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फेस्टिवल ऑफ लेटर्स में बिखरी साहित्य की खुशबू

Sun, 09 Feb 2014 12:52 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Sun, 09 Feb 2014 12:52 AM IST
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festival of letters starts punjab university

साहित्य जगत से जुड़ी हस्तियों के सम्मान और उनकी रचनाओं को लेकर चर्चा पर आयोजित ‘फेस्टिवल ऑफ लेटर्स’ का शनिवार को शानदार आगाज हुआ। तीन दिन तक चलने वाले कार्यक्रम का आयोजन पंजाब यूनिवर्सिटी के इंग्लिश डिपार्टमेंट में शुरू हुआ।

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चंडीगढ़ साहित्य अकादमी की ओर से लगातार पांचवें साल इसका आयोजन किया जा रहा है। फेस्टिवल का शुभारंभ प्रशासकीय सलाहकार केके शर्मा ने किया। इसके बाद साहित्य जगत से जुड़ी हस्तियों को सम्मानित किया गया। साथ ही देर शाम तक साहित्यकारों के विचारों के अदान-प्रदान का सिलसिला चला।
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पांच साहित्यकार हुए सम्मानित
साहित्य जगत में विशिष्ट योगदान के लिए चंडीगढ़ के पांच साहित्यकारों को सम्मानित किया गया। इनमें उर्दू के लिए कृष्ण गौतम, हिंदी के लिए राजिंदर नीशेश और जियालाल हांडू को, शरणजीत कौर और जंग बहादुर गोयल को पंजाबी में साहित्य में दिए अतुल्य योगदान के लिए विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के हाथों सम्मानित किया गया।  
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लिखता हूं मिथक नाटक: धवनिल पारिख
नौवीं कक्षा से ही लिखने को शौक बनाने वाले गुजरात के धवनिल पारिख से दिन का सेशन शुरू हुआ। धवनिल से चर्चा में शमिल हुईं अराधिका शर्मा।

इस दौरान बात छिड़ी महाभारत से जुड़े उनके नाटक अंतिम युद्घ के बारे में। इस पर धवनिल ने पीएचडी भी की है। धवनिल ने बताया की वह भीष्म पितामाह के किरदार को केंद्र में रखकर नाटक लिखना चाहते थे। अपने इस नाटक में उन्होंने दिखाया कि किस तरह भीष्म पितामाह से युद्घ से पहले महाभारत से जुड़ी हर औरत प्रश्न करती है।

कोलकाता के इतिहास की ली जानकारी: अल्का सारोगी
अपने पहली ही रचना ‘काली कथा वाया बाईपास’ से 2001 में कोलकाता की लेखिका अल्का सारोगी साहित्य अकादमी अवार्ड जीत चुकीं हैं। इसमें उन्होंने कोलकाता में एक एनआरआई की जिंदगी पर अपनी लेखनी से साहित्य जगत के लोगों को अवगत कराया।

वंदना राकेश सिंह के साथ चर्चा में शामिल होते हुए अल्का ने बताया कि कहानी लिखने से पहले वह कोलकाता के इतिहास को जानना चाहती थीं। इसमें मारवाड़ियों और कोलकाता में रहने वालों के बीच के फर्क को जानना जरूरी था। अपनी कहानियों में मार्केटिंग और उससे जुड़ी व्यस्त जिंदगी को भी अल्का ने अपनी नई किताब एक ब्रेक के बाद में बयान किया है। इस दौरान उन्होंने इसके कुछ अंश पढ़ के सुनाए।   

बचपन में कहानियां सुनते-सुनते बन गया लेखक: रतन लाल शांत
कश्मीर से जुड़े किस्से और कहानियों को अपनी किताबों के माध्यम से आगे पहुंचाने वाले कश्मीरी साहित्यकार ‘रतन लाल शांत’ ने अपनी चर्चा रंगकर्मी कमल अरोड़ा के साथ शुरू की।


रतन ने बताया की परिवार में कोई भी साहित्य से जुड़ा नहीं था। लेकिन, बचपन में ही पिता जी राजा हरीशचंद्र की जिंदगी पर आधारित कहानी सत्य की कसौटी सुनाते थे। इसे सुनकर घर की औरतें तक रो देती थी। मेरा लिखने का शौक यहीं से पनपा। इसके बाद कॉलेज में जाने पर अपना एक ग्रुप बना लिया। उर्दू और हिंदी दोनों में लिखने का शौक है। इसलिए अपनी कहानियां उर्दू और कविता हिंदी में लिखता हूं।

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