{"_id":"9cd39571eab2603fe465bc1ecb575cd7","slug":"upa-and-congress-are-constraint-to-alliance-with-lalu","type":"story","status":"publish","title_hn":"यूपीए-कांग्रेस की मजबूरी है, लालू यादव जरूरी हैं?","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
यूपीए-कांग्रेस की मजबूरी है, लालू यादव जरूरी हैं?
Updated Sat, 21 Dec 2013 01:57 PM IST
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लालू यादव के बोलने के कौशल, लोगों के साथ जुडने की क्षमता और दुश्मन के शिविर में घुस कर हमला करने के सहज भाव ने ही उन्हें, मुश्किलों से घिरी हुई कांग्रेस के लिए एक अमूल्य सहयोगी बना दिया है।
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लालू यादव भले ही चुनाव लडने के योग्य न हों लेकिन अगर वह उत्तर भारत में प्रचार कर पाते हैं तो इस क्षेत्र से लगभग खत्म हो चुकी यूपीए में कुछ जान आ सकती है।
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सितंबर में सीबीआई अदालत द्वारा चारा घोटाले में दोषी पाए जाने के बाद छपे एक विश्लेषण का शीर्षक था 'लालू के जाने के बाद, यूपीए और बीजेपी में बिहार के लिए घमासान'।
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लालू के तीन बयान
उस समय लालू को 'अतीत' मान लेना जल्दबाजी थी। रांची की जेल से निकलने के तुरंत बाद राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू यादव ने तीन महत्वपूर्ण बयान दिये।
पहला, उन्होंने मीडिया को ये जानकारी दी कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बाद उनसे फोन पर बात कर खुशी जाहिर की।
दूसरा, उन्होंने दोहराया कि एक अच्छे प्रधानमंत्री बनने के लिए जरूरी सभी गुण राहुल गांधी में मौजूद हैं। और अंत में उन्होंने घोषणा की कि बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के प्रभाव को रोकने के लिए वो जो कुछ कर सकते हैं वो सब कुछ करेंगे।
इस सबके बाद राजनीति विशेषज्ञ उन्हें 'चुका हुआ मान लेने' की अपनी बात पर पछता रहे हैं।
चारा घोटाले में दोषी पाए जाने के बाद लालू यादव को जेल भेज दिया गया था और अब दो महीने बाद वो जेल से वापस लौटे हैं। हांलाकि वह जमानत पर जेल से रिहा हुए हैं और उनके खिलाफ दूसरे कई मामले भी चल रहे हैं। लेकिन वो बिना संघर्ष किये हार मानने वाले नहीं हैं।
यदि मीडिया में आई खबरों पर विश्वास करें तो उन्होंने इन परिणामों को पूर्वानुमान बताया और सुनिश्चित किया कि उनकी तीन बेटियों की शादी पिछले साल हो।
उन्होंने ये उम्मीद भी जताई कि यूपीए उनका बचाव करेगी और सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2013 में दिये गए फैसले को बदलने के लिए विधेयक लाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला दिया था कि दोषी पाए गए सासंदों और विधायकों को अपनी सीट छोडनी पडेगी और वे अगले छह साल तक चुनाव लडने के अयोग्य होंगे।
ऐसा कहा जा रहा है कि लालू ने यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को फोन कर इस फैसले को पलटने वाले विधेयक को जल्द लागू करने को सुनिश्चित करने का आग्रह किया।
राहुल का बयान
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के देश से बाहर एक बैठक में भाग लेकर जाने के से पहले इस विधेयक के मसौदे पर कैबिनेट की मंजूरी मिल गई थी।
लेकिन उसके बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा एक प्रेस कांफ्रेंस में इस बिल को 'पूरी तरह से बकवास' करार देने और फेंकने की घोषणा कर देने की चर्चित घटना हो गई थी।
इस घटना ने उस समय यूपीए में काफी हलचल पैदा की थी और इसे कैबिनेट व प्रधानमंत्री के लिए एक झिडकी देने की तरह देखा गया था।
सभी संभावनाओं के पार, इसे सोनिया गांधी के लिए भी एक झिडकी की तरह ही माना गया था क्योंकि ये तय है कि इस बिल को कैबिनेट में उनकी सहमति के बिना मंजूरी नहीं मिल सकती थी।
राहुल के इस बयान के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को शर्मिंदा होना पडा था और एक 'दब्बू' कैबिनेट को ये बिल वापस लेने पर मजबूर होना पडा था।
इसलिए लालू यादव और राहुल गांधी के बीच एक असहज संबंध प्रतीत होता है।
कांग्रेस उपाध्यक्ष को ये लगता है कि कांग्रेस को राजद के साथ गठजोड कर मुसीबत झेलनी पडी है और काफी हद तक वो सही भी हैं क्योंकि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कांग्रेस को मजबूत क्षेत्रीय पार्टियों से दबना पडा है।
दागी नेताओं को साथ जोडने पर भी उन्हें दिक्कत हो सकती है लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने हमेशा ही लालू यादव का पक्ष लिया है और उनक साथ सोनिया गांधी काफी सहज लगती हैं।
बडा मतदाता वर्ग
इसके अलावा लालू यादव भी अब ये दावा कर सकते हैं कि कांग्रेस के साथ उनके 'पारिवारिक रिश्ते' हैं। उनकी एक बेटी की शादी हरियाणा के बिजली मंत्री अजय सिंह यादव से हुई है जबकि उनकी दूसरी बेटी की शादी गाजियाबाद से समाजवादी पार्टी के विधायक जितेंद्र यादव से हुई है। जितेंद्र यादव हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले को दरकिनार करने के प्रयास में लालू यादव भारत के पहले ऐसे सांसद बन गए जिन्हें दोषी होने के कारण लोकसभा में अपनी सीट गंवानी पडी। शीर्ष कोर्ट द्वारा निर्धारित कानून के अनुसार वो छह साल तक चुनाव लडने के भी अयोग्य हो गए।
लेकिन जब राजनीतिक पंडितों ने ये मान लिया था कि लालू यादव के लिए सभी रास्ते बंद हो चुके हैं और तब बिहार की आबादी में 16 प्रतिशत यादव आबादी पर प्रभाव रखने वाले लालू के लिए सहानुभूति और समर्थन का रेला उठ खडा हुआ था।
राजनीति बाचने वालों ने लालू यादव के अंत की घोषणा करने में ज़रा देर नहीं लगाई लेकिन उन्हें इस बात का ज़रा भी गुमान नहीं था कि लालू यादव के लिए उनी अपनी जाती में समर्थन और सहानुभूति का रेला उठ खड़ा होगा। यादव समाज ना केवल बिहार की कुल जनसंख्या का करीब 16 फ़ीसदी है बल्कि समृद्ध और वाचाल भी है।
ये एक सोच है कि लालू यादव इस समुदाय में व्यापक तौर पर फैले 'संदिग्ध व्यक्तियों' में से एक थे। अब जबकि इस समुदाय को हर जगह भ्रष्टाचार दिखता है और लोग इसके आरोपों से बच निकलते हैं। ऐसे में अधिकतर लोगों को लालू के खिलाफ लिया गया ये फैसला 'न्याय की भूल' की तरह और एक समुदाय विशेष के खिलाफ लिया गया निर्णय लगता है।
कुछ चुनिंदा मामलों में सजा और साख का मसला नहीं होता और ये एक तथ्य है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) भ्रष्टाचार विरोधी चालीस प्रतिशत से ज्यादा मामलों में दोष सिद्ध करने में असफल रहती है।
मोदी को रोकने के लिए कुछ भी
अब लालू यादव जमानत पर बाहर हैं और 'धर्मनिरपेक्ष ताकतों' का प्रचार करने के लिए स्वतंत्र हैं। बिहार में बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के लिए पिच बन चुकी है।
लालू यादव की धर्मनिरपेक्षता के दावों और विश्वसनीयता के बारे में कोई कुछ भी सोचे लेकिन अपनी विरोधी बीजेपी के लिए वे एक रोडा रहे हैं।
इसलिए उनका ये कहना कि नरेंद्र मोदी के अथक मार्च को रोकने के लिए लिए वो सब कुछ कर करेंगे, आश्चर्यजनक नहीं है।
अगर लालू यादव यादवों और मुस्लिमों को अपनी ओर खींचने में सफल रहते हैं तो ऐसा लगता है कि कांग्रेस के लिए अगले चुनावों में राजद के साथ गठबंधन करना राहत भरा साबित होगा।
वास्तव में कांग्रेस के पास इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है क्योंकि नीतीश कुमार की जेडीयू के पास एक संकीर्ण जातिगत आधार है और लोकसभा चुनावों में अपनी पार्टी के लिए समर्थन हासिल करना मुश्किल होगा।
अगले विधानसभा चुनावों के लिए भी वो लोगों की पहली पसंद हो सकते हैं लेकिन लोकसभा चुनावों में 30 प्रतिशत यादव और मुस्लिम मतदाता, मोदी के प्रभाव को कम करने के लिए इस 'धर्मनिरपेक्ष गठबंधन' को पर्याप्त गति प्रदान कर सकते हैं।
लालू खुद चुनाव लडने में भले ही असमर्थ हों लेकिन यूपीए की राजनीतिक रैलियों में एक मुख्य वक्ता के तौर पर उनकी बहुत मांग होगी।
बिहार में कांग्रेस-आरजेडी-लोजपा का गठबंधन तय
कांग्रेस के पास हिंदी भाषी अच्छे वक्ताओं की कमी है लेकिन असंगत पर लोगों को बडे स्तर पर प्रभावित करने वाले लालू यादव उत्तरी क्षेत्र में मुश्किलों से घिरे इस गठबंधन के बहुत काम आएंगे। अब देखना ये है कि लालू यादव खुद को बिहार तक ही सीमित रखेंगे या देश के दूसरे हिस्सों में भी जाएंगे।
लालू के हिसाब से कांग्रेस और यूपीए दोनों को ही अपने अस्तित्व के लिए राजद की जरूरत है और इसलिए उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता कायम है।
बीजेपी या कांग्रेस को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में यदि कोई तीसरा 'धर्मनिरपेक्ष' तीसरा फ्रंट कांग्रेस के समर्थन से आकार लेता है तो निसंदेह केंद्र में सरकार बनाने में लालू की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।