नीतीश की जीत में ये हैं असली हीरो, मोदी भी थे इनके मुरीद
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लोकसभा चुनावों के प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने किस कार्यक्रम से आम जनता के बीच तेजी से जगह बनाई अगर यह सवाल राजनीति की समझ रखने वाले किसी भी व्यक्ति से किया जाए तो उसका सीधा सा जवाब होगा चाय पे चर्चा।
चाय पे चर्चा ही ऐसा कार्यक्रम था जिससे मोदी ने अपनी चाय वाले की छवि को भुनाते हुए आम आदमी के दिल तक पहुंचाया। हालांकि बिहार चुनावों में महागठबंधन की जीत के शोर के बीच अगर अब इस बात का जिक्र दोबारा आए तो सुनने में पहली बार में ये बेशक अटपटा लग सकता है लेकिन कम ही लोग जानते होंगे कि बिहार में नीतीश कुमार की इस जीत के पीछे भी मोदी कनेक्शन ही है।
बिहार में नीतीश की जीत की राह तय करने में उसी प्रशांत किशोर का दिमाग लगा है, जिसके दिमाग से चाय पे चर्चा का आइडिया निकला था। बिहार के इसी आईटी प्रोफेशनल ने लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी के उसी प्रचार अभियान की कमान संभाली थी जिसके बारे में कहा जाता है कि देश में पहली बार चुनावों के दौरान इतने हाइटेक प्रचार का प्रयोग किया गया।
प्रशांत की सलाह पर नीतीश ने लपका डीएनए का मुद्दा
लोक स्वास्थ्य मामलों के विशेषज्ञ के तौर पर संयुक्त राष्ट्र में काम कर चुके प्रशांत किशोर की प्रतिभा को नीतीश कुमार अच्छी तरह पहचान चुके थे। इसलिए विधानसभा चुनावों से पूर्व ही उन्होंने बिहारी अस्मिता के नाम पर प्रशांत किशोर को अपने पाले में करने में देर नहीं की।
मोदी के लिए चाय पे चर्चा और थ्रीडी होलोग्राम जैसे हाइटेक प्रचार अभियान की शुरूआत करने वाले प्रशांत ने बिहार चुनावों के दौरान भी नीतीश के लिए उसी हाइटेक अंदाज में प्रचार की शुरूआत की। ये प्रशांत का ही तेज दिमाग था कि प्रधानमंत्री मोदी ने जब गया की रैली में नीतीश के पॉलीटिकल डीएनए पर सवाल उठाया तो उसे लपकने में प्रशांत ने जरा भी देरी नहीं की और उसे बिहारी अस्मिता से जोड़ दिया।
नीतीश ने भी उसे हाथों-हाथ मुद्दा बनाते हुए 50 लाख बिहारियों के डीएनए सैंपल प्रधानमंत्री मोदी को भेजने जैसे थोडे अटपटे लगने वाले कदम का ऐलान कर दिया। लोगों को बेशक ये कदम गैरजरूरी लगा हो लेकिन इसके पीछे सीधे सीधे मंशा आम बिहारी से खुद को जोड़ने और भाजपा के सबसे बड़े सितारे प्रधामनंत्री मोदी के खिलाफ माहौल तैयार करने की थी। जिसमें वह काफी हद तक कामयाब भी रहे।
प्रचार के मास्टर माने जाते हैं प्रशांत किशोर
37 साल के प्रशांत ने मोदी के प्रचार अभियान के दौरान 60 अन्य पेशेवरों के साथ मिलकर सिटिजन फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस (CAG) बनाया था। जिसका मकसद मोदी के लिए वोट जुटाना और सामाजिक मुद्दों का समाधान करना था।
बिहार विधानसभा चुनावों में नीतीश कुमार के प्रचार के हर मोर्चे पर प्रशांत के विजन की झलक दिखाई दी। जैसे विभिन्न नारे और स्लोगन लिखे बैनरों और पोस्टर। यहां तक की उनके रंग और डिजाइन पर भी इतनी बारीकी से ध्यान दिया गया कि वो उससे भी एक संदेश छोड़ते दिखें।
बताते हैं कि लोकसभा चुनावों के बाद अमित शाह की ताजपोशी के बाद से ही प्रशांत किशोर की उनसे अनबन होनी शुरू हो गई थी। जिसके बाद वह भी सही मौके की तलाश में थे, जो उन्होंने नीतीश ने दिया। सोशल मीडिया के मास्टर कहे जाने वाले प्रशांत लोकसभा चुनावों में इसकी ताकत अच्छी तरह पहचान चुके थे।
यही कारण था कि आमतौर पर ट्विटर और फेशबुक से दूर रहने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधानसभा चुनावों के दौरान आम आदमी तक अपनी अवाज पहुंचाने के लिए इसे एक बेहतर माध्यम के तौर पर इस्तेमाल किया।
चुटकियों में निपटा दिया था सीट बंटवारे का मामला
प्रशांत पर नीतीश कुमार के भरोसे का आलम ये है कि चुनावों में जीत से पहले ही सीएम आवाज में उनके लिए अलग से दफ्तर बनाने की कवायद शुरू कर दी गई थी। चुनावों के दौरान भी उन्होंने सीएम आवास से सारा काम संभाले रखा था।
बताया जाता है कि किशोर ने इस बात जोर डाला कि जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहिए और नीतीश कुमार को फिर से मुख्यमंत्री बनना चाहिए। इसके बाद किशोर ने अगले छह महीने में नीतीश कुमार को न केवल पार्टी के चेहरे के तौर पर प्रचारित किया बल्कि सरकार, सुशासन, विकास और बिहार की ऐसी ब्रैंडिंग की कि लोकसभा चुनावों में निराशाजनक हार के बाद सीएम की गद्दी छोड़ने वाला नेता लोकप्रियता के मामले में सीधे प्रधानमंत्री को टक्कर देता दिखा।
चुनावों के दौरान प्रशांत ने नीतीश के लिए घर घर दस्तक जैसा महीन कार्यक्रम शुरू किया जिससे लोगों के दिमाग में नीतीश की सुशासन वाली छवि दोबारा बैठी और लोगों का सरकार के प्रति फीडबैक और उनकी जरूरतों का पता भी सरकार को लग सका।