बिहार: पति का नाम होने पर भी जाति प्रमाणपत्र मान्य, पटना हाईकोर्ट का महिला अभ्यर्थी को नियुक्ति का आदेश
पटना हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि विवाहित महिला के जाति प्रमाणपत्र में पिता की जगह पति का नाम दर्ज होने से प्रमाणपत्र अमान्य नहीं माना जा सकता।
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विवाहित महिला अभ्यर्थियों के आरक्षण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जाति प्रमाणपत्र में पिता की जगह पति का नाम दर्ज होने से प्रमाणपत्र अमान्य नहीं हो जाता। अदालत ने कहा कि जाति का निर्धारण जन्म के आधार पर होता है और प्रमाणपत्र केवल इसकी पुष्टि करने वाला दस्तावेज है। न्यायालय ने बिहार लोक सेवा आयोग (बीपीएससी) की अपील खारिज करते हुए अनुसूचित जाति महिला वर्ग की अभ्यर्थी डॉ. सुषमा शरण को सहायक प्राध्यापक पद पर नियुक्त करने का निर्देश दिया है।
बीपीएससी की अपील खारिज, नियुक्ति का निर्देश
न्यायाधीश मोहित कुमार शाह और न्यायाधीश सौरेंद्र पांडेय की खंडपीठ ने एकलपीठ के पूर्व फैसले को सही ठहराते हुए बिहार लोक सेवा आयोग की अपील खारिज कर दी। अदालत ने आयोग को निर्देश दिया कि वह डॉ. सुषमा शरण को अनुसूचित जाति आरक्षण के आधार पर सहायक प्राध्यापक पद पर तत्काल नियुक्ति प्रदान करे। खंडपीठ ने कहा कि जब भर्ती के मूल विज्ञापन में जाति प्रमाणपत्र पर पिता का नाम दर्ज होना अनिवार्य नहीं किया गया था, तो इस आधार पर अभ्यर्थी को आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
सहायक प्राध्यापक के 74 पदों पर होनी थी भर्ती
यह मामला डॉ. सुषमा शरण की उम्मीदवारी से जुड़ा है। उन्होंने बिहार लोक सेवा आयोग की ओर से स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में सहायक प्राध्यापक पद के लिए अनुसूचित जाति महिला वर्ग में आवेदन किया था। इस भर्ती प्रक्रिया के तहत कुल 74 पदों पर नियुक्ति होनी थी। इनमें से 13 पद अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित थे। इन 13 पदों में पांच पद महिला अभ्यर्थियों के लिए निर्धारित किए गए थे। डॉ. सुषमा शरण का साक्षात्कार 28 फरवरी 2018 को हुआ था। इसके बाद आयोग ने 8 अगस्त 2019 को अंतिम चयन परिणाम जारी किया, लेकिन उसमें उनका नाम शामिल नहीं था।
पिता की जगह पति का नाम होने पर सामान्य वर्ग में कर दिया था शामिल
बिहार लोक सेवा आयोग ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि डॉ. सुषमा शरण के जाति प्रमाणपत्र में पिता की जगह पति का नाम दर्ज था। आयोग के अनुसार, वर्ष 2018 में नोटिस जारी कर उन्हें पिता के नाम वाला संशोधित जाति प्रमाणपत्र जमा करने का अवसर भी दिया गया था। आयोग का कहना था कि सही दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए जाने के कारण उनकी उम्मीदवारी को अनुसूचित जाति वर्ग के बजाय सामान्य यानी अनारक्षित वर्ग में शामिल कर दिया गया।
पिता और पति दोनों अनुसूचित जाति वर्ग से
वहीं, महिला अभ्यर्थी की ओर से अदालत में दलील दी गई कि भर्ती के मूल विज्ञापन में जाति प्रमाणपत्र पर पिता का नाम दर्ज होने की कोई अनिवार्यता नहीं थी। उन्होंने यह भी बताया कि उनके पिता और पति दोनों ही अनुसूचित जाति वर्ग से संबंध रखते हैं।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जाति का निर्धारण जन्म से होता है और प्रमाणपत्र इसका प्रमाण मात्र है। अदालत ने माना कि किसी तकनीकी त्रुटि के आधार पर अभ्यर्थी को उसके वैध आरक्षण अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर खंडपीठ ने बीपीएससी की अपील खारिज करते हुए डॉ. सुषमा शरण को सहायक प्राध्यापक पद पर नियुक्त करने का निर्देश दिया।