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Chandigarh News: ड्रम-नगाड़ों से डिजिटल इफेक्ट तक... बदल गई रामलीला

Mon, 05 Oct 2026 02:30 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Mon, 05 Oct 2026 02:30 AM IST
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From drums and *nagadas* to digital effects... Ramlila has transformed.
- छह दशक में रामलीला के मंचन में आए कई बदलाव : अब बड़े मंच, आकर्षक पोशाक, आधुनिक लाइटिंग व सोफों की व्यवस्था
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नीरज कुमार
चंडीगढ़। छह दशक पहले चंडीगढ़ में रामलीला का मंचन सीमित संसाधनों के बीच होता था। मैदान में तख्त जोड़कर मंच तैयार किया जाता, ऊपर कपड़े का पर्दा लगाया जाता और दोनों ओर ड्रम या नगाड़े रख दिए जाते थे। जैसे ही ड्रम बजता, आसपास के घरों से लोग रामलीला देखने के लिए मैदान की ओर चल पड़ते। न बड़ी रोशनी होती थी न विशाल मंच और न ही आधुनिक ध्वनि व्यवस्था, फिर भी दर्शकों का उत्साह देखते ही बनता था। समय के साथ रामलीला के मंचन का अंदाज बदल गया है। अब बड़े मंच, आकर्षक पोशाक, आधुनिक लाइटिंग, एलईडी स्क्रीन और दर्शकों के लिए कुर्सियों व सोफों की व्यवस्था की जाती है। रामलीला कमेटियों के पदाधिकारियों के अनुसार तकनीक और सुविधाओं के साथ आयोजन का खर्च भी बढ़ा है।
बढ़ा खर्च, बढ़ीं व्यवस्थाएं
पहले सीमित संसाधनों में रामलीला का आयोजन हो जाता था लेकिन अब मंच, लाइट, ध्वनि, एलईडी, पोशाक, रूप सज्जा, कलाकारों की सुविधाओं और सुरक्षा व्यवस्था पर काफी खर्च होता है। कुछ समितियां आधुनिक तकनीक से प्रस्तुति को नया रूप दे रही हैं जबकि कुछ पारंपरिक शैली को बचाए हुए हैं। दर्शकों के लिए बैठने की बेहतर व्यवस्था भी अब आयोजन का अहम हिस्सा बन गई है। -भूपेंद्र शर्मा, अध्यक्ष, चंडीगढ़ केंद्रीय रामलीला महासभा
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पहले आवाज बुलंद रखनी पड़ती थी
1960 और 1970 के दशक में कलाकारों की सबसे बड़ी ताकत उनका अभिनय और संवाद अदायगी होती थी। उन्हें अपनी आवाज इतनी बुलंद रखनी पड़ती थी कि मैदान में दूर बैठे दर्शक भी संवाद सुन सकें। मंच के पीछे लगा कपड़े का पर्दा ही ग्रीन रूम का काम करता था। पोशाक और मुकुट कई बार स्थानीय स्तर पर तैयार किए जाते थे। मंच सज्जा भी सीमित थी। एक दृश्य खत्म होने के बाद सामान हटाकर दूसरे दृश्य की तैयारी कर दी जाती थी। -धर्मपाल बंसल, प्रधान, श्री रामलीला कमेटी, सेक्टर-27
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कलाकारों के लिए रामलीला जिम्मेदारी भी थी
उस दौर में रामलीला की तैयारियां कई सप्ताह पहले शुरू हो जाती थीं। कलाकार दिन में नौकरी या कारोबार करते और शाम को अभ्यास के लिए पहुंचते थे। संवाद याद करने के साथ मंच सज्जा, पर्दे, वेशभूषा और दर्शकों के बैठने की व्यवस्था में भी कलाकार और स्थानीय लोग हाथ बंटाते थे। कई परिवारों की कई पीढ़ियां रामलीला से जुड़ी रहीं। -रघुबीर सिंह खरोला, अध्यक्ष, श्री बद्रीश रामलीला कला निकेतन गढ़वाल, सेक्टर-30

तकनीक ने बदला मंच का स्वरूप
आज कई रामलीला समितियां बड़े मंच, एलईडी स्क्रीन, आधुनिक प्रकाश व्यवस्था, शक्तिशाली ध्वनि प्रणाली और विशेष दृश्य प्रभावों का इस्तेमाल कर रही हैं। कलाकारों के लिए अलग ग्रीन रूम बनाए जाते हैं और रूप सज्जा के लिए विशेषज्ञ बुलाए जाते हैं। पोशाक और मुकुट भी पहले की तुलना में अधिक आकर्षक व भव्य हो गए हैं। -रणबीर बिष्ट, कोषाध्यक्ष, चंडीगढ़ केंद्रीय रामलीला महासभा
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