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पत्नी के वियोग में पुलिसवाला बना ‘मुक्तिदाता’

Sat, 28 Jun 2014 01:14 PM IST
राजेश ढल्ल/अमर उजाला, चंडीगढ़
राजेश ढल्ल/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Sat, 28 Jun 2014 01:14 PM IST
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God Father of Bone Immersion of Heirless Dead Bodies

पुलिस में तैनात एएसआई श्याम लाल शर्मा एक ऐसा नाम है, जिन्हें मुक्तिदाता कहें तो गलत नहीं होगा। जी हां वह अभी तक 23 हजारों मृतकों की अस्थियां संस्कार के बाद हरिद्वार में ले जाकर गंगा में विसर्जित कर चुके हैं।

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वह अभी भी इस कार्य में पूरे मनोयोग से जुटे हुए हैं। पंचकूला, मोहाली, पानीपत और शिमला तक से अस्थियां चुनने जाते हैं। माह में एक बार वह अपनी निजी गाड़ी में अस्थियों (फूल) को विसर्जन के लिए लेकर जाते हैं।
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उनका कहना है कि कई सालों तक वह अपने खर्चे से ही यह सेवा करते थे, लेकिन अब करीब 5 साल से उन्हें कई ऐसे दानी मिल गए हैं जो उनके खर्चे के अधिकतर हिस्से को उठाने के लिए तैयार हो जाते हैं।

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क्यों आए इस सेवा में

God Father of Bone Immersion of Heirless Dead Bodies

1995 में बेटे को जन्म के समय श्याम लाल की पत्नी की मौत हो गई थी। पत्नी के शव का संस्कार करने के बाद भी वह कई दिन तक पत्नी की याद में श्मशान घाट जाते रहे।

उन्होंने देखा कि कई शवों की अस्थियां ऐसी ही पड़ी रहती थीं, जिनको कोई भी लेकर जाने के लिए तैयार नहीं था। ऐसे में उनके मन में अस्थियों को विसर्जन करने का मन बनाया। इसके बाद से वह इस काम में लगातार जुटे हुए हैं। श्याम लाल के एक बेटा और बेटी है।

बस में अस्थियों का लेते हैं टिकट

God Father of Bone Immersion of Heirless Dead Bodies

श्याम लाल को इस काम को करने में कई बार आर्थिक बाधा आई, लेकिन उनकी यह तपस्या निरंतर जारी रही। वह बताते हैं वर्ष 2005 में हरिद्वार में अस्थियों के विसर्जन और रीति रिवाज को पूरा करने के लिए सोने की अंगूठी भी बेचनी पड़ गई थी। शर्मा का कहना है कि पहले वह बस से अस्थियों को लेकर जाते थे।

उस समय भी वह हर अस्थी की टिकट लेते थे। जैसे की एक 10 शवों की अस्थियां ले जाते थे तो वह दस टिकट भी खरीदते थे। इसके बाद उन्होंने अपनी गाड़ी ले ली। अब वह गाड़ी से अस्थियां ले जाते हैं। बीए प्रथम में पढ़ने वाला उनका बेटा भी अब कभी-कभार उनका सहयोग करता है।

हरिद्वार में एक बार अस्थियों को ले जाने का खर्चा 12 से 20 हजार रुपये आ जाता है। इसके अलावा वह लावारिस शवों के अलावा गरीब व ऐसे लोगों के शवों की अस्थियां ले जाते हैं, जिनके परिवार वाले हरिद्वार में उनका विसर्जन नहीं कर सकते हैं।

पुण्य काम में लगे श्याम लाल के अब हरिद्वार में कई पंडितों से अच्छी जान पहचान हो गई। वह उनके काम को पूरे विधि विधान से समाप्त कराते हैं।

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