'बीस साल तक शराब पी, अब एकदम छुड़वा दी..ये कोई बात है'
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“मान लीजिए अभी पटना में पचास शराब की दुकानें थीं, तो सरकार उनकी तादाद पहले पच्चीस करती। पीने वालों को परेशानी होती तो वे नशे से दूर होते। एकबारगी बंद होने से लोग साबुन खाने लगे हैं, शरीर में आग लगाने लगे हैं। मेरे बेटे ने भी अपने शरीर में आग लगाने की कोशिश की थी।’’
यह आपबीती है वहीदा की, उनका बेटा इमरान पटना में नशामुक्ति केंद्र में भर्ती है। इमरान को शराब पीने की लत है, लेकिन अचानक किए गए पूर्ण शराबबंदी के फ़ैसले के बाद उन्हें मुश्किल हो रही है।
इमरान के अनुसार शराब की बिक्री धीरे-धीरे बंद करनी चाहिए थी, ऐसा होता तो हंगामा नहीं होता। बिहार में पांच अप्रैल से पूर्ण शराबबंदी लागू है। देसी शराब पर तो एक अप्रैल से ही रोक लगा दी गई थी लेकिन पूर्ण शराबबंदी का फ़ैसला अचानक लिया गया।
पटना के रहने वाले गया सिंह पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल में काम करते हैं, नशामुक्ति केंद्र में गया सिंह की पत्नी अनीता उनकी देखभाल कर रही हैं। गया सिंह के मुताबिक़ अचानक लिया गया पूर्ण शराबबंदी का फ़ैसला सही है, लेकिन अनीता इससे अलग राय रखती हैं।
धीरे धीरे लागू होना चाहिए था शराबबंदी का फैसला
अनीता कहती हैं, "देसी बंद होने के बाद कई लोग अंग्रेज़ी शराब पीने लगे थे, ऐसे में पूर्ण शराबबंदी की भी पहले से सूचना रहती तो अंग्रेज़ी पीने वाले भी अपने आप को तैयार करते।"
इलाज करवा रहे क़रीब 45 साल के सुनील कुमार को क़रीब बीस सालों से शराब की लत थी। सुनील भी एकबारगी शराबबंदी लागू किए जाने के फ़ैसले को सही नहीं मानते, उनका मानना है, ‘‘धीरे-धीरे बंद करना चाहिए था। बहुत सारे ऐसे होते हैं जो एक झटके से नहीं छोड़ सकते, ऐसा होने पर वे कुछ भी कर बैठते हैं।
धीरे-धीरे शराबबंदी होती तो पीने वाले ज्यादा आसानी से अपनी आदत छोड़ते।’’ वहीं पड़ोस के ज़िले से केंद्र पर पहुंचे बबलू चैधरी ने सरकार के फ़ैसले को बिल्कुल सही बताया है। उनका कहना है, ‘‘झटके के साथ बंद किया जाना ठीक है। बर्बादी और नुक़सान नहीं होगा।’’
वहीं डॉक्टर संतोष कुमार पेशे से मनोचिकित्सक हैं, वे पटना के अगमकुंआ स्थित स्टेट डी-एडिक्शन रेफ़रल सेंटर के नोडल अफ़सर भी हैं। संतोष का साफ़-साफ़ कहना है कि मेडिकल साइंस के लिहाज़ से सरकार ने पूर्ण शराबबंदी का फ़ैसला करने में कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई है।
चिकित्सकों को मानना एकदम शराब छोड़ने में भी कोई दिक्कत नहीं
पटना के जाने-माने मनोचिकित्सक डॉक्टर विनय कुमार भी इससे इत्तेफ़ाक़ रखते हैं। जिसे शराब छोड़ना है, उसे एकबारगी ही छोड़ना पड़ता है। लेकिन वे एक दूसरी समस्या के बारे में बताते हुए कहते हैं, "बीते क़रीब दस सालों में सरकार ने शराब को बहुत ज़्यादा बढ़ावा दिया।
ऐसे में अचानक शराबबंदी करने से ‘विदड्रॉल सिम्पटम’ के मरीज़ों की संख्या बहुत ज़्यादा सामने आ रही है।" विनय के मुताबिक़ दुनिया में नशाख़ोरी पर क़ाबू पाने के दो मॉडल हैं, एक सप्लाई रिडक्शन यानी क़ीमतें बढ़ाना और डिमांड रिडक्शन यानी इसके ख़िलाफ़ जागरुकता फैलाना। विनय कहते हैं, "सरकार को इन दो मॉडल्स को क्रमवार तरीक़े से ज़मीन पर उतारते हुए पूर्ण शराबबंदी की ओर बढ़ना चाहिए था।"
वहीं नशामुक्ति के मुद्दे पर काम करने वाले दीपक कहते हैं, "लोगों को मानसिक रूप से तैयार होने का समय मिलता तो इस फ़ैसले के ज़्यादा बेहतर नतीजे सामने आते।" ज़ाहिर है मरीज़ों के तरह विशेषज्ञों की राय भी शराबबंदी की तरह अलग अलग है।
(सभी रोगियों और उनके रिश्तेदारों के नाम बदले हुए हैं।)