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बिहार में अकेले चुनाव लड़ेगी समाजवादी पार्टी

Thu, 03 Sep 2015 04:01 PM IST
Updated Thu, 03 Sep 2015 04:01 PM IST
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Samajwadi party left the janta pariwar, SP separate contest Bihar elections

बिहार में चुनाव से पहले ही राजद-जेडीयू के महागठबंधन को सपा ने बड़ा झटका दे दिया है। गठबंधन में कम सीटें मिलने से नाराज सपा ने अलग होते हुए अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है।

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समाजवादी पार्टी के इस कदम से बिहार चुनाव में भाजपा गठबंधन की मुश्किल चुनौती से पार पाने के प्रयास में लगी लालू-नीतीश की जोड़ी को बड़ा झटका लगा है।

मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी बेशक राजनीतिक दल के रूप में बिहार में खास रसूख न रखती हो लेकिन यादव वोटरों पर मुलायम की मजबूत पकड़ से भी कोई इंकार नहीं कर सकता। ऐसे में चुनाव से ऐन पहले सपा के महागठबंधन से अलग होने वाले नुकसान की भरपाई करना लालू नीतीश की जोड़ी के लिए आसान नहीं होगा।
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सीटों के बंटवारे में नहीं रखा गया ध्यान

Samajwadi party left the janta pariwar, SP separate contest Bihar elections

समाजवादी पार्टी के इस कदम के पीछे ज्यादा सीटों पर पार्टी के चुनाव लड़ने की इच्छा से ज्यादा लालू नीतीश की वो छोटी सी गलती है जो उनके उस महागठबंधन पर ही भारी पड़ गई जिसके बल पर वो बिहार चुनाव में जीत का दम भर रहे हैं।

दोनों की पहली गलती तो ये रही कि जनता परिवार के विलय के दौरान जिस पार्टी के मुखिया को ही सर्वसम्मति से जनता परिवार का मुखिया मान लिया गया हो उसे चुनाव में सीटों का बंटवारा करते समय बिल्कुल तवज्जो नहीं दी गई।

इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि महागठबंधन में जब सीटों के बंटवारे की घोषणा हुई उस समय लालू नीतीश ने खुद 100-100 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया और कांग्रेस के लिए 40 और एनसीपी के लिए तीन सीटें छोड़ी गईं लेकिन सपा का कहीं कोई जिक्र भी नहीं किया गया।

समाजवादी पार्टी  को विधानसभा चुनाव में इस कदर गैरजरूरी माना गया कि सीटों का बंटवारा करते समय मुलायम सिंह से सलाह करना जरूरी भी नहीं समझा गया। इस बात की टीस लखनऊ में सपा की प्रेस कान्फ्रेंस में पार्टी महाससचिव रामगोपाल की बातों में भी दिखी।

एनसीपी के अलग होने के बाद भी नहीं सुधारी गलती

Samajwadi party left the janta pariwar, SP separate contest Bihar elections

दूसरी गलती तब हुई जब एनसीपी के कम सीट मिलने की बात पर महागठबंधन से अलग होने के बाद भी समाजवादी पार्टी को मात्र पांच सीटें ही दी गईं, जिसमें से तीन सीटें तो एनसीपी की ठुकराई हुई थी। दो सीटें लालू यादव ने रिश्तेदारी निभाते हुए अपने कोटे की छोड़ दी।

जबकि बिहार में जनाधार के मामले में समाजवादी पार्टी के बराबर ही मानी जा रही कांग्रेस के लिए 40 सीटें छोड़ दी गईं। यह हाल तब था जब 2010 में बिहार की सभी सीटों पर लड़ने वाली कांग्रेस मात्र चार सीटें ही जीत सकी थी।

ऐसे में अगर कांग्रेस के कोटे की कुछ सीटें एडजस्ट कर सपा को दे दी जाती तो महागठबंधन के साथ साथ जनता परिवार पर भी प्रश्नचिन्ह लगने से बच जाता।

समाजवादी पार्टी  के प्रति बेतकल्लुफी इन दोनों नेताओं को ही भारी पड़ गई। सपा के गठबंधन से हटने से बेशक सीटों के गणित में कुछ ज्यादा फर्क न पड़े लेकिन विरोधियों को नैतिक रूप से महागठबंधन पर दबाव बनाने का मौका जरूर मिल गया है।

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