पंजाब कांग्रेस में तीन दिग्गजों में 'जंग', जानिए क्यों और कैसे?
पंजाब प्रदेश कांग्रेस में सियासी उठापटक बीते कुछ दिनों में एकदम तेज हुई है। मसला वही पुराना है, पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पीपीसीसी) के अध्यक्ष पद की कुर्सी। 2007 के बाद से प्रदेश की सत्ता से बाहर चली आर रही कांग्रेस के लिए 2017 का विधानसभा चुनाव काफी मायने रखता है।
2007 से अब तक की बात करें तो 2009 के लोकसभा चुनाव को छोड़ कर अन्य मौकों पर पंजाब में कांग्र्रेस का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा है। चाहे 2007 की बात हो या 2012 की कांग्रेस को शिअद-भाजपा गठबंधन के हाथों में हार का मुंह देखना पड़ा। बेशक दोनों ही मौकों पर 117 सदस्यों वाली पंजाब विधानसभा में इसके विधायकों की संख्या 40 का आंकड़ा पार कर गई, लेकिन अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद के बावजूद पार्टी की कलह इसके सत्ता से दूर रहने का कारण बनी।
2007 में तो शिअद-भाजपा सरकार बरने का कारण एंटी इंकंबेंसी को माना गया, लेकिन 2012 में कांग्रेसी सरकार बनने की पूरी उम्मीद के बावजूद पार्टी सत्ता से दूर रह गई। दोनों चुनावों में कांग्रेस की हार का अंतर महज एक फीसदी वोटों के आसपास रहा और इसकी वजह में बड़ा हाथ आंतरिक गुटबाजी को ही माना जाता है।
कांग्रेस कई सीटें 500 वोटों से कम के अंतर से हारी, जिसमें अहम भूमिका बागी उम्मीदवारों और पार्टी के अंदर बैठकर ही अधिकृत प्रत्याशियों की काट करने वालों की मानी जाती है। बहरहाल गुटबाजी का यह सिलसिला लगातार जारी है और पीपीसीसी अध्यक्ष पद को लेकर चल रही खींचतान से हाईकमान की सिरदर्दी बढ़ी हुई है।
2012 चुनाव में हार के बाद बाजवा को सौंपी गई कमान
2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह की जगह प्रताप सिंह बाजवा को पीपीसीसी की कमान सौंपी गई थी। तभी से कैप्टन उनका विरोध कर रहे हैं। वह शुरू से ही कहते आ रहे हैं कि बाजवा के बजाय हाईकमान को अन्य विकल्पों पर विचार करना चाहिए था।
अध्यक्ष पद के लिए पंजाब में उनसे बेहतर कई नेता हैं। इस पर बाजवा का कहना है कि पार्टी नेतृत्व ने उनमें कोई खूबी देखी तभी पद दिया। जब आलाकमान की इच्छा होगी, तभी पद छोड़ देंगे। साथ ही यह भी कहते हैं कि जिन कैप्टन अमरिंदर को उनमें कमी दिख रही है, उन्होंने ने ही उन्हें पांच साल तक अपनी सरकार में मंत्री बनाए रखा था।
पीपीसीसी अध्यक्ष रहते हुए कैप्टन अमरिंदर ने ही उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष व महासचिव बनाया। अगर कैप्टन को तब उनमें कुछ बेहतर दिखता था, तभी अपने साथ रखा। अब उनके प्रदेशाध्यक्ष बनते ही उन्हें कमियां नजर आने लगीं। इस तनातनी के बीच गत वीरवार को कैप्टन अमरिंदर सिंह की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात हुई। बाजवा, राहुल से मिले।
दोनों ही बैठकों में प्रदेश के हालात पर खुलकर चर्चा हुई। इस दौरान कैप्टन और बाजवा दोनों को ही उचित फैसले का आश्वासन देकर 2017 की तैयारियों में जुट जाने को कहा गया है। बैठकों में हुई बातचीत से दोनों ही नेता काफी संतुष्ट नजर आ रहे हैं। खैर इसका नतीजा तो आने वाले दिनों में सामने आएगा, लेकिन दोनों के बीच तल्खी कम नहीं हुई है। कैप्टन नेतृत्व परिवर्तन अड़े हुए हैं तथा फैसला हाईकमान ने लेना है।
अब कुर्सी को लेकर ये तीन दिग्गज आमने-सामने
कैप्टन अमरिंदर सिंह
11 मार्च 1942 को जन्मे कैप्टन अमरिंदर सिंह 2002 से 2007 तक पंजाब के मुख्यमंत्री रहे। वह 1980 से 1984 तक सांसद रहे तथा 1985 में बनी सुरजीत सिंह बरनाला की अगुवाई वाली शिअद सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बने। इसके अलावा 1998 से 2002 और 2010 से 2014 तक पीपीसीसी अध्यक्ष रहे। इस वक्त वह अमृतसर के सांसद हैं और लोकसभा में कांग्रेस के उप नेता हैं।
राजिंदर कौर भट्ठल
30 सितंबर 1945 को जन्मी राजिंदर कौर भट्ठल अप्रैल 1996 से फरवरी 1997 तक पंजाब की मुख्यमंत्री रहीं। वह पंजाब की पहली व अब तक की एकमात्र महिला मुख्यमंत्री रहीं। 2007 से 2012 तक वह पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में जिम्मेदारी निभाती रहीं। उससे पहले 1992 में बेअंत सिंह सरकार में मंत्री बनीं तथा कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार के वक्त उप मुख्यमंत्री भी रहीं। वह 1997 में पीपीसीसी अध्यक्ष भी रहीं।
प्रताप सिंह बाजवा
पीपीसीसी के मौजूदा अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा की इस पद पर नियुक्ति 2013 में हुई। वह 2002 से 2007 तक कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई वाली सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे। 2009 में गुरदासपुर से लोकसभा सदस्य बने। उनका जन्म 29 जनवरी 1957 को हुआ।
जगमीत बराड़ की वापसी से बने नए समीकरण
इस सबके बीच पूर्व सांसद जगमीत बराड़ की कांग्रेस में वापसी हो गई। मालवा के तेजतर्रार नेता बराड़ की ओर से लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद की गई कुछ टिप्पणियों की वजह से उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया गया था।
उस वक्त उनके भाजपा में जाने की संभावना जताई जा रही थी, लेकिन बात सिरे नहीं चढ़ पाई। अब फिर से सोनिया व राहुल ने उन्हें पार्टी में वापस ले लिया है। चूंकि बराड़ खुद में एक शख्सियत हैं, ऐेसे में उन्हें भी पार्टी उन्हें नजरंदाज नहीं कर सकती।
पंजाब के फिरोजपुर-फरीदकोट क्षेत्र में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है तथा वह वहां बादल परिवार से लगातार सियासी लड़ाई लड़ते आए हैं। पंजाब कांग्रेस के ताजा हालात के बीच बराड़ की पार्टी में वापसी को नए समीकरणों के रूप में देखा जा रहा है।
धरनों पर भी सियासत
और तो और पंजाब की अकाली-भाजपा गठबंधन सरकार के खिलाफ कांग्रेस के धरनों को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच सियासत हो रही है। गन्ना उत्पादकों की बकाया राशि के भुगतान के लिए सरकार पर दबाव बनाने को लेकर प्रताप बाजवा ने गत 19 अगस्त को आगामी 25 तारीख से धरना शुरू करने की घोषणा की।
इसके कुछ ही घंटे बाद कैप्टन ने 21 अगस्त को मुख्यमंत्री निवास पर प्रदर्शन करने का ऐलान कर दिया। बीते 21 अगस्त को पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुनील जाखड़ व अन्य विधायकों संग दिए गए इस धरने से जहां कैप्टन ने सरकार को अपने तेवर दिखाए, वहीं पार्टी नेताओं को भी स्पष्ष्ट कर दिया कि वह प्रदेश की राजनीति में पूरी तरह से सक्रिय हो गए हैं।
उन्होंने 2017 के चुनाव के लिए अभी से तैयारी शुरू करने के लिए पार्टी नेताओं से कहा। वहीं, कैप्टन के इस धरने में न तो बाजवा और न ही पूर्व मुख्यमंत्री राजिंदर कौर भट्ठल शामिल हुए। कैप्टन ने इस बारे में कहा कि यह पार्टी धरना था, किसी को निजी तौर पर न्योता नहीं दिया गया।
सभी को किसानों के मसले पर खुद आना चाहिए था। साथ ही बाजवा के धरने में न जाने की बात उन्होंने कही। यह भी कहा कि वह जाखड़ की ओर से बनाए जाने वाले कार्यक्रम के अनुसार प्रदेशभर में सरकार के खिलाफ धरनों में शामिल होंगे। स्पष्ट किया कि उनके कार्यक्रम बाजवा से अलग होंगे।
छह महीने पहले उम्मीदवारों की घोषणा की तैयारी
आमतौर पर कांग्रेसी उम्मीदवारों की घोषणा चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद तक होती रहती है। ऐसे में गुटबाजी काफी हावी हो जाती है तथा बागियों को मनाने का समय नहीं रहता। इस स्थिति को ध्यान में रखकर पार्टी के इस बार चुनाव से करीब छह महीने पहले ही उम्मीदवारों की घोषणा करने की उम्मीद है।
पार्टी में एक पक्ष की राय है कि गुटबाजी को समाप्त करने के लिए विभिन्न नेताओं पर आधारित समन्वय समिति गठित की जानी चाहिए। वहीं, दूसरे गुट की राय है कि इससे धड़ेबंदी और बढ़ेगी। चुनाव तो एकल नेतृत्व में ही लड़ा जाना चाहिए। पीपीसीसी अध्यक्ष के पास सभी अधिकार हों और उन्हीं के नेतृत्व में आगे बढ़ा जाए।
इन सभी बातों पर हाईकमान गौर कर रहा है तथा सभी पहलुओं पर विचार-विमर्श के बाद पीपीसीसी अध्यक्ष पद को लेकर इसका फैसला आएगा, जिसका सभी को इंतजार है। इस प्रकार पंजाब कांग्रेस 2017 के चुनाव को लेकर तैयार तो हो चुकी है, लेकिन धड़ेबंदी में उलझकर। देखना है आने वाले समय में नतीजा क्या रहता है?
कैप्टन-बाजवा का अलग अलग प्रचार शेड्यूल
2017 विधानसभा चुनाव के संबंध में कैप्टन अमरिंदर सिंह और प्रताप सिंह बाजवा न अपना-अपना प्रचार कार्यक्रम तय कर लिया है। कैप्टन यूनिवर्सिटी और कॉलेज छात्रों के साथ इंटरेक्शन से अपने प्रचार अभियान की शुरुआत करेंगे। उनके अनुसार आज यूथ की सियासत में अहम भूमिका है।
2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अमृतसर के केवल एक कॉलेज में स्टूडेंट्स के साथ इंटरेक्शन की थी और संबंधित बूथ से उन्हें अप्रत्याशित बढ़त मिली। इस बात को ध्यान में रखकर वह अभी से तैयारी शुरू करने जा रहे हैं। यह भी कहा कि राज्य के अलग-अलग जिलों में निरंतर जनसभाएं की जाएंगी।
वहीं, बाजवा के अनुसार उनके अभियान की शुरुआत आगामी 25 अगस्त को फगवाड़ा में गन्ना उत्पादकों की पेमेंट देरी के खिलाफ प्रदर्शन से होगी। फिर रक्खड़ पुन्नेयां व डॉ. भीम राव अंबेदकर पर रैलियों का आयोजन होगा। आगामी 2 अक्तूबर से पैदल मार्च शुरू होगा, जो कि छह महीने तक छह पड़ावों में चलेगा। इस दौरान करीब एक हजार किलोमीटर तय किए जाएंगे। यह मार्च प्रदेश के सभी हिस्सों में अलग-अलग समय पर चलेगा।