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चीन का वो 'काम', जो बन गया है पाकिस्तान के 'गले की हड्डी'

Thu, 25 Jun 2020 10:58 AM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सोनू शर्मा Updated Thu, 25 Jun 2020 10:58 AM IST
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China one belt one road or new silk road project has become Pakistan throat bone
'वन बेल्ड, वन रोड' परियोजना के तहत पाकिस्तान में बनाया गया दूरी बताने वाला साइनबोर्ड - फोटो : Social media

इसे इतिहास की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक माना गया था। चीन की 'वन बेल्ट, वन रोड' परियोजना जिसे 'न्यू सिल्क रोड' के नाम से भी जाना जाता है। साल 2013 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बुनियादी ढांचा विकास की इस परियोजना की शुरुआत की थी। इसके तहत पूर्वी एशिया से यूरोप, अफ्रीका और लातिन अमेरिका तक विकास और निवेश की बड़ी परियोजनाओं की एक पूरी श्रृंखला पर काम किया जाना है। 

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चीन के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ये प्रमुख रणनीति है, लेकिन आलोचकों की राय इससे अलग है। उन्हें लगता है कि चीन कर्ज देने की कूटनीति का इस्तेमाल दुनिया भर के देशों पर अपने असर को बढ़ाने के लिए कर रहा है। लेकिन वो परियोजना जिसका मकसद प्रोडक्ट, पूंजी और टेक्नॉलजी के वैश्विक प्रवाह के जरिए आर्थिक विकास को बढ़ावा देना था, अचानक कोरोना महामारी के कारण रुक गई है।  
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चीन से बड़े पैमाने पर कर्ज लेने वाले बहुत से देश अब कई मुश्किलों का सामना कर रहे हैं और इनमें से कई देशों ने एक-एक करके चीन को बता दिया है कि वे कर्ज चुका पाने की स्थिति में नहीं हैं। क्या राष्ट्रपति शी जिनपिंग की महत्वाकांक्षी 'न्यू सिल्क रोड' परियोजना का अंत है? या फिर कोरोना महामारी महज एक बाधा है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ चीन भी उबर जाएगा। 
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'वन बेल्ट, वन रोड' परियोजना

साल 2013 में 'वन बेल्ट, वन रोड' परियोजना की शुरुआत के बाद से चीन ने अफ्रीका, दक्षिण पूर्वी और मध्य एशिया, यूरोप और लातिन अमेरिका के 138 देशों को पावर प्लांट्स, गैस पाइपलाइंस, बंदरगाह, हवाई अड्डे बनाने और रेलवे लाइन बिछाने के नाम पर सैंकड़ों करोड़ डॉलर की रकम कर्ज या मदद के तौर पर दिया है या फिर देने का वादा कर रखा है। 

हालांकि चीन ने आज तक इस 'न्यू सिल्क रोड' प्रोजेक्ट पर आने वाले खर्च के बारे में कभी भी पूरी जानकारी मुहैया नहीं कराई है, लेकिन अमेरिकी कंसल्टेंसी फर्म 'आरडब्ल्यूआर एडवाइजर' के अनुसार चीन ने 'वन बेल्ट, वन रोड' परियोजना में भाग लेने वाले देशों को 461 अरब डॉलर का कर्ज दे चुका है। इनमें ज्यादातर अफ्रीकी देश हैं और उन्हें बेहद जोखिम वाले कर्जदारों में गिना जाता है। 

बीबीसी की चीनी सेवा के संपादक होवार्ड झांग कहते हैं, 'शुरुआत से ही इस परियोजना के खिलाफ चीन में चौतरफा आलोचना होती रही है। दरअसल, चीन के सत्तारूढ़ नेतृत्व में इस परियोजना को लेकर कभी सहमति थी ही नहीं। बहुत से लोगों ने शी जिनपिंग की रणनीतिक समझदारी पर सवाल उठाए। कुछ ने तो यहां तक कि कह दिया कि ये एक गैरजरूरी खर्च है।'

पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका ने भी 'वन बेल्ट, वन रोड' परियोजना की आलोचना करते हुए कहा कि चीन 'कर्ज देने की अपनी आक्रामक रणनीति कमजोर देशों पर' आजमा रहा है। 

चीन का धर्मसंकट

लेकिन सिक्के के हमेशा ही दो पहलू होते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के एसओएएस (स्कूल ऑफ ऑरियंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज) चाइना इंस्टीट्यूट की रिसर्चर लॉरेन जॉन्स्टन मानती हैं कि 'न्यू सिल्क रोड' के ज्यादातर सौदे दोनों ही पक्षों के लिए फायदेमंद रहे हैं। वो सरकारें जिन्हें अपने नौजवानों के विकास के लिए या तो नई परियोजनाओं की जरूरत थी या फिर इसके लिए पैसा चाहिए था, भले ही ये चीन से कर्ज लेने की कीमत पर क्यों न हो, इससे जुड़े। इससे होने वाले फायदों का पलड़ा इसके जोखिम के सामने झुक गया, क्योंकि एक गरीब देश और किस तरह से खुद को गरीबी से निजात पा सकता था?'

अब ऐसी रिपोर्टें मिल रही हैं कि कोविड-19 की महामारी के कारण पाकिस्तान, किर्गिस्तान, श्रीलंका समेत कई अफ्रीकी देशों ने चीन ने इस साल कर्ज चुका पाने में असमर्थता जताई है। उन्होंने चीन से कर्ज की शर्तों में बदलाव, किश्त अदायगी के लिए मोहलत या फिर कर्ज माफी मांगी है। 

इन हालात की वजह से चीन धर्म संकट की स्थिति में पड़ गया है। अगर वो कर्ज की शर्तों में बदलाव करता है या कर्ज माफी दे देता है तो इससे उसकी अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा और मुमकिन है कि महामारी की आर्थिक चोट का सामना कर रही चीनी जनता की तरफ से भी नकारात्मक प्रतिक्रिया आए। 

दूसरी तरफ, अगर चीन अपने कर्जदारों पर भुगतान के लिए दबाव डालता है तो उसे अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं का सामना कर पड़ सकता है। ये आलोचनाएं उस तबके की तरफ से ज्यादा आएगी जो पहले से 'न्यू सिल्क रोड' प्रोजेक्ट को 'कर्ज का मकड़जाल' बता रहे थे।  

अनिश्चितता का माहौल

इसी अप्रैल में जी-20 देशों के समूह ने 73 देशों को कर्ज चुकाने से साल 2020 के आखिर तक की राहत देने का एलान किया था। चीन भी इस ग्रुप-20 देशों का हिस्सा है, लेकिन इसके साथ ही ये सवाल उठता है कि कर्ज अदायगी में दी गई इस मोहलत के खत्म होने के बाद क्या होगा? क्या लोन डिफॉल्ट्स ऐसी चीज बन गई है, जिसे अब टाला नहीं जा सकता है। 

लॉरेन जॉन्स्टन कहती हैं, 'ये मालूम नहीं है कि किस देश की आर्थिक स्थिति कैसी है और उनके पास कितने संसाधन उपलब्ध हैं। मैं ये नहीं कहती कि कर्ज का भुगतान करना इन देशों के लिए आसान होगा, लेकिन आज जिस तरह की अनिश्चितता का माहौल है, उसमें सात महीने बाद क्या होगा, कहना बेहद जोखिम का काम है।'

लॉरेन जॉन्स्टन नहीं मानतीं कि चीन इन कर्जों को माफ कर देगा। वो कहती हैं कि दान देना, चीनी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। लेकिन चीन की सरकार के एक सलाहकार ने हाल ही में नाम न जाहिर करने की शर्त पर 'फाइनैंशियल टाइम्स' अखबार से कहा था कि उनका देश कर्ज के ब्याज के भुगतान में राहत देने का विकल्प चुनने जा रहा है और कुछ देशों को दिए गए कर्ज की शर्तों पर बदलाव की इजाजत दी जा सकती है। इस सलाहकार ने 'फाइनैंशियल टाइम्स' अखबार को बताया कि स्थायी रूप से कर्ज माफी आखिरी विकल्प होगा। 

अमेरिका के साथ ट्रेड वॉर

चीन के लिए ये हालात ऐसे दौर में बने हैं जब उसे वुहान से शुरू हुई कोरोना महामारी के लिए उससे जवाब मांगा जा रहा है और ये इल्जाम लगाए जा रहे हैं कि उसने महामारी को ठीक से हैंडल नहीं किया। इतना ही नहीं चीन को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर मिल रही ट्रेड वॉर की धमकियों के दबाव का सामना करना पड़ रहा है और बीबीसी की चीनी सेवा के संपादक होवार्ड चांग ध्यान दिलाते हैं कि इन हालात में राष्ट्रपति शी जिनपिंग को बड़ा झटका लग सकता है। 

होवार्ड चांग कहते हैं, 'महत्वपूर्ण बात ये है कि न्यू सिल्क रोड से जुड़े देशों को दिया गया कर्ज ज्यादातर अमेरिकी डॉलर में है। अमेरिका के साथ ट्रेड वॉर में उलझे चीन को डॉलर की किल्लत खल सकती है। इससे चीन के पास बहुत कम विकल्प रह गए हैं और अगर विकासशील देश कर्ज का भुगतान न कर पाए तो शी जिनपिंग की सत्ता अविश्वसनीय रूप से कमजोर पड़ जाएगी।'

लेकिन 'वन बेल्ट, वन रोड' परियोजना को अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपनी अहम आर्थिक और राजनीतिक उपलब्धि के तौर पर देखते हैं। इस बात की संभावना कम ही है कि वे फिलहाल इस परियोजना से किनारा करने जा रहे हैं। 

रणनीति में बदलाव

इस परियोजना के तहत दिए जाने वाले कर्ज की शर्तों में पारदर्शिता की कमी और वास्तविक फायदों को लेकर चीन को आलोचनाओं का सामना करना पड़ता रहा है। इसी वजह से साल 2019 में शी जिनपिंग ने नई रूप-रेखा के साथ 'न्यू सिल्क रोड' प्रोजेक्ट की घोषणा की, जिसमें उन्होंने अधिक पारदर्शिता का वायदा करते हुए कहा कि अब परियोजनाएं कॉन्ट्रैक्ट्स अंतरराष्ट्रीय मापदंडों के अनुसार तय किए जाएंगे। 
कोरोना महामारी के कारण इनमें से कई परियोजनाएं रुक गई हैं, क्योंकि कई देशों में लॉकडाउन और क्वारंटीन को लेकर दिशानिर्देश लागू हैं। दुनिया जिस तरह से आर्थिक संकट का सामना कर रही है, आने वाले महीनों में इन परियोजनाओं के कोई नतीजे शायद ही सामने आएं जिससे कि चीन को अपने निवेश का वाजिब ठहराने में सहूलियत हो। 

हालांकि ऐसा भी नहीं है कि 'न्यू सिल्क रोड' प्रोजेक्ट अपने अंत की तरफ बढ़ रहा है। बीबीसी की चीनी सेवा के संपादक होवार्ड चांग कहते हैं कि महामारी की वजह से चीन अपनी रणनीति बदल सकता है और अधिक कामयाब परियोजनाओं पर अपना फोकस बढ़ा सकता है। उनका कहना है कि इसके संकेत पहले से ही मिलने लगे हैं कि चीन कुछ परियोजनाओं से आहिस्ता-आहिस्ता कदम वापस खींच रहा है और कुछ अच्छे प्रोजेक्ट्स को ज्यादा तवज्जो दे रहा है। 

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