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चंडीगढ़ः कोरोना महामारी में ये कैसा भेदभाव...घर में अनाज का दाना नहीं, कार्ड नहीं तो राशन नहीं
Fri, 08 May 2020 01:09 PM IST
खुशबू गोयल
अमर उजाला, चंडीगढ़
अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Fri, 08 May 2020 01:09 PM IST
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राशन वितरण प्रणाली के बारे में बताता परिवार
- फोटो : अमर उजाला
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लॉकडाउन का तीसरा चरण देशभर में शुरू हो चुका है। शहर का मजदूर, दिहाड़ीदार वर्ग अभी भी घर बैठा और मदद की ताक में है। केंद्र सरकार की एक योजना के तहत 50 हजार से ज्यादा परिवारों को गेहूं और दाल दी जा चुकी है, लेकिन हजारों परिवार ऐसे भी हैं, जिनके पास राशन कार्ड नहीं है। उन्हें कोई सरकारी मदद नहीं मिल रही है।
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत जिन परिवारों के पास राशन कार्ड हैं और बैंक खाते में सब्सिडी आ रही है, उन्हें तो गेहूं और दाल मिल रही है, लेकिन हजारों लोग जिनके पास कार्ड नही हैं न ही बैंक खाते में सब्सिडी आती है, वह बेहद परेशान हैं और जरूरतमंद हैं।
29 अप्रैल को पंजाब के गवर्नर और चंडीगढ़ के प्रशासक वीपी सिंह बदनौर ने फूड एंड सप्लाई विभाग के सेक्रेटरी विनोद पी कावले को एक योजना तैयार करने के आदेश दिए थे, जिसके तहत शहर के उन लोगों की भी मदद की जा सके, जिनके पास राशन कार्ड नहीं है। प्रशासक के इस आदेश के छह दिन बाद भी विभाग के पास कोई योजना नहीं है।
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लोगों के लिए एक-एक दिन काटना मुश्किल हो रहा है, लेकिन प्रशासन के अधिकारी आंख मूंदें बैठे हैं। देश के कई राज्यों में बिना भेदभाव किए हर जरूरतमंद तक सरकार की तरफ से राशन पहुंचाया गया है, लेकिन चंडीगढ़ में ऐसे लोगों तक मदद पहुंचाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है।
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प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत जिन परिवारों के पास राशन कार्ड हैं और बैंक खाते में सब्सिडी आ रही है, उन्हें तो गेहूं और दाल मिल रही है, लेकिन हजारों लोग जिनके पास कार्ड नही हैं न ही बैंक खाते में सब्सिडी आती है, वह बेहद परेशान हैं और जरूरतमंद हैं।
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29 अप्रैल को पंजाब के गवर्नर और चंडीगढ़ के प्रशासक वीपी सिंह बदनौर ने फूड एंड सप्लाई विभाग के सेक्रेटरी विनोद पी कावले को एक योजना तैयार करने के आदेश दिए थे, जिसके तहत शहर के उन लोगों की भी मदद की जा सके, जिनके पास राशन कार्ड नहीं है। प्रशासक के इस आदेश के छह दिन बाद भी विभाग के पास कोई योजना नहीं है।
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लोगों के लिए एक-एक दिन काटना मुश्किल हो रहा है, लेकिन प्रशासन के अधिकारी आंख मूंदें बैठे हैं। देश के कई राज्यों में बिना भेदभाव किए हर जरूरतमंद तक सरकार की तरफ से राशन पहुंचाया गया है, लेकिन चंडीगढ़ में ऐसे लोगों तक मदद पहुंचाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है।
शुरू में समाजसेवी संस्थाओं ने की मदद, अब उन्होंने ने भी हाथ खींचे
शहर की संजय कॉलोनी, रामदरबार, हल्लोमाजरा, कॉलोनी नंबर-4, धनास स्मॉल फ्लैट्स, विकास नगर समेत कई इलाकों में हजारों मजदूर परिवार सहित रहते हैं। इनमें से ज्यादातर किराएदार हैं। कई परिवार ऐसे भी हैं, जो हाल ही में चंडीगढ़ आए, लेकिन लॉकडाउन की वजह से उनकी रोजी-रोटी छिन गई। लॉकडाउन के दूसरे चरण तक तो विभिन्न सामाजिक संगठनों की ओर से खाना व राशन दिया गया, जिससे कई परिवारों का काम चला, लेकिन अब ज्यादातर संस्थाओं ने हाथ खींच लिए हैं।
अब ऐसे परिवारों की भी हालत बहुत खराब है। अधिकारियों के पास भी कोई जवाब नहीं है। पैक खाना ज्यादातर लोगों को मिलता नहीं, कभी मिलता भी है तो दिन में एक बार। इससे परिवार का पेट कैसे पाला जा सकता है। इस संबंध में प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अभी तक ऐसे लोगों की मदद के लिए कोई योजना नहीं बनी है।
केस 1: सामाजिक संस्थाएं साथ न देतीं, तो भूख से मर गए होते
दिहाड़ीदार हेमराज अपने परिवार के साथ रामदरबार के एक कमरे के मकान में रहते हैं। परिवार में 7 सदस्य हैं। पिछले डेढ़ महीने से हेमराज घर बैठे हैं। आय का स्रोत नहीं है। वह मजदूरी की तलाश में चंडीगढ़ आए थे। किराए का मकान होने की वजह से राशन कार्ड नहीं बनवा पाए, इसलिए उन्हें राशन नहीं मिला। हेमराज का कहना है कि घर में राशन खत्म हो गया है। सात लोगों के साथ एक-एक दिन गुजारना बहुत मुश्किल हो रहा है। कहा कि, अगर सामाजिक संस्थाएं उनका साथ नहीं देती तो उनका परिवार भूख से मर गया होता। उन्होंने प्रशासन से मदद की गुहार लगाई है।
अब ऐसे परिवारों की भी हालत बहुत खराब है। अधिकारियों के पास भी कोई जवाब नहीं है। पैक खाना ज्यादातर लोगों को मिलता नहीं, कभी मिलता भी है तो दिन में एक बार। इससे परिवार का पेट कैसे पाला जा सकता है। इस संबंध में प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अभी तक ऐसे लोगों की मदद के लिए कोई योजना नहीं बनी है।
केस 1: सामाजिक संस्थाएं साथ न देतीं, तो भूख से मर गए होते
दिहाड़ीदार हेमराज अपने परिवार के साथ रामदरबार के एक कमरे के मकान में रहते हैं। परिवार में 7 सदस्य हैं। पिछले डेढ़ महीने से हेमराज घर बैठे हैं। आय का स्रोत नहीं है। वह मजदूरी की तलाश में चंडीगढ़ आए थे। किराए का मकान होने की वजह से राशन कार्ड नहीं बनवा पाए, इसलिए उन्हें राशन नहीं मिला। हेमराज का कहना है कि घर में राशन खत्म हो गया है। सात लोगों के साथ एक-एक दिन गुजारना बहुत मुश्किल हो रहा है। कहा कि, अगर सामाजिक संस्थाएं उनका साथ नहीं देती तो उनका परिवार भूख से मर गया होता। उन्होंने प्रशासन से मदद की गुहार लगाई है।
केस 2: गरीबों के साथ ही भेदभाव क्यों
पूनम के पति की करीब एक साल पहले मृत्यु हो गई है। पूनम रामदरबार में पहले जिस मकान में रहती थी, उसका किराया ज्यादा था, कुछ पैसे बच जाएं, इसलिए अब वह एक कमरे के मकान में अपने तीन बच्चों के साथ रह रही हैं। लॉकडाउन से पहले वह एक फैक्टरी में काम करती थीं, लेकिन वह काम भी पिछले डेढ़ महीने से छूट गया है। परिवार में और कोई भी ध्यान रखने वाला नहीं है।
समाजसेवी संस्थाओं की तरफ से दिए गए राशन की वजह से ही वह पिछले डेढ़ महीने से अपने घर का गुजारा चला रही हैं। कुछ साल पहले ही उत्तर प्रदेश से यहां आई थीं, इसलिए राशन कार्ड नहीं बनवा पाईं। उन्होंने कहा कि उनके सामने कई ऐसे लोगों को राशन दिया गया है, जो पहले से ही संपन्न हैं, लेकिन उन्हें राशन नहीं मिला। प्रशासन गरीबों के साथ ही भेदभाव क्यों कर रहा है।
केस 3: मेरा काम भी बंद, मुझे भी चाहिए राशन
कॉलोनी नंबर-4 में किराए पर रहने वाले मंगरू शादियों में वेटर का काम करते थे। लॉकडाउन के बाद से घर बैठे हैं। यहां वह अकेले रहते हैं। अभी तक उनका खर्चा पैक खाने और सामाजिक संस्थाओं की तरफ से दिए गए राशन से चल रहा था। उनका कहना है कि कोरोना महामारी से सभी प्रभावित हुए हैं फिर सरकार राशन कार्ड होने और नहीं होने वालों के बीच भेदभाव कैसे कर सकती है। सभी को जीने के लिए राशन की जरूरत है। कहा कि, जो पैसे जमा थे वह भी अब खत्म हो गए हैं। सरकार सिर्फ उन्हें राशन दे रही है, जिनके पास कार्ड है। यह कैसा भेदभाव है।
केस 4: किराएदार तंग कर रहे, घर में राशन तक नहीं
कुलवंत कौर के दो बच्चे हैं। वह रामदरबार में 4700 रुपये किराया देकर रह रही हैं। वर्ष 2013 में कैंसर की वजह से पति की मृत्यु हो गई। वह मोहाली फेस 6 में काम करती थी, लेकिन एक एक्सीडेंट की वजह से काम छूट गया। बीते काफी समय से वह घर पर हैं और इलाज चल रहा है। कोई आमदनी नहीं होने की वजह से अपने मकान का किराया तक नहीं दे पाई हैं।
मकान मालिक किराए के लिए तंग कर रहा है। राशन कार्ड नहीं है। सामाजिक संस्थाओं ने कई बार राशन पहुंचाया, जिसकी वजह से घर चला, लेकिन प्रशासन की तरफ से कोई मदद नहीं मिली। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब सभी पर बुरा असर पड़ा है, प्रशासन मदद करने में भी भेदभाव कर रहा है। यह ठीक नहीं है। सभी जरूरतमंदों को राशन मिलना चाहिए।
समाजसेवी संस्थाओं की तरफ से दिए गए राशन की वजह से ही वह पिछले डेढ़ महीने से अपने घर का गुजारा चला रही हैं। कुछ साल पहले ही उत्तर प्रदेश से यहां आई थीं, इसलिए राशन कार्ड नहीं बनवा पाईं। उन्होंने कहा कि उनके सामने कई ऐसे लोगों को राशन दिया गया है, जो पहले से ही संपन्न हैं, लेकिन उन्हें राशन नहीं मिला। प्रशासन गरीबों के साथ ही भेदभाव क्यों कर रहा है।
केस 3: मेरा काम भी बंद, मुझे भी चाहिए राशन
कॉलोनी नंबर-4 में किराए पर रहने वाले मंगरू शादियों में वेटर का काम करते थे। लॉकडाउन के बाद से घर बैठे हैं। यहां वह अकेले रहते हैं। अभी तक उनका खर्चा पैक खाने और सामाजिक संस्थाओं की तरफ से दिए गए राशन से चल रहा था। उनका कहना है कि कोरोना महामारी से सभी प्रभावित हुए हैं फिर सरकार राशन कार्ड होने और नहीं होने वालों के बीच भेदभाव कैसे कर सकती है। सभी को जीने के लिए राशन की जरूरत है। कहा कि, जो पैसे जमा थे वह भी अब खत्म हो गए हैं। सरकार सिर्फ उन्हें राशन दे रही है, जिनके पास कार्ड है। यह कैसा भेदभाव है।
केस 4: किराएदार तंग कर रहे, घर में राशन तक नहीं
कुलवंत कौर के दो बच्चे हैं। वह रामदरबार में 4700 रुपये किराया देकर रह रही हैं। वर्ष 2013 में कैंसर की वजह से पति की मृत्यु हो गई। वह मोहाली फेस 6 में काम करती थी, लेकिन एक एक्सीडेंट की वजह से काम छूट गया। बीते काफी समय से वह घर पर हैं और इलाज चल रहा है। कोई आमदनी नहीं होने की वजह से अपने मकान का किराया तक नहीं दे पाई हैं।
मकान मालिक किराए के लिए तंग कर रहा है। राशन कार्ड नहीं है। सामाजिक संस्थाओं ने कई बार राशन पहुंचाया, जिसकी वजह से घर चला, लेकिन प्रशासन की तरफ से कोई मदद नहीं मिली। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब सभी पर बुरा असर पड़ा है, प्रशासन मदद करने में भी भेदभाव कर रहा है। यह ठीक नहीं है। सभी जरूरतमंदों को राशन मिलना चाहिए।