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Zara Hatke: आदिवासी कैसे करते हैं बारिश होने की भविष्यवाणी? मुर्गे को अनाज खिलाकर करते हैं ये खास पूजा
Fri, 27 Jun 2025 01:48 PM IST
दीक्षा पाठक
फीचर डेस्क, अमर उजाला
फीचर डेस्क, अमर उजाला
Published by: दीक्षा पाठक
Updated Fri, 27 Jun 2025 01:48 PM IST
सार
Zara Hatke: गांव के बुजुर्ग पंकु बैगा के अनुसार यह पूजा कई पीढ़ियों से निरंतर की जा रही है। गांव के सभी लोग मिलकर चंदा इकट्ठा करते हैं और फिर पूरे गांव के सहयोग से पूजा की तैयारियां की जाती हैं। सबसे पहले गांव के आराध्य ठाकुर बाबा की पूजा होती है।
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आदिवासी कैसे लगाते हैं बारिश का अनुमान
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारत के कुछ क्षेत्रों में आदिवासी संस्कृति आज भी अपनी पुरानी परंपराओं के साथ जीवित है और इन्हीं परंपराओं में शहडोल के आदिवासी गांवों की बेदरी पूजा का विशेष महत्व है। यहां बारिश के मौसम की शुरुआत के साथ ही खरीफ की फसल की तैयारी होती है, लेकिन उससे पहले गांव में सामूहिक रूप से यह पूजा करना जरूरी माना जाता है। इस अनुष्ठान के बिना कोई किसान अपने खेत में बीज नहीं डालता, चाहे समय कितना भी बदल जाए। तो आज की इस खबर में हम आपको इसके बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं।
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पूरे गांव के सहयोग से की जाती है पूजा
गांव के बुजुर्ग पंकु बैगा के अनुसार यह पूजा कई पीढ़ियों से निरंतर की जा रही है। गांव के सभी लोग मिलकर चंदा इकट्ठा करते हैं और फिर पूरे गांव के सहयोग से पूजा की तैयारियां की जाती हैं। सबसे पहले गांव के आराध्य ठाकुर बाबा की पूजा होती है। इसके बाद खेर बाबा के स्थान पर बेदरी पूजा का आयोजन किया जाता है। इस पूजा की सबसे खास रस्म में एक मुर्गे को अनाज खिलाकर उसे पूजा स्थल पर छोड़ा जाता है। यहां के लोगों का विश्वास है कि यह मुर्गा पूरे साल गांव की रक्षा करता है और बीमारियों, प्राकृतिक आपदाओं या अन्य संकटों से गांव को सुरक्षित रखता है। यह प्रथा गांव की सुख-शांति और उन्नति का प्रतीक मानी जाती है।
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ऐसे लगाते हैं आदिवासी बारिश का अनुमान
बेदरी पूजा की एक और खास परंपरा बारिश के अनुमान से जुड़ी हुई है। पूजा के दौरान एक मिट्टी का कलश पानी से भरकर उसके चारों ओर चार मिट्टी के लोदे रखे जाते हैं, जो सावन, भादो, आश्विन और कार्तिक महीनों का प्रतीक होते हैं। कुछ समय बाद लोदों में कितनी नमी रहती है। इसे देखकर अंदाजा लगाया जाता है कि किस महीने में बारिश कितनी होगी। इस पूर्वानुमान के आधार पर किसान अपनी खेती की योजना बनाते हैं और बीज बोने से लेकर फसल की देखरेख तक की तैयारी करते हैं, ताकि मौसम के अनुसार अच्छी उपज प्राप्त हो सके।
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ग्रामीण जीवन से गहराई से जुड़ी है
यह परंपरा सिर्फ धार्मिक आस्था का हिस्सा नहीं है, बल्कि गांव की एकजुटता और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक भी है। बेदरी पूजा यह भी दिखाती है कि कैसे आदिवासी समाज ने मौसम के बदलाव को समझने के लिए अपने अनुभव और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाया। आधुनिक युग में भी यह परंपरा किसानों के लिए मौसम की जानकारी का महत्वपूर्ण जरिया बनी हुई है और पारंपरिक ज्ञान की अहमियत को बताती है, जो आज भी ग्रामीण जीवन में गहराई से जुड़ा हुआ है।