74 वर्षीय वसीम बरेलवी लूट ले गए चंडीगढ़ का दिल
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‘हर शख्स दौड़ता है यहां भीड़ की तरफ, और यह भी चाहता है उसे रास्ता मिले।’ ये नायाब अल्फाज हैं उस शायर के, जिस पर उर्दू शायरी भी रश्क करती है। उसकी महफिल सजी हो तो श्रोताओं के दिल लुटने ही थे।
चंडीगढ़ के यूटी गेस्ट हाउस में शनिवार को महफिल सजाई उस चिराग ने, जो जहां भी जाता है, रोशनी लुटाता है और जाना जाता है वसीम बरेलवी के नाम से। उनके हर शब्द पर सभागार में वाह-वाह थी और हर पंक्ति तालियों की गड़गड़ाहट के बीच खत्म होती। हर शेर सीधा सरल था मगर अर्थ गूढ़। बिल्कुल बरेलवी के व्यक्तित्व की तरह।
सिटी ब्यूटीफुल की खूबसूरती की तारीफ तो सब करते हैं मगर इस शायर ने चंडीगढ़ की आत्मा से साक्षात्कार कराया। बरेलवी ने कहा, नए शहर बसते हैं। नई इमारतें बनती हैं मगर उनमें शहरीयत आने में जमाने गुजर जाते हैं। लेकिन चंडीगढ़ एक ऐसा शहर है जिसने थोड़े समय में ही शहर से शहरीयत की मंजिल पा ली।
खचाखच भरे सभागार में हर श्रोता मंत्रमुग्ध
खचाखच भरे सभागार में हर श्रोता मंत्रमुग्ध था। उन्होंने समाज, देश और दुनिया के हर पहलू से इस तरह रूबरू कराया।
इस दौर-ए-मुंसिफी में जरूरी नहीं, जिस शख्स की खता हो उसी को सजा मिले।
स्वभाव फूल जैसा हौसला गुलदान जैसा है, यह उर्दू है कि जिसका दिल भी हिंदुस्तान जैसा है।
अपने चेहरे से जो जाहिर है छुपाएं कैसे, तेरी मर्जी के मुताबिक नजर आएं कैसे?
गरीब लहरों पर पहरे बिठाए जाते हैं, समंदरों की तलाशी कोई नहीं लेता।
मुझे उस पार उतर जाने की जल्दी ही कुछ ऐसी थी, जो कश्ती मिली उस पर भरोसा कर लिया मैंने।
मुझे ये खौफ दे मालिक मुझी पर है नजर तेरी, बस इतना ही नहीं काफी कि सजदा कर लिया मैंने।
घरों की तरबीयत क्या आ गई टीवी के हाथों में, कोई बच्चा अब अपने बाप पर नहीं जाता।
बुरे अच्छे हैं सब रिश्ते यहीं के हैं, किसी को साथ दुनिया से कोई लेकर नहीं जाता।
कोई रिश्ता बनाकर मुतमइन होना नहीं अच्छा, मोहब्बत आखिरी दम तक ताल्लुक आजमाती है।
'...हम ही दीवाने हैं कि दीवाने बने रहते हैं'
शायर का रोमांस रूहानी होता है। अगर बरेलवी के अंदाज और आवाज में हो तो दिल किसके बस में रहना था। उनकी गज़ल देखिए-
फूल तो फूल हैं आंखों से घिरे रहते हैं, कांटे बेकार हिफाजत में लगे रहते हैं।
तुमको फुर्सत नहीं मिलती कि पलटकर देखें, हम ही दीवाने हैं कि दीवाने बने रहते हैं।
मुंतजिर मैं ही नहीं रहता किसी आहट का, कान दरवाजे पे उनके भी लगे रहते हैं।
देखना साथ ही छूटे न बुजुर्गों का कहीं, पत्ते पेड़ों पे लगे हों तो हरे रहते हैं।
बुलंद आवाज में नज़्म
वसीम बरेलवी ने जब बुलंद आवाज में यह नज्म गाई तो पूरा सभागार झूमने लगा-
दुनिया की हर जंग वही लड़ जाता है
जिसको अपने आप से लड़ना आता है।
पर्दा जब गिरने के करीब आ जाता है
तब जाकर कुछ खेल समझ में आता है।
तू क्या समझा तुझसे बिछुड़कर बिखरुंगा
देख ये मैं हूं मुझको संभलना आता है।
चंडीगढ़ साहित्य अकादमी की ओर से आयोजित आर्ट्स एंड हेरिटेज फेस्टिवल के चौथे दिन यह कार्यक्रम आयोजित किया गया था। मंच संचालन कवि माधव कौशिक ने किया।