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Bihar News: नालंदा में हिंदी के वैश्विक विस्तार पर मंथन, प्राचीन ज्ञान परंपरा से आधुनिक तकनीक तक हुआ संवाद

Fri, 09 Jan 2026 05:33 PM IST
पटना ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नालंदा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नालंदा Published by: पटना ब्यूरो Updated Fri, 09 Jan 2026 05:33 PM IST
सार

Nalanda News: नालंदा विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में हिंदी के संवर्धन, तकनीकी एकीकरण और वैश्विक भूमिका पर चर्चा हुई। विद्वानों ने प्राचीन ज्ञान परंपरा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सांस्कृतिक संवाद के माध्यम से हिंदी के भविष्य पर विचार रखे।

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Nalanda Deliberations on global expansion of Hindi ancient knowledge tradition to modern technology dialogue
दीप जलाकर हुई कार्यक्रम की शुरुआत - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

नालंदा विश्वविद्यालय में शुक्रवार से शुरू हुई द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में हिंदी के संवर्धन, तकनीकी एकीकरण और वैश्विक संवाद में इसकी भूमिका पर गहन चर्चा हुई। यह आयोजन उस ऐतिहासिक भूमि पर हुआ, जहां कभी विश्व भर के विद्यार्थी संस्कृत और पाली में शास्त्रार्थ किया करते थे और आज हिंदी को वैश्विक भाषा के रूप में स्थापित करने पर विचार हो रहा है।

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उद्घाटन में उठे प्रासंगिक प्रश्न
सुषमा स्वराज सभागृह में आयोजित ‘भाषा और नालंदा परम्परा: हिन्दी के संवर्धन और वैश्विक संवाद में विविध संस्थाओं की भूमिका’ विषयक संगोष्ठी का उद्घाटन कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने किया। उन्होंने अपने विषय-प्रवर्तन में यह प्रश्न रखा कि क्या हिंदी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल युग में अपनी प्रासंगिकता बनाए रख सकेगी।
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तकनीकी एकीकरण पर जोर
कुलपति प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि हिंदी को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के लिए केवल भावनात्मक जुड़ाव पर्याप्त नहीं है। उन्होंने तकनीकी एकीकरण, सुदृढ़ अनुवाद तंत्र और आधुनिक विषयों के अनुरूप नई शब्दावली के विकास को आवश्यक बताया। उनके अनुसार कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल माध्यम भाषाओं को जोड़ने का सशक्त साधन बन सकते हैं, यदि अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व जैसी चुनौतियों के लिए समन्वित रणनीति अपनाई जाए।
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सभ्यतागत चेतना और भाषा का संबंध
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक और पूर्व सांसद तरुण विजय ने अपने संबोधन में नालंदा को भारत की बौद्धिक अजेयता का प्रतीक बताया। उन्होंने सोमनाथ और नालंदा के विध्वंस के बाद उनके पुनर्स्थापन को भारतीय सभ्यता की अविजय चेतना का उदाहरण बताया और भाषा को इस सांस्कृतिक निरंतरता से जोड़ा।

दीप जलाकर कार्यक्रम की हुई शुरुआत
 
पूर्वी एशिया में भारतीय ज्ञान परंपरा का उल्लेख
तरुण विजय ने थाईलैंड, म्यांमार और चीन में संस्कृत तथा भारतीय संस्कृति के प्रभाव का उल्लेख किया। उन्होंने कुमारजीव द्वारा चीन में भारतीय बौद्ध ग्रंथों के अनुवाद को सांस्कृतिक आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया, जिसने भारतीय ज्ञान परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया।
 
संगोष्ठी में बिहार संग्रहालय के महानिदेशक और राज्य सरकार के पूर्व मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह, अजरबैजान में भारत के राजदूत अभय कुमार और नालंदा विश्वविद्यालय के भाषा एवं साहित्य तथा मानविकी संकाय के अधिष्ठाता प्रोफेसर डी. वेंकट राव ने भी अपने विचार साझा किए।


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अकादमिक सत्रों में बहुआयामी चर्चा
प्रथम दिवस पर आयोजित तीन प्रमुख सत्रों में हिंदी पत्रकारिता और साहित्य में भाषायी नवाचार, नालंदा की प्राचीन ज्ञान परंपरा और समकालीन साहित्य के संबंधों पर चर्चा हुई। विशेष रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन ट्रांसलेशन और डिजिटल भाषा संसाधनों के संदर्भ में हिंदी की चुनौतियों और संभावनाओं पर विद्वानों ने अपने विचार रखे।
 
आधुनिक नालंदा की प्रतिबद्धता
गंभीर अकादमिक विमर्श के साथ सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम को जीवंत बनाया। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से यह संदेश उभरा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान की आधारशिला भी है। समापन अवसर पर कुलपति प्रो. चतुर्वेदी ने नालंदा विश्वविद्यालय को भाषाई विकास और बहुभाषिक संवाद का केंद्र बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि जिस तरह प्राचीन नालंदा ने विश्व को ज्ञान दिया, उसी तरह आधुनिक नालंदा हिंदी और भारतीय भाषाओं को वैश्विक मंच पर स्थापित करने में अग्रणी भूमिका निभाएगा।


 

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