बिहार: युवाओं में बढ़ रहा हार्ट अटैक का खतरा, प्रदूषण और खराब जीवनशैली बनी चिंता; जानें कैसे बचाएं अपने दिल को
हृदय रोग विशेषज्ञों का कहना है कि हार्ट एक बार में 72 बार धड़कता है। यानी 72 बीट एक मिनट में देता है। अगर एक बीट भी गड़बड़ हो जाए तो काफी परेशानी हो सकती है। 40 वर्ष से कम उम्र में में करीब 30 से 40 प्रतिशत तक मामले नशे की आदत से जुड़े देखे जा रहे हैं। आइये जानते हैं कि विशेषज्ञों ने बचाव के तरीके क्या बताए?
विस्तार
विश्व हृदय दिवस के मौके पर इस बार ‘Don’t Miss a Beat’ थीम के जरिए लोगों को दिल की सेहत के प्रति जागरूक किया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग, बढ़ता प्रदूषण, पेड़ों की कटाई और बदलती जीवनशैली का असर हृदय स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। बिहार समेत देशभर में हृदय रोगों के बढ़ते मामलों के बीच सबसे बड़ी चिंता कम उम्र में हार्ट अटैक के मामले सामने आना है। हृदय रोग विशेषज्ञों के अनुसार, 40 वर्ष से कम उम्र में हार्ट संबंधी समस्या लेकर अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों में नशे की आदत, मानसिक तनाव, कम नींद और खराब खान-पान जैसे कारण बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। विशेषज्ञों ने हृदय रोगों से बचाव के लिए समय पर जांच, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, संतुलित आहार और नशे से दूरी को जरूरी बताया है।
40 साल से कम उम्र के मरीजों में नशे की भूमिका
पटना एम्स में कार्यरत और वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. संजीव कुमार ने बताया कि 40 वर्ष से कम उम्र में हृदय संबंधी समस्या लेकर आने वाले मरीजों में एक बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की है, जो सूखा नशा करते हैं। डॉक्टरों के अनुसार इस आयु वर्ग में करीब 30 से 40 प्रतिशत तक मामले नशे की आदत से जुड़े देखे जा रहे हैं। इसके अलावा लगातार बढ़ता मानसिक तनाव भी युवाओं के दिल पर असर डाल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि तनाव, नशा, कम नींद और शारीरिक गतिविधि की कमी का संयोजन कम उम्र में हृदय रोग का जोखिम बढ़ा सकता है। कई युवा रोजाना पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं और उनकी औसत नींद छह घंटे तक भी नहीं पहुंच रही है।
29 सितंबर को पटना में जागरूकता वॉक
डॉ. संजीव कुमार ने बताया कि विश्व हृदय दिवस के मौके पर 29 सितंबर की सुबह पटना में हृदय रोगों को लेकर जागरूकता वॉक आयोजित की जाएगी। यह वॉक सुबह करीब छह बजे जेपी गोलंबर से शुरू होगी। प्रतिभागी गांधी मैदान पहुंचेंगे और वहां बने वॉकिंग ट्रैक पर चलने के बाद गांधी मूर्ति के पास एकत्रित होंगे। इसके बाद वॉक वापस जेपी गोलंबर पहुंचेगी। कार्यक्रम में मॉर्निंग वॉक करने वाले लोगों से भी हृदय स्वास्थ्य और बचाव के उपायों को लेकर बातचीत की जाएगी। प्रतिभागियों को सुबह पौने छह बजे होटल मौर्या के एंट्री गेट के पास पहुंचने के लिए कहा गया है।
प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग से बढ़ रहा खतरा
पीएमसीएच में कार्यरत हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. अशोक कुमार ने पर्यावरण और हृदय रोगों के बीच बढ़ते संबंध पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग, तापमान में बदलाव और बढ़ता प्रदूषण हृदय रोगों के खतरे को बढ़ा रहा है। उन्होंने हालिया अमेरिकी आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 2050 तक कार्डियोवास्कुलर डिजीज के मामलों में तीन गुना तक वृद्धि होने की आशंका जताई गई है। प्रदूषण करीब 25 प्रतिशत हार्ट डेथ से जुड़े कारकों में शामिल हो गया है। प्रदूषण से कोई नई बीमारी पैदा होने की बात नहीं है, बल्कि पहले से मौजूद हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। इससे हार्ट अटैक, धड़कन में गड़बड़ी, हार्ट फेल्योर और अचानक होने वाली मौत के मामलों को लेकर चिंता बढ़ी है।
पटना में बढ़ता कंक्रीट का जंगल भी चिंता का विषय
डॉ. उपेंद्र सिंह ने बताया कि पटना में पिछले 15-20 वर्षों में हुए बदलाव का जिक्र करते हुए कहा कि शहर तेजी से कंक्रीट के जंगल में बदल रहा है। पर्यावरण में बदलाव और बढ़ते प्रदूषण का असर केवल हृदय तक सीमित नहीं है, बल्कि सांस संबंधी बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है। शहरी आबादी को हृदय और श्वसन संबंधी बीमारियों से बचाने के लिए पर्यावरण संरक्षण के साथ व्यक्तिगत स्तर पर भी स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की जरूरत है।
बिहार में ग्रामीण और शहरी आबादी को लेकर चिंता
वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. यूसी शामल ने बताया कि बिहार में हृदय रोगों का कोई पूर्ण और व्यापक डेटा उपलब्ध नहीं है। हालांकि उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर करीब छह प्रतिशत ग्रामीण और 10 से 12 प्रतिशत शहरी आबादी में ऐसी हृदय संबंधी बीमारी होने का अनुमान बताया गया, जिससे हार्ट अटैक का खतरा हो सकता है। इनमें कोरोनरी आर्टरी में ब्लॉकेज से जुड़ी बीमारियां प्रमुख हैं। हार्ट फेल्योर को लेकर भी उन्होंने चिंता जताई है। कहा कि अनुमान के मुताबिक करीब दो प्रतिशत वयस्क आबादी हार्ट फेल्योर से प्रभावित हो सकती है। खराब खान-पान, शारीरिक गतिविधियों की कमी और प्रदूषण को इसके जोखिम से जोड़कर देखा जा रहा है।
25-30 साल की उम्र में हार्ट अटैक चिंता का विषय
वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. अरविंद कुमार ने बताया कि युवाओं में कम उम्र में हार्ट अटैक को गंभीर चिंता का विषय बताया। 25, 30 और 40 वर्ष की उम्र में भी लोग हार्ट अटैक का शिकार हो रहे हैं। इसके पीछे नशा, तनाव, मोटापा, खराब खान-पान, कम नींद और अन्य जीवनशैली संबंधी कारणों को जोखिम कारक बताया गया है। हार्ट डिजीज से बचाव के लिए बीमारी का इलाज शुरू होने का इंतजार करने के बजाय जोखिम कारकों की पहचान और उनकी रोकथाम पर जोर देना जरूरी है।
डायबिटीज और BP को नियंत्रित रखना जरूरी
वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ विरेंद्र प्रसाद सिन्हा ने डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर को हल्के में नहीं लेने की सलाह दी। दोनों बीमारियों में कई बार स्पष्ट लक्षण नहीं होते। ऐसे में नियमित जांच महत्वपूर्ण है। दवा लेने के बाद BP या ब्लड शुगर सामान्य आने का मतलब यह नहीं है कि बीमारी खत्म हो गई। डॉक्टर की सलाह के बिना दवा बंद नहीं करनी चाहिए। नियमित जांच, खान-पान में नियंत्रण, व्यायाम और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार दवाओं का सेवन जरूरी है।
सफेद चीनी, मैदा और बार-बार गर्म तेल से बचें
वरिष्ठ हृदय विशेषज्ञ डॉ. बीबी भारती ने बताया कि हार्ट को स्वस्थ रखने के लिए खान-पान में भी बदलाव जरूरी है। विशेषज्ञों ने सफेद चीनी, अधिक मिठाई, मैदा और अत्यधिक रिफाइंड खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करने की सलाह दी है। खाने में मोटे अनाज, साबुत अनाज, दाल और फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ शामिल करने पर जोर दिया गया। प्रोटीन के लिए मछली और चिकन जैसे विकल्पों का उल्लेख किया गया, जबकि रेड मीट से बचने की सलाह दी गई। समोसे, चिप्स और अन्य तले हुए खाद्य पदार्थों में बार-बार गर्म किए गए तेल के इस्तेमाल से बचना चाहिए। विशेषज्ञों ने ऑलिव ऑयल और अलसी के तेल जैसे विकल्पों का भी उल्लेख किया।
हार्ट अटैक में शुरुआती समय बेहद महत्वपूर्ण
वरिष्ठ हृदय विशेषज्ञ डॉ अजय सिन्हा ने बताया कि हार्ट अटैक की स्थिति में शुरुआती समय को बेहद महत्वपूर्ण बताया। इसे ‘गोल्डन ऑवर’ के तौर पर समझाया गया। विशेषज्ञ ने कुछ मरीजों के लिए इमरजेंसी स्थिति में एस्पिरिन, क्लोपिडोग्रेल, एटोर्वास्टेटिन, सॉर्बिट्रेट या आइसोसॉर्बाइड जैसी दवाओं का उल्लेख किया। हालांकि इन दवाओं का इस्तेमाल व्यक्ति की मेडिकल स्थिति और डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही किया जाना चाहिए। खासकर बीटा ब्लॉकर जैसी दवाएं लेने से पहले BP और नाड़ी की जांच जरूरी बताई गई है। पहली बार सीने में दर्द या हार्ट अटैक जैसे लक्षण होने पर खुद से दवा लेने के बजाय तत्काल चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है।
नई तकनीकों से बदल रहा हृदय उपचार
वरिष्ठ हृदय विशेषज्ञ डॉ विनीत कुमार ने बताया कि हृदय रोगों के इलाज में पिछले दो-तीन दशकों में तकनीक तेजी से आगे बढ़ी है। अब कुछ उपयुक्त मरीजों में बिना स्थायी स्टेंट के भी एंजियोप्लास्टी संभव है। ड्रग-कोटेड बैलून के जरिए प्रभावित नस को चौड़ा कर वहां दवा पहुंचाई जाती है। वहीं, नसों में पथरी जैसी सख्त कैल्सिफिकेशन होने पर रोटाब्लेशन तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें डायमंड-कोटेड उपकरण की मदद से कैल्सिफिकेशन को तोड़ा जाता है, जिसके बाद जरूरत के अनुसार एंजियोप्लास्टी की जाती है। इंट्रावास्कुलर इमेजिंग तकनीक के जरिए नस के अंदर की स्थिति को अधिक स्पष्ट तरीके से देखा जा सकता है। इससे ब्लॉकेज की संरचना और स्टेंट की स्थिति का आकलन करने में मदद मिलती है।
बच्चों में भी रोकथाम पर जोर
वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ उपेंद्र कुमार ने बच्चों में स्वस्थ जीवनशैली विकसित करने पर भी जोर दिया। स्कूलों में बच्चों और अभिभावकों को खान-पान, वजन नियंत्रण और नियमित व्यायाम को लेकर जागरूक किया गया है। बच्चों में जन्मजात हृदय रोग भी बड़ी चुनौती है। विशेषज्ञों के अनुसार विभिन्न जिलों से ऐसे बच्चे इलाज के लिए बड़े अस्पतालों में रेफर होकर पहुंचते हैं। रूमेटिक हार्ट डिजीज को भी पूरी तरह खत्म नहीं माना गया है। यह बीमारी आगे चलकर हृदय के वाल्व को नुकसान पहुंचा सकती है।
CPR की ट्रेनिंग भी जरूरी
वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. विपिन कुमार ने बताया कि अचानक कार्डियक अरेस्ट की स्थिति में शुरुआती कुछ मिनट बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे समय में आसपास मौजूद व्यक्ति को CPR की जानकारी हो तो मेडिकल सहायता पहुंचने तक मरीज की मदद की जा सकती है। विशेषज्ञों ने कहा कि CPR और प्राथमिक चिकित्सा की ट्रेनिंग केवल स्वास्थ्यकर्मियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। स्कूलों, संस्थानों और आम लोगों के बीच भी इसका प्रशिक्षण बढ़ाया जाना चाहिए। वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. शमशाद आमल, डॉ. विकास सिंह ने बताया कि हृदय रोगों के इलाज में तकनीक की भूमिका बढ़ रही है, लेकिन बीमारी से बचाव के लिए जागरूकता और जीवनशैली में सुधार सबसे महत्वपूर्ण कदमों में शामिल हैं। समय पर जांच, BP और डायबिटीज पर नियंत्रण, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और नशे से दूरी के जरिए हृदय स्वास्थ्य को बेहतर रखने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं।