बिहार में अकेले चुनाव लड़ेगी समाजवादी पार्टी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बिहार में चुनाव से पहले ही राजद-जेडीयू के महागठबंधन को सपा ने बड़ा झटका दे दिया है। गठबंधन में कम सीटें मिलने से नाराज सपा ने अलग होते हुए अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है।
समाजवादी पार्टी के इस कदम से बिहार चुनाव में भाजपा गठबंधन की मुश्किल चुनौती से पार पाने के प्रयास में लगी लालू-नीतीश की जोड़ी को बड़ा झटका लगा है।
मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी बेशक राजनीतिक दल के रूप में बिहार में खास रसूख न रखती हो लेकिन यादव वोटरों पर मुलायम की मजबूत पकड़ से भी कोई इंकार नहीं कर सकता। ऐसे में चुनाव से ऐन पहले सपा के महागठबंधन से अलग होने वाले नुकसान की भरपाई करना लालू नीतीश की जोड़ी के लिए आसान नहीं होगा।
सीटों के बंटवारे में नहीं रखा गया ध्यान
समाजवादी पार्टी के इस कदम के पीछे ज्यादा सीटों पर पार्टी के चुनाव लड़ने की इच्छा से ज्यादा लालू नीतीश की वो छोटी सी गलती है जो उनके उस महागठबंधन पर ही भारी पड़ गई जिसके बल पर वो बिहार चुनाव में जीत का दम भर रहे हैं।
दोनों की पहली गलती तो ये रही कि जनता परिवार के विलय के दौरान जिस पार्टी के मुखिया को ही सर्वसम्मति से जनता परिवार का मुखिया मान लिया गया हो उसे चुनाव में सीटों का बंटवारा करते समय बिल्कुल तवज्जो नहीं दी गई।
इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि महागठबंधन में जब सीटों के बंटवारे की घोषणा हुई उस समय लालू नीतीश ने खुद 100-100 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया और कांग्रेस के लिए 40 और एनसीपी के लिए तीन सीटें छोड़ी गईं लेकिन सपा का कहीं कोई जिक्र भी नहीं किया गया।
समाजवादी पार्टी को विधानसभा चुनाव में इस कदर गैरजरूरी माना गया कि सीटों का बंटवारा करते समय मुलायम सिंह से सलाह करना जरूरी भी नहीं समझा गया। इस बात की टीस लखनऊ में सपा की प्रेस कान्फ्रेंस में पार्टी महाससचिव रामगोपाल की बातों में भी दिखी।
एनसीपी के अलग होने के बाद भी नहीं सुधारी गलती
दूसरी गलती तब हुई जब एनसीपी के कम सीट मिलने की बात पर महागठबंधन से अलग होने के बाद भी समाजवादी पार्टी को मात्र पांच सीटें ही दी गईं, जिसमें से तीन सीटें तो एनसीपी की ठुकराई हुई थी। दो सीटें लालू यादव ने रिश्तेदारी निभाते हुए अपने कोटे की छोड़ दी।
जबकि बिहार में जनाधार के मामले में समाजवादी पार्टी के बराबर ही मानी जा रही कांग्रेस के लिए 40 सीटें छोड़ दी गईं। यह हाल तब था जब 2010 में बिहार की सभी सीटों पर लड़ने वाली कांग्रेस मात्र चार सीटें ही जीत सकी थी।
ऐसे में अगर कांग्रेस के कोटे की कुछ सीटें एडजस्ट कर सपा को दे दी जाती तो महागठबंधन के साथ साथ जनता परिवार पर भी प्रश्नचिन्ह लगने से बच जाता।
समाजवादी पार्टी के प्रति बेतकल्लुफी इन दोनों नेताओं को ही भारी पड़ गई। सपा के गठबंधन से हटने से बेशक सीटों के गणित में कुछ ज्यादा फर्क न पड़े लेकिन विरोधियों को नैतिक रूप से महागठबंधन पर दबाव बनाने का मौका जरूर मिल गया है।