बिहार: 36 घंटे प्रसव पीड़ा में तड़पती रही HIV रिएक्टिव प्रसूता, सदर अस्पताल की व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
सीवान के मॉडल सदर अस्पताल में एचआईवी रिएक्टिव प्रसूता को समय पर इलाज और सिजेरियन नहीं मिलने के आरोप ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बसंतपुर प्रखंड की रहने वाली आर्थिक रूप से कमजोर महिला करीब 36 घंटे तक प्रसव पीड़ा में रही।
विस्तार
सीवान के मॉडल सदर अस्पताल में स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। बसंतपुर प्रखंड के एक गांव की एचआईवी रिएक्टिव प्रसूता करीब 36 घंटे तक प्रसव पीड़ा से तड़पती रही। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के पास निजी अस्पताल में सिजेरियन कराने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे। ऐसे में परिजन सरकारी अस्पताल में बेहतर और समय पर इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचे थे, लेकिन आरोप है कि प्रसूता का समय पर ऑपरेशन नहीं हो सका।
मामला रविवार देर शाम का बताया जा रहा है। आरोप है कि महिला वार्ड में तैनात स्वास्थ्यकर्मियों ने प्रसूता और उसके परिजनों को परेशान किया और उन्हें अस्पताल से चले जाने के लिए कहा। इसके बाद मजबूर होकर परिजन प्रसूता को एक झोलाछाप चिकित्सक के पास ले गए। इसके बाद परिजनों का मोबाइल फोन बंद हो गया। पूरे घटनाक्रम ने सदर अस्पताल में मरीजों के साथ होने वाले व्यवहार और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अधिकारियों तक पहुंची थी मामले की जानकारी
बताया जा रहा है कि प्रसूता की हालत और इलाज में हो रही देरी की जानकारी अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के कई अधिकारियों तक पहुंची थी। सिविल सर्जन डॉ. श्रीनिवास प्रसाद, जिला एड्स नियंत्रण पदाधिकारी डॉ. अशोक कुमार और सदर अस्पताल अधीक्षक डॉ. अनिल कुमार सिंह को भी मामले की जानकारी दिए जाने की बात सामने आई है। इसके बाद प्रसूता को वार्ड में बेड उपलब्ध कराया गया और उसका इलाज शुरू किया गया। हालांकि, आरोप है कि प्रसव के लिए जरूरी और निर्णायक कदम समय पर नहीं उठाया जा सका।
अल्ट्रासाउंड में गर्भ में पानी की मात्रा 10.20 सेंटीमीटर
जानकारी के मुताबिक, प्रसूता का अल्ट्रासाउंड कराया गया था। इसमें गर्भ में पानी की मात्रा 10.20 सेंटीमीटर बताई गई थी। बाद में परिजनों को बताया गया कि पानी का रिसाव होने के कारण यह मात्रा करीब पांच सेंटीमीटर रह गई है।
HIV रिएक्टिव होने से मामला और गंभीर
यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि प्रसूता एचआईवी रिएक्टिव थी। ऐसी स्थिति में सुरक्षित प्रसव कराने और नवजात को संक्रमण से बचाने के लिए समय पर चिकित्सकीय प्रबंधन बेहद जरूरी होता है। इसके बावजूद अगर प्रसव के लिए जरूरी उपचार और ऑपरेशन में देरी हुई है तो यह सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। घटना ने एचआईवी रिएक्टिव गर्भवती महिलाओं के लिए सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध सुविधाओं और उनके जमीनी स्तर पर लागू होने को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है।
झोलाछाप चिकित्सक के पास ले जाने को मजबूर हुए परिजन
परिजनों का आरोप है कि जब अस्पताल में समय पर ऑपरेशन की व्यवस्था नहीं हुई और उन्हें महिला वार्ड से जाने के लिए कहा गया, तो उनके सामने कोई आसान विकल्प नहीं था। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वे निजी अस्पताल में सिजेरियन कराने की स्थिति में भी नहीं थे। आखिरकार वे प्रसूता को एक झोलाछाप चिकित्सक के पास लेकर चले गए। इसके बाद परिजनों का मोबाइल फोन बंद हो गया और महिला की आगे की स्थिति को लेकर तत्काल कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आ सकी।