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हरियाणा के 2 आईएफएस को मिली राहत, ट्रिब्यूनल ने रोके तबादले
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Tue, 15 Mar 2016 10:54 AM IST
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कोर्ट
- फोटो : फाइल फोटो
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केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण की चंडीगढ़ बेंच ने हरियाणा में कार्यरत दो इंडियन फॉरेस्ट सर्विस (आईएफएस) के ट्रांसफर आदेश रोक दिए हैं। ट्रिब्यूनल ने दिए आदेश में कहा कि दोनों अधिकारियों को नियमों के विपरीत तय समय से पहले ट्रांसफर किया गया है। ट्रिब्यूनल ने सिविल सर्विस बोर्ड से इस मामले में जवाब मांगा है।
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ट्रिब्यूनल में कंजर्वेशन ऑफ फॉरेस्ट वाइल्ड लाइफ, गुड़गांव में तैनात आईएफएस रामबीर सिंह (53) और कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट पंचकूला में कार्यरत आईएफएस एमपी शर्मा ने ट्रांसफर आदेश के खिलाफ याचिका दायर की थी। दोनों आईएफएस ने ट्रांसफर को गलत बताते हुए यूनियन ऑफ इंडिया के सेक्रेटरी, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया, मिनिस्ट्री ऑफ एनवायरमेंट एंड फॉरेस्ट एंड क्लाइमेट चेंज (एमओईएफसीसी) समेत हरियाणा सरकार को प्रिंसिपल सेक्रेटरी के जरिए और फॉरेस्ट एंड वाइल्ड लाइफ, गवर्नमेंट ऑफ हरियाणा को पार्टी बनाया था।
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पंचकूला में तैनात आईएफएस एमपी शर्मा ने ट्रिब्यूनल में दायर याचिका में कहा था कि उन्हें पिछले 10 महीनों में चार बार ट्रांसफर किया जा चुका है। फरवरी 2014 में वह एचडीएफसी लिमिटेड, पंचकूला में चीफ जनरल मैनेजर पद पर कार्यरत थे। दिसंबर 2014 में उन्हें वहां से ट्रांसफर कर कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट (ट्रेनिंग) पिंजौर भेजा गया। वहां से अगले महीने जनवरी 2015 में कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट नार्थ सर्क ल पंचकूला ट्रांसफर कर दिया गया। यहां से भी उन्हें दिसंबर 2015 में ट्रांसफर कर कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट (वाइल्ड लाइफ) पंचकूला भेज दिया गया। शर्मा के अनुसार उन्हें बिना किसी कारण बार-बार ट्रांसफर किया जा रहा है।
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वहीं गुड़गांव में तैनात आईएफएस रामबीर सिंह ने कहा था कि उन्होंने 20 जुलाई, 2015 को वहां चार्ज संभाला था, लेकिन हरियाणा सरकार ने 11 दिसंबर, 2015 को उनके ट्रांसफर आदेश जारी कर दिए। उन्हें सीएफ (पीएंडई) पंचकूला में तैनाती के निर्देश दिए। सिंह के अनुसार गुड़गांव में उनकी तैनाती पांच माह पहले ही हुई थी। ऐसे में नियमों के तहत उन्हें दो साल से पहले ट्रांसफर नहीं कर सकते। समय से पहले ट्रांसफर पर उन्होंने पारिवारिक कारणों से असुविधा जाहिर की थी।
दोनों आईएफएस की अपील पर ट्रिब्यूनल ने हरियाणा सरकार को नोटिस जारी किया था। इसके जवाब में हरियाणा सरकार की ओर से कहा गया था कि दोनों अधिकारियों के तबादले जनहित में देखते हुए ही किए गए थे। उक्त दोनों अधिकारियों के अलावा कई अन्य अधिकारियों के ट्रांसफर का प्रस्ताव सिविल सर्विस बोर्ड के समक्ष रखा गया था। बोर्ड की मंजूरी के बाद ही संबंधित सक्षम अथॉरिटी ने ही इसे मंजूर किया था।
ट्रांसफर का कोई कारण नहीं बताया
ट्रिब्यूनल ने हरियाणा सरकार के जवाब में पाया कि ट्रांसफर प्रस्ताव में कहा गया था कि सिर्फ मुख्यमंत्री ही ट्रांसफर को मंजूरी दे सकते हैं। समय से पहले दोनों अधिकारियों के तबादले को लेकर कोई कारण नहीं बताया गया। बोर्ड को समय से पहले ट्रांसफर को लेकर विस्तृत रिपोर्ट मांगनी चाहिए थी, मगर ऐसी कोई तर्कसंगत रिपोर्ट राज्य सरकार के प्रस्ताव में नहीं थी और न ही बोर्ड ने ऐसी कोई रिपोर्ट मांगी। ट्रिब्यूनल ने फैसले में कहा कि एक अधिकारी को ऐसे बार-बार ट्रांसफर करना भी उचित नहीं है।