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कलाकार को पद्मश्री, कला को पहचान : कौन हैं पद्मश्री पाने वाली सुभद्रा देवी और क्या है पेपरमेसी कला, यहां जानें

Thu, 26 Jan 2023 09:18 AM IST
कुमार जितेंद्र ज्योति न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना/मधुबनी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना/मधुबनी Published by: कुमार जितेंद्र ज्योति Updated Thu, 26 Jan 2023 09:18 AM IST
सार

Padma Shree – Award to Bihari : गांव-घर में जो काम आप बचपन में खेलने के लिए करें, अगर उसमें संभावना देखते जाएं तो कितना बड़ा नाम हो सकता है? इसका जवाब है पद्मश्री सुभद्रा देवी। इस स्टोरी में जानते हैं कौन हैं सुभद्रा देवी और क्या है पेपरमेसी?

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Who is Padma Shri recipient from Bihar Subhadra Devi and what is papermesi paper mesi art
90 साल की सुभद्रा देवी अभी दिल्ली में बेटे-बहू के पास रहती हैं। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इस बार बिहार के नाम तीन पद्मश्री पुरस्कार रहे। एक सुपर 30 के विश्व प्रसिद्ध चेहरे आनंद कुमार। बाकी दो ऐसी शख्सियतें, जिनकी चर्चा खास अवसरों पर ही होती थीं। एक हैं सुभद्रा देवी और दूसरे कपिलदेव प्रसाद। बिहार के इन दो बुजुर्ग कलाकारों को जिन कलाओं के लिए पद्मश्री सम्मान मिल रहा, वह कला भी अब पहचानी जाएगी। सुभद्रा देवी को पेपरमेसी कला के लिए, जबकि कपिलदेव प्रसाद को बावन बूटी के लिए पद्मश्री मिला है। पहली बार इन दोनों विधाओं को पद्मश्री की घोषणा से इनकी अलग तरह की पहचान विकसित होगी। इस स्टोरी में जानते हैं कौन हैं सुभद्रा देवी और क्या है पेपरमेसी?

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पेपरमेसी आर्ट का एक नमूना। - फोटो : Social Media

बचपन में जिससे खेलती थीं, 90 साल तक वही कला पहचान
गांव-घर में जो काम आप बचपन में खेलने के लिए करें, अगर उसमें संभावना देखते जाएं तो कितना बड़ा नाम हो सकता है? इसका जवाब है सुभद्रा देवी। सुभद्रा देवी को पेपरमेसी के लिए पद्मश्री मिला है। पेपरमेसी मूल रूप से जम्मू-कश्मीर की कला के रूप में प्रसिद्ध है, लेकिन सुभद्रा देवी ने बचपन में इस कला से खेला करती थीं। सबसे पहले यह जानना रोचक है कि पेपरमेसी होता क्या है? दरअसल, कागज को पानी में गलाकर उसे रेशे के लुगदी के रूप में तैयार करना और फिर नीना थोथा व गोंद मिलाकर उसे पेस्ट की तरह बनाते हुए उससे कलाकृतियां तैयार करना पेपरमेसी कला है। सुभद्रा देवी दरभंगा के मनीगाछी से ब्याह कर मधुबनी के सलेमपुर पहुंचीं तो भी इस कला से खेलना नहीं छोड़ा। आज जब पद्मश्री की घोषणा हुईं तो करीब 90 साल की सुभद्रा देवी दिल्ली में बेटे-पतोहू के पास हैं। घर से इतनी दूरी के बावजूद वह पेपरमेसी से दूर नहीं गई हैं। वहां से भी इस कला के विस्तार की हर संभावना देखती हैं। बड़े मंचों तक इसे पहुंचाने की जद्दोजहद में रहती हैं। 

ऐसे कलाकारों को पुरस्कार से कला का प्रभाव बढ़ता है
भोली-भाली सूरत और सरल स्वभाव की मालकिन सुभद्रा देवी को वर्ष 1980 में राज्य पुरस्कार और 1991 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। पेपरमेसी से मुखौटे, खिलौने, मूर्तियां, की-रिंग, पशु-पक्षी, ज्वेलरी और मॉडर्न आर्ट की कलाकृतियां बनाई जाती हैं। इसके अलावा अब प्लेट, कटोरी, ट्रे समेत काम का आइटम भी पेपरमेसी से बनता है। पेपरमेसी कलाकृतियों को आकर्षक रूप के कारण लोग महंगे दामों पर भी खरीदने को तैयार रहते हैं। पहली बार इस कला को बढ़ावा देने वाले किसी कलाकार के नाम पद्मश्री की घोषणा हुई तो कला और फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम ने कहा- “ऐसी कलाओं के कलाकार को पुरस्कार या सम्मान की घोषणा से अचानक उस कला की भी झूमकर चर्चा होने लगती है। यह चर्चा बनी रहे और इस सम्मान के जरिए भी इस कला का विस्तार हो तो निश्चित रूप से यह बिहार के लिए और भी बड़ी बात होगी।”

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