर नई सरकार का गठन आठ अक्तूबर के बाद होना है। इस लिहाज से करीब एक महीने पहले विधानसभा भंग की गई है। समय से पहले विधानसभा भंग करने के लिए सैनी सरकार ही जिम्मेदार है। दरअसल विधानसभा का सत्र नहीं बुलाए जाने की वजह से सैनी सरकार संवैधानिक संकट में फंस गई थी। भारत के संविधान के अनुच्छेद 174 के मुताबिक दो सत्रों के बीच छह महीने से ज्यादा का अंतर नहीं होना चाहिए।
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नायब सिंह सैनी की सरकार ने 13 मार्च को आखिरी बार विधानसभा का सत्र बुलाया था। इसके बाद 12 सितंबर तक सत्र बुलाया जाना जरूरी था, मगर सरकार सत्र बुलाने में असफल रही। ऐसे में सरकार के पास विधानसभा भंग करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। यदि सरकार विधानसभा भी भंग नहीं करवा पाती तो सैनी सरकार की
वैधता पर सवाल उठने लगते। सरकार को आलोचना भी झेलनी पड़ती और सरकार को बर्खास्त करने की मांग की जा सकती थी।
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सैनी सरकार का कार्यकाल तीन नवंबर तक था। मगर नई सरकार का गठन आठ अक्तूबर के बाद होना है। इस लिहाज से करीब एक महीने पहले विधानसभा भंग की गई है। समय से पहले विधानसभा भंग करने के लिए सैनी सरकार ही जिम्मेदार है। दरअसल विधानसभा का सत्र नहीं बुलाए जाने की वजह से सैनी सरकार संवैधानिक संकट में फंस गई थी। भारत के संविधान के अनुच्छेद 174 के मुताबिक दो सत्रों के बीच छह महीने से ज्यादा का अंतर नहीं होना चाहिए।
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नायब सिंह सैनी की सरकार ने 13 मार्च को आखिरी बार विधानसभा का सत्र बुलाया था। इसके बाद 12 सितंबर तक सत्र बुलाया जाना जरूरी था, मगर सरकार सत्र बुलाने में असफल रही। ऐसे में सरकार के पास विधानसभा भंग करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। यदि सरकार विधानसभा भी भंग नहीं करवा पाती तो सैनी सरकार की
वैधता पर सवाल उठने लगते। सरकार को आलोचना भी झेलनी पड़ती और सरकार को बर्खास्त करने की मांग की जा सकती थी।