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सांडर्स को मारने के बाद यहां छिपे थे भगत सिंह

Mon, 23 Mar 2015 08:35 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, अंबाला सिटी
ब्यूरो/अमर उजाला, अंबाला सिटी Updated Mon, 23 Mar 2015 08:35 AM IST
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23 march bhagat singh martyre day special story

हरियाणा में अंबाला के डीएवी कॉलेज से भी शहीदे आजम भगत सिंह की यादें जुड़ी हुई हैं। यह वही कॉलेज है, जो पहले पाकिस्तान के लाहौर में हुआ करता था, मगर आजादी के बाद डीएवी संस्था ने इसे अंबाला शहर में स्थापित किया।

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हिंदुस्तान में यह कॉलेज डीएवी संस्था का पहला शिक्षण संस्थान है। जिसने कभी शहीदे आजम भगत सिंह को उस वक्त आश्रय दिया था, जब अंग्रेज उनके पीछे थे।

डीएवी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य एवं इतिहासविद जसमेर सिंह नैन के अनुसार डीएवी कॉलेज में ही भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव सांडर्स को मारने के बाद छिपे थे। उनके अनुसार ये इतिहास इस कालेज के साथ बरसों से जुड़ा है।

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कॉलेज में हुई थी क्रांतिकारियों की बैठक

23 march bhagat singh martyre day special story

साइमन कमीशन का विरोध करने वाले स्वतंत्रत सेनानी लाला लाजपत राय व अन्य स्वतंत्रता सेनानियों पर बर्बर लाठियां बरसाने वाले जेपी सांडर्स को 17 दिसंबर 1929 को शहीद भगत सिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद और जयगोपाल ने मिलकर गोलियों से उड़ा दिया था।

सांडर्स के साथ एक ब्रिटिश पुलिस हेड कांस्टेबल को भी मौत के घाट उतार दिया गया, जबकि एक इंपेक्टर फर्न भगत सिंह की गोलियों से बच गया। इस घटना की योजना शहीदों ने दिसंबर 1929 में बनाई थी और उसके बाद शहीदों ने आजादी के आंदोलन के इतिहास की सबसे सनसनीखेज घटना को अंजाम दिया।

इस ऐतिहासिक सनसनीखेज घटना की याद अंबाला शहर के डीएवी कॉलेज में है। क्योंकि लाहौर में यही वो कालेज है, जिसमें सभी शहीद क्रांतिकारी सांडर्स को मारने से पहले और मारने के बाद छिपे थे और इसी कॉलेज के छात्रावास के स्टाफ व एक शिक्षक की बदौलत वह कॉलेज से निकलकर लाहौर से दिल्ली पहुंचे थे।

यह कॉलेज लाहौर में डीएवी संस्थान का सबसे पहली और एकमात्र शैक्षणिक संस्थान था, जिसका नाम डीएवी हिंदू स्कूल था। मगर बाद में इसे डीएवी कॉलेज बना दिया गया।

1947 में बंटवारे के बाद डीएवी संस्थान ने यही कालेज लाहौर से अंबाला शहर में स्थापित कर दिया। लाहौर की याद जिंदा रखने के लिए यह कॉलेज आज भी अपने नाम के साथ डीएवी कॉलेज (लाहौर) जरूर लिखता है।

छात्रावास से निकले और सांडर्स को मारी गोली

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दिसंबर 1929 में शहीदों ने जब जेपी सांडर्स को मारने की योजना बनाई तो उन्होंने इसके लिए डीएवी कॉलेज के सामने ब्रिटिश पुलिस के दफ्तर के पास की जगह को चुना। शहीदों की योजना थी कि इस घटना को अंजाम देने के लिए वह डीएवी कॉलेज के  छात्रावास से ही आएंगे और घटना को अंजाम देकर वहीं छिप जाएंगे।

सब कुछ तय योजना के तहत ही हुआ। शहीद डीएवी कॉलेज के छात्रावास में ही छिपे हुए थे। सांडर्स जैसे ही पुलिस के दफ्तर से बाहर आया तो उसकी रेकी कर रहे क्रांतिकारी जयगोपाल के इशारे के बाद भगत सिंह व राजगुरु ने सांडर्स पर गोलियां दाग दी। सांडर्स बच न जाए इसलिए भगत सिंह ने उस पर चार-पांच गोलियां और दाग दीं।

तभी दो हेड कांस्टेबल और इंस्पेक्टर फर्न ने राजगुरु व भगत सिंह पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं। दोनों कॉलेज की ओर ही भागे। उधर, डीएवी कॉलेज के फाटक के पास चंद्रशेखर आजाद ने भगत सिंह और राजगुरु का पीछा कर रहे दोनों हेड कांस्टेबल व इंस्पेक्टर फर्न पर गोलियां चला दी। इसमें एक हेड कांस्टेबल मारा गया, जबकि दूसरा हेडकांस्टेबल व फर्न बच गए।

उसके बाद चंद्रशेखर भी फरार हो गए और भगत सिंह व राजगुरु कॉलेज के छात्रावास में ही घुस गए। हालांकि अंग्रेजों ने पूरे कालेज व छात्रावास को खंगाला। लेकिन छात्रावास के रसोईये स्टाफ ने शहीदों को छिपाए रखा और शिक्षक की मदद से उन्हें बाद में सुरक्षित कालेज से निकाला।

जिसके बाद वह लाहौर से दिल्ली पहुंच गए और उन्होंने पोस्टर छपवाकर सार्वजनिक कर दिया कि ‘उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी बंसती देवी के सवाल का जवाब दे दिया है और लाला जी की मौत का बदला ले लिया है?’

उल्लेखनीय है कि लाला जी की मौत के बाद उनकी तेरहवीं पर आयोजित श्रद्धांजलि समारोह में बसंती देवी ने संबोधन में यह सवाल छोड़ा था कि ‘क्या देश के नौजवानों का खून अब उबलना बंद कर गया है जो वह नेताओं को यूं मरते हुए देखते हैं।’ इसके बाद ही सांडर्स की मौत की योजना शहीदों ने बनाई थी।

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